संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 976, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९४७
सनकादि कुमारोंके इतना कहते ही वे दोनों जय और विजय तत्काल आसुरी योनिमें चले गये। वे दोनों प्रथम जन्ममें 'हिरण्यकशिपु' और 'हिरण्याक्ष', दूसरे जन्ममें 'कुम्भकर्ण' तथा 'रावण' और तीसरे जन्ममें 'दन्तवक्र' एवं 'शिशुपाल' कहलाये। हिरण्याक्ष नामक दैत्य बड़ा बलवान् था। वह सब देवताओंको जीतकर स्वयं ही उनके लोकोंका अधिकारी बन बैठा। राज्यभ्रष्ट देवता पराजित होकर स्वर्गसे निकाल दिये गये। उस समय सब लोग पाखण्डी, पराक्रमशून्य तथा धर्मविमुख हो गये। 'सब कुछ ब्रह्म ही है' ऐसा कहते हुए दम्भी दैत्य पशुओंके समान आचरणवाले हो गये थे।
संसारकी ऐसी दुरवस्था देख भगवान् महाविष्णुने विचार किया कि जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मका उत्थान होता है, तब-तब मैं अपने-आपको संसारमें प्रकट करता हूँ।* अतः अब मुझे अवतार ग्रहण करना चाहिये। ऐसा सोचकर उन्होंने लीलासे ही श्वेतद्वीपके समान परम उज्ज्वल मंगलमय दिव्य वाराहशरीर धारण किया, जो पूर्णतः यज्ञमय था। यूप (यज्ञस्तम्भ) ही उनकी दाढ़ें थीं, हविष्यकी गन्ध ही उनके शरीरकी दिव्य गन्ध थी, बीज और ओषधियाँ ही उनकी रोमावलि थीं और चारों वेद ही उनके चार चरण थे। साक्षात् आदिपुरुष परमेश्वर ही, जिनके अनेकों नाम हैं और वेदोंमें जिनकी अनेक प्रकारसे स्तुति की गयी है, वाराहरूपसे प्रकट हुए थे। उन्होंने बड़ा भारी संग्राम करके उस दुर्धर्ष दैत्य हिरण्याक्षको मार डाला। उससे पीड़ित हुई यह पृथ्वी रसातलको चली गयी थी। उसे भगवान् वाराह अपनी दाढ़से उठाकर ऊपर ले आये। हिरण्याक्षके अनुगामी बहुतसे दैत्य मारे गये। शेष सभी भागकर पातालमें चले आये। उस समय पवित्र वायु चलने लगी। सूर्य उत्तम प्रभासे परिपूर्ण हो गये। अग्निकुण्डोंकी बुझी हुई अग्नियाँ पुनः प्रज्वलित हो उठीं और दिशाओंमें जो कोलाहल होते रहते थे, वे सब शान्त हो गये।
भगवान् वाराहमूर्ति सम्पूर्ण कामनाओं और फलोंको देनेवाले हैं। वे आनन्दसे परिपूर्ण दैव, दैत्योंका संहार करनेवाले तथा भक्तोंको वर देनेवाले हैं। उन्हींके हृदयसे यह सनातन नदी शिप्रा प्रकट हुई है, जो आनन्दमय जलसे परिपूर्ण तथा आनन्ददायक वर देनेवाली है। रमणीय महाकाल वनमें परम सुन्दर पद्मावतीपुरी है। उस पुरीमें सुन्दर कुण्ड परम रम्य प्राचीन और शुभ है। उसमें स्नान करके सब मनुष्य सनातन शिवलोकको जाते हैं। व्यास! उसी सुन्दर वनमें लोकपावनी शिप्रा लीन हुई है। भगवान् वाराहने समस्त दुष्ट दैत्योंका संहार करके देवताओंको निर्भय कर दिया। तदनन्तर इन्द्र आदि सब देवताओंने हाथ जोड़कर उन महाविष्णुको नमस्कार किया और सामने खड़े होकर इस प्रकार पूछा।
देवता बोले—देवदेव! जगन्नाथ! आपके गुणोंका श्रवण और कीर्तन परम पुण्यमय है। कृपया यह बताइये कि किस पुण्यके प्रभावसे हमें स्वर्गलोक प्राप्त हो सकता है?
भगवान् वाराह बोले—देवताओ! महाकाल वनमें तुम्हारी मनोरथसिद्धिका कारणभूत गुह्यसे भी गुह्य पुण्य-स्थान है। जहाँ मेरे शरीरसे उत्पन्न हुई शिप्रा नदी लीन हुई है, वह स्थान लीनगंगाके नामसे विख्यात है। जहाँ सरिताओंमें श्रेष्ठ लीनगंगा, प्राची, सरस्वती, पुष्कर, गयातीर्थ तथा शुभ पुरुषोत्तम सरोवर है, उस शिप्रा नदीको जाओ।
देवाधिदेव जगद्गुरु भगवान् वाराहका यह वचन सुनकर ब्रह्मा, इन्द्रादि सब देवता परम सुन्दर महाकाल वनमें, जहाँ सरिताओंमें श्रेष्ठ शिप्रा बहती हैं, गये। वहाँ स्नान-दानादि शुभकर्म करके उस पुण्यके प्रभावसे वे अपने-अपने लोकको प्राप्त हुए। व्यासजी! इस प्रकार शिप्रा नदी सम्पूर्ण लोकोंको पवित्र करनेवाली बतायी गयी है।
* यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्॥ (स्क० पु०, आ० अव० मा० ६३।४०)