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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * | ९३७ ---|---

इसीलिये उस तीर्थको धूतपाप कहते हैं। जो जितेन्द्रिय शिवभक्त अष्टमी, पूर्णिमा, चतुर्दशी तथा शनिवारको एक रात उपवास करके धूतपाप नामक महेश्वरका दर्शन करता है, वह सात जन्मोंमें किये हुए समस्त पापोंसे छूट जाता है और अन्तमें शिवलोकको प्राप्त होता है। जो मनुष्य पौषके महीनेमें वहाँ स्नान करके शिवजीका दर्शन करता है, वह शूलेश्वरके प्रभावसे ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है और मृत्युके पश्चात् परम पदको प्राप्त होता है।

इस प्रकार अन्धकासुरको विदीर्ण करके भगवान् शिवका त्रिशूल ज्यों-ही पातालगंगाको गया, त्यों-ही अन्धकासुरके रक्तसे उत्पन्न सहस्रों भयंकर दैत्य वहाँ युद्धके लिये खड़े हो गये। तब महादेवजीने बड़े जोरसे सिंहनाद किया। उस भयंकर गर्जनासे मूर्च्छित होकर वे पापी दैत्य पृथ्वीपर गिर पड़े। उस महावनमें जहाँ भगवान् शंकरने सिंहनाद किया था, वहाँ समस्त पापोंका नाश करनेवाले सिंहेश्वरदेव विराजमान हैं। उनका दर्शन करनेसे मनुष्य सिंहके समान बलवान् होता है। सिंहनाद करनेपर जहाँ भगवान्‌का श्री-विग्रह रौद्ररससे कण्टकित (रोमांचित) हो गया था, वहाँ वे कण्टकेश्वरदेवके नामसे विद्यमान हैं, जो भक्तोंको सदा सब कुछ देनेवाले हैं। जो मानव उस तीर्थमें स्नान करके कण्टकेश्वर शिवका दर्शन करता है, वह कहीं भयको नहीं प्राप्त होता। जहाँ शंकरजीने इन्द्रको अभयदान दिया था, वहाँ अभयेश्वर नामक उत्तम लिंग प्रकट हुआ। वहाँ स्नानसे पवित्र हो उपवास करके जो जितेन्द्रिय पुरुष देवदेवेश्वर शिवका पूजन करता है, वह अश्वमेध यज्ञके फलको प्राप्त होता है। उस समय भगवान् शिवके मस्तकसे पृथ्वीपर जो पसीनेकी बूँद गिरी, उससे अंगारके समान लाल अंगवाले भूमिपुत्र मंगल उत्पन्न हुए। अंगारक, रक्ताक्ष तथा महादेव-पुत्र इन नामोंसे स्तुति करके ब्राह्मणोंने उन्हें ग्रहोंके मध्यमें प्रतिष्ठित किया। तत्पश्चात् उसी स्थानपर ब्रह्माजीने अंगारकेश्वर नामक उत्तम शिवलिंगकी स्थापना की। जो पवित्रात्मा मनुष्य मंगलवारको उस तीर्थमें स्नान तथा अंगारकेश्वरका दर्शन करता है, वह समस्त पातकोंसे छूट जाता है। मंगलवारको चतुर्थी तिथिमें रात्रिके समय अर्घ्य देना चाहिये। जबतक चार चतुर्थी पूरी न हो जाय, तबतक प्रयत्नपूर्वक यह अर्घ्यदानका नियम चलाते रहना चाहिये।

इस प्रकार त्रिशूलसे आहत होनेके बाद अन्धकासुरको बड़ा भय हुआ। वह अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये प्रयत्न करने लगा। संसारमें जीवन-रक्षाका दूसरा कोई उपाय न देखकर उसने भगवान् शंकरका ही स्तवन प्रारम्भ किया। वह बोला— 'जो इस सम्पूर्ण चराचर जगत्के कर्ता और इसे अपने किये हुए कर्मोंके अनुसार सुख-दुःख देनेवाले हैं, जो संसारकी उत्पत्तिके हेतु तथा उसका अन्तकाल भी स्वयं ही हैं, सबको शरण देनेवाले उन्हीं भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। जिनके मोह, तमोगुण और रजोगुण दूर हो गये हैं, वे योगीजन, भक्तिसे मनको एकाग्र रखनेवाले निष्काम भक्त तथा अपरिच्छिन्न बुद्धिवाले ज्ञानी भी जिनका निरन्तर ध्यान करते हैं, उन अनन्त दिव्यस्वरूप शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। जो सुशोभित किरणोंवाले निर्मल अर्धचन्द्रका मुकुट बाँध सदा अपने मस्तकपर गंगाजीको धारण करते हैं और जिन्होंने अपने वामांग भागमें गिरिराजकिशोरी उमाको धारण कर रखा है, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। सिद्ध और चारण जिनके चरणारविन्दोंकी सेवा करते रहते हैं और जिन्होंने आकाशसे ऊँची-ऊँची उत्ताल तरंगोंके साथ विषम वेगसे गिरती हुई त्रिभुवनपावनी गंगाको अपने मस्तकपर पुष्पमालाकी भाँति धारण कर लिया था, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। जिसके भारसे कैलासपर्वतका शिखर हिलने लगता था, उस कैलास शृंगके सदृश विशालकाय दशाननने भी जिनके युगलचरणारविन्दोंकी सेवा की है, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। महेश्वर! जो मूढ़ पुरुष चराचर जगत्के गुरु

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आपको नहीं जानते हैं, वे ऐश्वर्यका अहंकार नष्ट होनेपर मेरी ही भाँति पश्चात्ताप करते और दुस्सह यातना भोगते हैं।'

इस प्रकार स्तुति करते हुए अन्धकासुरसे सबका कल्याण करनेवाले शूलपाणि भगवान् शिव प्रसन्न होकर बोले—वत्स! मैं प्रसन्न हूँ, अब तुम शुद्ध-निर्मल हो गये हो। अतः तुम्हें दिव्य नेत्र देता हूँ, निश्चिन्त होकर मेरी ओर देखो। दानवश्रेष्ठ! तुम्हारे मनमें जो कोई भी आकांक्षा हो, उसे माँगो; मैं तुम्हें सब कुछ दूँगा।

अन्धकासुर बोला—देवेश्वर! मुझे गणपतिपद प्रदान कीजिये, क्योंकि वह सदा अक्षय है।

भगवान् शिव बोले—वत्स! तुम मेरे गणोंके अध्यक्ष होकर रहो। तुम्हें अणिमा आदि समस्त सिद्धियाँ प्राप्त होंगी और सदैव तुम मेरे प्रिय बने रहोगे।

सनत्कुमारजी कहते हैं—इस प्रकार दुर्लभ वरदान पाकर वह अन्धक महादेवजीका मुख्य गण होकर वहीं अन्तर्धान हो गया। तदनन्तर भगवान् शिव कैलासपर्वतपर चले गये।


उज्जयिनीपुरीके कनकश्शृंगा आदि नाम पड़नेका कारण

व्यासजीने पूछा—भगवन्! इस महाकाल वनमें कितने तीर्थ और शिवलिंग हैं, यह बतानेकी कृपा करें।

सनत्कुमारजीने कहा—व्यास! महाकाल वनमें साठ कोटि सहस्र और साठ कोटि शत तीर्थ हैं तथा शिवलिंगोंकी तो कोई संख्या ही नहीं है। सकाम या निष्कामभाव रखनेवाला जो मनुष्य इस सुन्दर महाकाल वनमें जन्म लेता है, वह भगवान् शिवके धाममें प्रतिष्ठित होता है। ब्रह्मन्! सभी तीर्थ और सभी सिद्ध क्षेत्र सब ओरसे पवित्र एवं पुण्यजनक हैं। उन सबमें इस महाकालतीर्थ और क्षेत्रको मुख्य जानो।

व्यासजीने पूछा—मुने! उज्जयिनीपुरीका नाम पहले कनकश्शृंगा क्यों हुआ? फिर उसका कुशस्थली नाम कैसे हुआ? आगे चलकर अवन्ती नाम कैसे पड़ा? पद्मावती और उज्जयिनी नामोंका भी हेतु क्या है? यह सब बतावें।

सनत्कुमारजीने कहा—एक समय महादेवजी तथा ब्रह्माजी सुवर्णमय शिखरोंसे युक्त अद्भुत पुरीका दर्शन करनेके लिये भूतलपर आये। यहाँ आकर उन्होंने सम्पूर्ण विश्वके स्वामी भगवान् विष्णुरूपको नमस्कार किया। विष्णुरूपने भी विधि और आदरके साथ सेवकोंसहित उन दोनोंका स्वागत-सत्कार किया और पूछा—'महेश्वर! तथा ब्रह्माजी! आप दोनों अपने अनुगामियोंसहित देवलोकसे पृथ्वीपर कैसे पधारे हैं!' यह सुनकर ब्रह्मा और महादेवजी बोले—'प्रभो! जहाँ आप विराजमान हैं, वहीं हम दोनोंका भी स्नेह है। आपके बिना हमें स्वर्ग, पृथ्वी अथवा पातालमें भी सुख नहीं है। भगवन्! आपने यह सुवर्णमय शिखरवाली विचित्र पुरी कब बसायी है? जगदीश्वर! आप यहाँ हमें भी स्थान दें।'

यह सुनकर विश्वरूपमय विष्णुने प्रसन्नचित्त होकर कहा—मैं आप दोनोंको अभीष्ट स्थान देता हूँ। प्रजापते! इस पुरीके उत्तर भागमें आपका स्थान है और महेश्वर! आपके लिये दक्षिण भागमें स्थान दिया गया है। अतः आप वहीं पधारें। आप दोनोंने इस पुरीको सुवर्णमय शिखरवाली बताया है, इसलिये यह संसारमें 'कनकश्शृंगा' नामसे विख्यात होगी।

इस प्रकार इस पुरीका प्रथम नाम कनकश्शृंगा बताया जाता है। वहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजी तीनों रहकर प्रसन्नताका अनुभव करते हैं और अपने भक्तोंको समस्त मनोवांछित फल देते हैं।


* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९३९


व्यास! अब इस पुरीके कुशस्थली नाम होनेका कारण बताया जाता है, उसे सुनो। एक समय सृष्टिकी रचना करके ब्रह्माजीने भगवान् विष्णुका ध्यान किया। उनके ध्यान करनेपर विश्वरूपधारी भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीसे कहा—'ब्रह्मन्! आपने मेरा उत्तम रीतिसे ध्यान किया है, इसलिये मैं आपके पास आया हूँ। समस्त प्राणियोंकी रक्षाके लिये उद्यत हुए मुझको देखिये।' भगवान्‌का यह वचन सुनकर ब्रह्माजी सहसा उठकर खड़े हो गये और अनन्यचित्तसे सामने खड़े हुए श्रीहरिका पूजन करते हुए उन्हें नमस्कार किया। तत्पश्चात् ब्रह्माजीने इस प्रकार कहा—'देवदेव! जगन्नाथ! इस जगत्‌की सृष्टि तो मैंने कर दी है, परंतु आपके कृपापूर्ण सहयोगके बिना इसका स्थिर रहना असम्भव है। आप ही इस संसारके शास्ता एवं पालक हैं। अतः आप ही इसको अपने अनुशासनमें रखें। यक्ष, नाग, राक्षस, देवता, दानव, गन्धर्व—ये परस्पर एक-दूसरेको मारते हैं। इन सबकी रक्षा करनेमें केवल आप ही समर्थ हैं। आप सबमें प्रवेश करनेवाले और सर्वत्र व्यापक हैं, इसीलिये मुनीश्वरोंने आपको 'विष्णु' कहा है। आपने ही अपनेमें इस सम्पूर्ण विश्वको बसाया है, इसलिये आप 'वासुदेव' कहलाते हैं। समस्त संसार आपका अनुगामी है, आप विभु हैं, सम्पूर्ण जगत्‌के राजा हैं। अखिल विश्व आपके लिये सेनाके सदृश है, इसीलिये आप 'विश्वसेन' कहे गये हैं। इस चराचर जगत्‌को अपनी ओर आकृष्ट करनेके कारण आपको लोग 'श्रीकृष्ण' कहते हैं। देव! आपने तीनों लोकोंको जीत लिया है, अतः आप 'जिष्णु' हैं। आप ही इस सम्पूर्ण जगत्‌के आदि राजा हों, आपका सिंहासन अद्वितीय हो। आपके हाथमें दक्षिणावर्त शंख है, इस कारण आप पुरुषोत्तम हैं। आपके पास सदा सुदर्शन नामक चक्र विद्यमान रहता है, अतः आप ही चक्री हैं। आपकी ध्वजा गरुड़से सेवित है तथा सुवर्णकी-सी पाँखवाले गरुड़जी आपके वाहन हैं। किरीट, पदक, भुजबन्द, कर्णपुष्प, केयूर, हार, उत्तम सुवर्णसूत्र, विचित्र वस्त्र, उत्तरीय तथा लाल रंगकी मालाओंसे आप विभूषित होइये। लक्ष्मी कभी आपका साथ नहीं छोड़तीं। आपका ऐश्वर्य अनन्त है। मुकुन्द! इस जगत्‌में साधुपुरुषोंकी आपमें भक्ति हो। आप भक्तके ऊपर प्रसन्न होइये।

सनत्कुमारजी कहते हैं—ब्रह्माजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् विष्णु प्रसन्न हो देवताओंके बीचमें इस प्रकार बोले—'विरंचि! मुझे कोई शुद्ध मण्डल दिखाइये, जो आपसे पृथक् न हो और जहाँ स्थिरतापूर्वक स्थित होकर मैं जगत्‌की रक्षा कर सकूँ।' तदनन्तर ब्रह्माजीने कुशकी एक मूठी ली और एक अत्यन्त उन्नत स्थल भूमिपर बिछाकर भगवान् विष्णुसे कहा—'देव! आपके लिये यही पवित्र मण्डल है, देवताओंसे पूजित होकर आप सदा यहीं विराजमान होइये। इन कुशोंपर बैठनेके कारण आप विष्टरश्रवा एवं कुशेश्वर होंगे।' ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर भगवान् लक्ष्मीपति वहाँ कुशके आसनपर आसीन हुए। तदनन्तर विश्वविधाता ब्रह्मा और भगवान् पुराण-पुरुषोत्तम दोनोंने उस पुरीका नाम कुशस्थली रख दिया। उस पुरीमें रहकर सम्पूर्ण विश्वके पालक, सर्वत्र व्यापक, विश्वेश्वर, विश्वस्रष्टा, विश्वात्मा एवं सर्वविश्वनियन्ता श्रीमान् विष्णुने समस्त संसारका पालन किया। इस प्रकार पहले जिसका नाम कनकभृंगा था, वही पुरी कुशस्थलीके नामसे प्रसिद्ध हुई।

प्राचीन कालकी बात है। दैत्योंसे पराजित होकर सम्पूर्ण देवताओंने मेरु पर्वतके शिखरपर जाकर वहाँके वन, कुंज और गुफा आदिकी शरण ली। वहाँ पहुँचकर उन्होंने परस्पर सलाह की और उस स्थानपर गये, जहाँ प्रजापति ब्रह्माजी विराजमान थे। देवताओंने अपने आगमनका सब कारण उनसे निवेदन किया। तब ब्रह्माजी देवताओंके साथ देवाधिदेव भगवान् महेश्वरके समीप गये। फिर महादेवजी भी उन सबके साथ वैकुण्ठधाममें भगवान् विष्णुके समीप गये और उन देवदेव जगदीश्वरकी स्तुति करने लगे।

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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

**देवता बोले—**सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले भगवान् अनन्तको नमस्कार है। कूर्मरूपधारी श्रीहरिको बार-बार नमस्कार है। भयंकर नृसिंह और वाराह रूप धारण करनेवाले भगवान्‌को नमस्कार है। रघुनन्दन रामको एवं अनन्त शक्तिसम्पन्न ब्रह्मको नमस्कार है। परम शान्त वासुदेवको नमस्कार है। अज्ञानी जीवोंका भी पालन करनेवाले पशुपति, शुद्ध-बुद्धस्वरूप एवं म्लेच्छान्तकारी कल्किदेवको नमस्कार है।

इस प्रकार स्तुतिमें लगे हुए देवताओंको सम्बोधित करके आकाशवाणी हुई—देवगण! तुम सब लोग एकाग्रचित्त होकर सुनो। ब्रह्मर्षियोंद्वारा सेवित परम सुन्दर जो महाकाल वन है, वहाँ समस्त कामनाओं और फलोंको देनेवाली एक पवित्र पुरी है, जो बड़ी ही मनोरम और कुशस्थली नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ सिद्ध और गन्धर्व निवास करते हैं, वहीं महादेवजी सदा निवास करते हैं। कल्पान्तकालमें जब समस्त चराचर प्राणी नष्ट हो जाते हैं, सब तीर्थ, समस्त पुण्य मन्दिर, नदी, समुद्र, सरोवर, उपवन, ओषधि, वृक्ष, लता, यन्त्र, मन्त्र, शुभ, अशुभ, नक्षत्र और सूर्य, चन्द्र आदि जगत्‌का अभाव हो जाता है, उस समय सबके बीज, पुण्य, जीव, कर्म तथा आशय (कर्मोंके संस्कार) सबको लेकर भगवान् शिव उस पुरीमें स्थित होते हैं। अतः कुशस्थलीपुरी सबके लिये परम हितकारिणी है। वहाँ मनुष्योंद्वारा किया हुआ थोड़ा-सा भी दान अनन्तानन्तगुना हो जाता है। तुम सब लोग यत्नपूर्वक वहीं जाओ। उस तीर्थमें जाकर तुम सब लोग उत्तम विधिसे स्नान, दान आदि शुभकर्म करो। उस पुण्यके बलसे तुम्हें पुनः स्वर्गलोककी प्राप्ति होगी।

वह आकाशवाणी सुनकर ब्रह्मा और शिव आदि सब देवता मस्तक झुकाकर भगवान्‌को प्रणाम करके उसी स्थानपर गये। वहाँ उस पुरीको देखकर देवता बहुत प्रसन्न हुए। कुशस्थलीमें पैशाचमोचन नामसे प्रसिद्ध एक तीर्थ है। उसमें स्नान, जप, होम और दान करनेसे देवताओंको अक्षय पुण्य प्राप्त हुआ। उसके बलसे वे दानवोंको जीतकर पुनः स्वर्गलोकमें अपने-अपने पदपर प्रतिष्ठित हो गये। जहाँ प्रत्येक कल्पमें देवता, तीर्थ, ओषधि, बीज तथा सम्पूर्ण प्राणियोंका पालन होता है, वह पुरी सबका अवन (रक्षण) करनेके कारण 'अवन्ती' है। आजसे इस कुशस्थलीका नाम अवन्तीपुरी होगा। ऐसा कहकर सब देवता अपने-अपने धामको चले गये। द्विजश्रेष्ठ! तभीसे भूतलपर वह पुरी अवन्तीके नामसे विख्यात हुई है।

व्यासजी! अब मैं यह बतलाऊँगा कि अवन्तीपुरीका नाम उज्जयिनी कैसे हुआ। एक समय सब दैत्योंके राजा महादैत्य त्रिपुरने ब्रह्माजीके सन्तोषके लिये बड़ी घोर तपस्या की। एक सहस्र वर्ष पूर्ण होनेपर ब्रह्माजी अत्यन्त प्रसन्न होकर उससे बोले—'असुरश्रेष्ठ! तुम मुझसे अपना मनोवांछित वर माँगो।' ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर त्रिपुर दैत्य बोला—'ब्रह्मन्! मैं देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग तथा राक्षस सबके द्वारा अवध्य हो जाऊँ।'

**ब्रह्माजी बोले—**वत्स! ऐसा ही होगा। तुम निर्भय होकर विचरो।

ऐसा कहकर ब्रह्माजी वहीं अन्तर्धान हो गये। तबसे लेकर उस दैत्यने पहलेके वैरका स्मरण करके देवताओंका महान् विनाश आरम्भ किया। उससे परास्त हुए देवता आपसमें सलाह करके ब्रह्माजीके पास गये और उनसे अपनी विपत्तिका सब समाचार कह सुनाया। यह सुनकर ब्रह्माजी सहसा उठे और देवताओंके साथ महाकाल वनमें जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने समस्त देवताओंके साथ रुद्रसरोवरमें स्नान, दान, जप और होम किया। तत्पश्चात् महाकालजीकी पूजा करके श्रीब्रह्माजी बोले—'भक्तोंको अभय दान देनेवाले देवदेव महादेव! दैत्यराज त्रिपुर देवताओंका बड़ा भारी संहार कर रहा है। उसने कितने ही द्वीप, ग्राम और नगर उजाड़ दिये। ऋषियों और संन्यासियोंके आश्रम

  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९४१

फूँक दिये। अतः आप यत्नपूर्वक उसके वधका कोई उपाय सोचिये।'

ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर महादेवजीने कुछ सोच-विचारकर कहा—देवताओ! उस दुरात्मा दैत्यको जीतनेका कोई उपाय करूँगा। तबतक तुमलोग तपस्या करो। अवन्तीपुरीमें जो होम, दान आदि पुण्य कर्म किया जाता है, वह सब अक्षय होता है। सब देवताओंसे ऐसा कहकर भगवान् शिव वहीं अन्तर्धान हो गये।

तदनन्तर उस दैत्यका विनाश करनेके लिये भगवान् शंकरने महापाशुपत नामक शस्त्र अपने हाथमें लिया। उस समय वे महान् आडम्बर धारण करके समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर प्रतीत होने लगे। देवता उनकी स्तुति और जय-जयकार करते हुए उनके पीछे-पीछे चले। महादेवजीने एक ही बाणसे उस महामायावी असुरको मार डाला और मायायुद्धसे उसके तीन टुकड़े कर डाले। तत्पश्चात् वे देवसेवित अवन्तीपुरीमें लौट आये। उस समय ऋषि, सिद्ध और चारण अत्यन्त प्रसन्न हो जय-जयकारके साथ भगवान् सदाशिवकी स्तुति करने लगे। देवताओंको पुनः अपना स्थान प्राप्त हुआ। वहाँ त्रिपुर नामक दानवको उत्कर्षपूर्वक जीता गया था। इसलिये सब ऋषि-महर्षियोंने उसका नाम 'उज्जयिनी' रख दिया। तभीसे अवन्तीपुरीका नाम उज्जयिनी-पुरी हुआ। जो मानव उस पुरीमें स्नान, दान आदि करते हैं, उनके शरीरमें कोई पाप नहीं ठहर पाता। उज्जयिनीपुरीमें विद्याकी इच्छा रखनेवाला महादेवजीकी, धनार्थी पुरुष धनाध्यक्ष कुबेरकी, पुत्रार्थी सुरेश्वर इन्द्रकी, सुखार्थी मानव दिनेश्वर सूर्यकी, उत्तम बुद्धि चाहनेवाला गणेशकी तथा प्रिय वस्तुकी इच्छा रखनेवाला भगवान् शेषकी स्तोत्रमयी वाणीद्वारा आराधना करते हुए निवास करे। जो सौभाग्यशाली मानव सदा उज्जयिनीपुरीमें निवास करता है, वह मनोवांछित कामनाओंका उपभोग करके मृत्युके पश्चात् भगवान् शिवके धाममें जाता है।

अब उज्जयिनीपुरीका पद्मावती नाम पड़नेका कारण बतलाऊँगा। एक समय दुष्टात्मा दानवोंके द्वारा धर्मको बड़ी भारी हानि पहुँची। तब समस्त देवताओंने दैत्योंसे मिलकर समुद्रका मन्थन किया। उस समय समुद्रसे महालक्ष्मी प्रकट हुईं। वे उज्जयिनीके महाकाल वनमें रहने लगीं। तदनन्तर कौस्तुभ मणि, पारिजात वृक्ष, वारुणी मदिरा, धन्वन्तरि वैद्य, चन्द्रमा, कामधेनु, ऐरावत हाथी, उच्चैःश्रवा घोड़ा, अमृत-कलश, रम्भा अप्सरा, शार्ङ्ग धनुष, पांचजन्य शंख, महापद्म निधि और हालाहल विष—ये नाना प्रकारके चौदह रत्न प्राप्त हुए। इन सबको लेकर देवता और दैत्य माहेश्वर वनमें आये और वहाँ बैठकर अमृत पीनेके विषयमें विचार करने लगे। वे सभी 'पहले मैं, पहले मैं' ऐसा कहते हुए विवाद करने लगे। इसके कारण वहाँ बड़ा भारी कोलाहल मच गया। इसी समय वहाँ देवर्षि नारद आये। उन्होंने दोनों दलोंका वह कलह देखकर भगवान् विष्णुकी आराधना की। तब भगवान् श्रीहरि सबके मनको मोहनेवाली नारीका रूप धारण करके वहाँ आये। उस सुन्दरीको देखकर वे महादैत्य कामदेवके वशीभूत हो गये। इसी समय श्रीहरिने अपने हाथका कौशल दिखाते हुए दैत्योंको मदिरा और देवताओंको अमृतका कलश दे दिया। राहु नामक दैत्य देवताओंका-सा रूप धारण करके उन्हींके बीचमें बैठकर वह उत्तम अमृत पीने लगा। यह जानकर भगवान् विष्णुने तुरंत ही चक्रसे उसका मस्तक काट डाला। परंतु अमृतका स्पर्श हो जानेके कारण उस असुरकी मृत्यु नहीं हुई। वही इस महाकाल क्षेत्रमें राहु और केतुके नामसे विख्यात हुआ। तत्पश्चात् महाकाल वनमें देवताओंने उन रत्नोंको परस्पर बाँट लिया, जिससे वे रत्नभोगी हुए। मोहिनी देवीने कौस्तुभ मणि, लक्ष्मी, शार्ङ्ग-धनुष तथा पांचजन्य शंख—ये चार वस्तुएँ भगवान् विष्णुको दीं। उच्चैःश्रवा घोड़ा सूर्यको दिया, गजश्रेष्ठ ऐरावत इन्द्रको समर्पित किया। देवताओंको अमृत और शिवजीको चन्द्रमा प्रदान किया। वृक्षोंमें

१५. अवन्तीखण्ड (अवन्तीक्षेत्र व चतुरशीतिलिंग)

९४२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

श्रेष्ठ पारिजात तथा रम्भा अप्सराको इन्द्रके क्रीड़ा-कानन नन्दनवनमें भेज दिया। देवताओंको अपना खोया हुआ स्थान पुनः प्राप्त हो गया। कामधेनु गौको यज्ञकी सिद्धिके लिये ऋषियोंके अधीन किया। महापद्म नामकी निधि कुबेरके भवनमें गयी; परंतु उस हालाहल विषका किसीने भी आदर नहीं किया। भगवान् शंकरने जगत्के हितकी इच्छासे स्वयं ही उस विषको पीकर कण्ठमें धारण कर लिया। तभीसे महादेवजीका नाम नीलकण्ठ हुआ। जहाँ रत्नोंका बँटवारा हुआ, उस रत्नकुण्डमें स्नान करके जो मनुष्य भगवान् नीलकण्ठका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर सब रत्नोंका भोगी होता है तथा अन्तमें शिवलोकको जाता है। उस समय हर्षमें भरे हुए ब्रह्मा, विष्णु आदि सब देवता कहने लगे—‘इस उज्जयिनी-पुरीमें आकर हम सब लोग रत्नोंके भोगी हुए हैं तथा यहाँ सब समय भगवती पद्मा (लक्ष्मी) निश्चलरूपसे निवास करती हैं, अतः आजसे इस पुरीका नाम ‘पद्मावती’ होगा। जो महाभाग मानव इस पुरीमें स्नान, दान, पूजन तथा देवताओं, पितरोंका तर्पण करता है, उसके शरीरमें किंचिन्मात्र भी पाप नहीं रह जाता तथा उसे दरिद्रता और दुर्गंतिकी भी प्राप्ति नहीं होती।

सनत्कुमारजी कहते हैं—‘व्यासजी! एक समय महर्षि लोमशने अपना अनुभव इस प्रकार सुनाया था।’

लोमशजी बोले—एक बार मैं तीर्थयात्राके प्रसंगसे कुशस्थलीपुरीमें गया था। वहाँ भगवान् महेश्वरके दर्शनमात्रसे मेरे सारे रोग, सारी चिन्ताएँ मिट गयीं और मैं निर्मल हो गया। वहीं दीर्घकालतक तपस्या करके मैं जरा और रोगसे रहित दीर्घायु हुआ। मैंने वहाँके सब तीर्थोंमें स्नान किया और पवित्र एवं एकाग्रचित्त हो समस्त पापोंसे रहित हो गया। उस तीर्थमें पार्वतीजीके साथ भगवान् शंकर सदा निवास करते हैं। उनका श्रीअंग चन्द्रमाके मुकुटसे सुशोभित है। उनके अंगोंमें चिताका भस्म लगा रहता है। वे सब ओर चन्द्रकलाकी चटकीली चाँदनी छिटकाते हुए शोभा पाते हैं और इसीलिये वहाँपर कृष्णपक्ष, अमावास्या तिथि और अन्धकार कभी नहीं हुआ। वहाँकी नदियाँ, सरोवर, बावली तथा पल्वल आदि सभी जलाशय कुमुदिनीसे व्याप्त होते हैं और उनसे आच्छादित हुई पृथ्वी चाँदनीमें डूबी हुई-सी प्रतीत होती है। वहाँ सब समय कुमुद्वती (कुमुदिनी) खिली रहती है। इसलिये उस पद्मावतीपुरीका नाम कुमुद्वती हो गया। जो मनुष्य एकाग्रचित्त हो कुमुद्वतीपुरीमें श्राद्ध करते हैं, उनके पितर कभी स्वर्गसे नीचे नहीं गिरते। वहाँका श्राद्ध अक्षय होता है।

व्यास! यह कुशस्थलीपुरी किस प्रकार अमरावती नामसे प्रसिद्ध हुई, वह प्रसंग सुनो। एक समय मुनिश्रेष्ठ मरीचिनन्दन कश्यपजीने अपनी पत्नीके साथ परम सुन्दर महाकाल वनमें बड़ी कठोर तपस्या की। तपस्या करते-करते जब एक सहस्र वर्ष पूरे हो गये, तब आकाशवाणी हुई—‘द्विजश्रेष्ठ! तुमने फलकी इच्छासे यह तीव्र तपस्या की है, इसलिये जबतक सूर्य और चन्द्रमा रहेंगे तबतक इस पृथ्वीपर तुम्हारी सन्तति बनी रहेगी। तुम्हारी पतिव्रता पत्नी अदितिने भी तुम्हारे साथ रहकर तप किया है, इसलिये यह यशस्विनी देवी सदा छायाकी भाँति तुम्हारे साथ रहेगी। श्रीविष्णु (वामन) और चन्द्रमा आदि सब देवता जो तुम्हारे पुत्र हैं, देवलोकमें अजर-अमररूपमें विख्यात होंगे। ऋषिश्रेष्ठ! तुम भी मेरे वचनसे पापरहित प्रजापति होओगे।’

तभीसे महर्षि कश्यप अदिति और अग्निके साथ कुशस्थलीपुरीमें सदा निवास करते हैं। इसीलिये देवता, असुर और मानवरूप उनकी समस्त प्रजा सदा वृद्धिको प्राप्त होती है। व्यास! देवताओंने महाकाल वनमें ही अमृत-पान किया था, इसलिये वे अमर हो गये। उत्तम महाकाल वनमें ही जो नन्दनवन है, वहीं सब मनोरथों एवं वरोंको देनेवाली कामधेनुका निवास बताया गया है। समस्त ब्रह्माण्डमें जो दिव्य वस्तुएँ हैं, वे सब उत्तम महाकाल वनमें स्थित हैं। यहाँ अमरोंकी स्थिति है, इस कारण

* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य *९४३

इस पुरीका नाम अमरावती हुआ। जो इस पुरीमें स्नान, दान आदि करके भगवान् महेश्वरका दर्शन करता है, उसके लिये पुत्र या धन आदि कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है। वह समस्त भोगोंको पाता है और मृत्युके पश्चात् भगवान् शिवके धाममें जाता है।

महाभाग व्यास! यह अमरावतीपुरी जिस प्रकार विशाला नामसे विख्यात हुई, वह प्रसंग भी सुनो। एक समय भगवती उमाने शिवजीसे कहा—'समस्त जगत्को धारण करनेवाले देवदेव जगदीश्वर ! आप मेरे निवासके लिये समस्त कामनाओंको देनेवाली पुरीका निर्माण कीजिये।' पार्वतीजीका यह वचन सुनकर भगवान् शिवने सबके मनको प्रिय लगनेवाली सुन्दर पुरीका निर्माण किया, जो बहुत ही विशाल, विस्तृत, पुण्यमयी तथा पुण्यात्माओंका आश्रय थी। विशाल होनेके कारण ही उस सदा रहनेवाली पुरीका नाम 'विशाला' हुआ। जहाँ कहीं किसी भी अवस्थामें रहकर भी जो नित्य विशाला नामका उच्चारण करता है, वह मनुष्य भगवान् शिवके धाममें प्रतिष्ठित होता है। व्यास ! इस समस्त पृथ्वीपर या सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें विशालाके समान भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली दूसरी कोई पुरी नहीं है। जो मनुष्य श्राद्धकालमें पितरोंके उद्देश्यसे यहाँ दान करते हैं, उनका वह सब दान अक्षय होता है। जिन्होंने कभी दूसरे कार्यके प्रसंगसे भी विशालापुरीमें आकर स्नान, दान आदि पुण्यकार्य किया है, वे जहाँ कहीं भी मृत्युको प्राप्त होनेपर भगवान् शिवके ही धाममें जाते हैं। व्यासजी ! इस प्रकार इस कुशस्थली-पुरीका नाम विशाला हुआ है।


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काष्ठा, कला आदि कालमान, युग और कल्पभेद तथा प्रतिकल्पपुरीका माहात्म्य

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यास ! पंद्रह निमेषोंकी एक काष्ठा होती है, तीस काष्ठाओंकी एक कला होती है, तीस कलाओंका एक मुहूर्त होता है और तीस मुहूर्तोंका एक दिन-रात होता है, ऐसा मनीषी पुरुषोंका कथन है। चन्द्रमा और सूर्यकी गति भी बतायी जाती है। सूर्यकी गतिविशेषसे मनुष्योंका दिन तथा रात्रि होती है। पंद्रह दिन-रातका एक पक्ष होता है। दो पक्षोंका मास और दो मासकी ऋतु कही जाती है। तीन ऋतुओंका एक अयन होता है। दो अयन मिलाकर एक वर्ष होता है। दक्षिणायन और उत्तरायण यही दो अयन हैं। इस मानके अनुसार जो दो पक्षोंका मास होता है, वही पितरोंका दिन-रात है। शुक्ल पक्ष उनका दिन और कृष्ण पक्ष उनकी रात्रि है। इसीसे पितरोंका श्राद्ध कृष्ण पक्षमें किया जाता है। मनुष्योंके कालमानके अनुसार जो एक वर्ष होता है, वही देवताओंका दिन-रात है। उत्तरायण उनका दिन है और दक्षिणायन रात्रि। देवताओंके चार हजार वर्षका एक सत्ययुग होता है। उतने ही सौ वर्षोंकी उसकी सन्ध्या और सन्ध्यांश है। देवताओंके तीन हजार वर्षका त्रेता और तीन-तीन सौ वर्षके उसके सन्ध्या-सन्ध्यांश होते हैं। दो हजार वर्षोंका द्वापर बताया गया है और दो-दो सौ वर्षोंके उसके सन्ध्या-सन्ध्यांश हैं। एक सहस्र दिव्य वर्षोंका कलियुग होता है और सौ-सौ वर्षके उसके सन्ध्या-सन्ध्यांश कहे गये हैं। इस प्रकार चारों युगोंकी वर्ष-संख्या दिव्यमानसे बारह हजार बतायी गयी है। सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—इन चारोंको एक चतुर्युग कहते हैं। इकहत्तर चतुर्युगका एक मन्वन्तर बताया गया है। एक सहस्र युगका ब्रह्माजीका एक दिन बताया गया है। उसीको कल्प कहते हैं। उतने ही युगोंकी ब्रह्माजीकी रात्रि भी बतायी जाती है। ब्रह्माकी उस रात्रिमें पर्वत, वन और काननोंसहित समस्त पृथ्वी जलमें डूब जाती है।

९४४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


रात्रिके सहस्र युग पूर्ण हो जानेपर पुनः ब्रह्माजीका दिन आरम्भ होता है। उनके पूरे एक दिनके समयको पूर्णतः एक कल्प कहते हैं। पूर्वोक्त इकहत्तर चतुर्युगसे कुछ अधिक समय बीतनेपर एक मन्वन्तर पूरा होता है। इन मनुओंकी संख्या चौदह बतायी गयी है। ये मनु अपने कुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले हैं। समस्त वेदों और पुराणोंमें ये प्रभावशाली तथा समस्त प्रजाओंके पालक बताये गये हैं। इन सबका कीर्तन धन्य है। एक सहस्र चतुर्युग पूर्ण हो जानेपर एक कल्पका समय समाप्त हो जाता है। उसमें सूर्यकी प्रचण्ड किरणोंसे सम्पूर्ण प्राणी दग्ध हो जाते हैं। ब्रह्मर्षिगण द्वादश आदित्योंके साथ ब्रह्माजीको आगे करके सुरश्रेष्ठ भगवान् नारायणमें प्रवेश कर जाते हैं। वे अव्यक्त सनातनदेव श्रीहरि ही ब्रह्मा आदिके रूपमें प्रत्येक कल्पमें बार-बार समस्त प्राणियोंकी सृष्टि करते हैं। यह सम्पूर्ण जगत् उन्हींका है। वे ही परमेश्वर परम सुन्दर महाकाल वनमें ब्रह्मा और महादेवजीके साथ निवास करते हैं। उत्तम महाकाल वनमें प्रलयकाल भी बाधा नहीं पहुँचाता। यह कुशस्थली-पुरी कल्प-कल्पमें अत्यन्त मनोहर होती जाती है। युग-युगमें पाप-तापसे रहित निर्भय और निर्विकार होती है।

व्यास! पूर्वकालसे ही इसी प्रकार प्रत्येक कल्पमें सृष्टिका आरम्भ होता है। वाराह, वामन, विष्णु और पितरोंके जो भिन्न-भिन्न कल्प बताये गये हैं, वे सभी इस कल्पान्तमें महाकाल वनमें ही प्रारम्भ हुए हैं। इस वनमें चौरासी कल्प व्यतीत हो गये। अतः उतने ही ज्योतिर्लिंग इस वनमें विराजमान हैं। पृथ्वी, समुद्र और पर्वत बार-बार उत्पन्न और नष्ट होते रहते हैं। भविष्यमें भी वे इसी प्रकार उत्पन्न और नष्ट होंगे। परंतु यह पुरी अचल मानी गयी है। इसीलिये सब समय और सब लोकोंमें इसकी महिमाका गान किया जाता है। यह प्रतिकल्पमें अचल रहती है। इसलिये इस पृथ्वीपर यह 'प्रतिकल्पा' नामसे विख्यात होगी।

वैशाखकी पूर्णिमाको प्रतिकल्पापुरीमें जाकर भगवान् महेश्वरका दर्शन करे और एक दिन उन्हें स्नान करावे। जो मानव किसी दूसरे प्रसंगसे भी शिप्रा नदीके जलमें स्नान करता है, उसके भीतर किंचिन्मात्र भी पाप शेष नहीं रहता और वह विष्णुलोकको जाता है। प्रत्येक कल्प और कल्पान्तमें यह पुरी अपने पूर्वरूपमें ही बनी रहती है। इसलिये सब लोगोंमें यह 'प्रतिकल्पा' के नामसे विख्यात है। जो मनुष्य इस पुरीके प्रति प्रेम रखते हैं, उनके लिये यह कल्पभेद नहीं होता।

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शिप्राका माहात्म्य, उसके 'ज्वरघ्नी' और 'अमृतोद्भवा' आदि नाम पड़नेका कारण

सनत्कुमारजी कहते हैं—महाभाग व्यास! इस पृथ्वीपर शिप्रा नदीके समान दूसरी कोई नदी नहीं है। जिसके तटका दर्शन करनेमात्रसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है, फिर दीर्घकालतक सेवन करनेसे तो कहना ही क्या है। वैकुण्ठमें इसका नाम 'शिप्रा' है, देवलोकमें यह 'ज्वरघ्नी' कहलाती है, यमद्वारमें 'पापघ्नी' के नामसे प्रसिद्ध है, पातालमें इसे 'अमृत-सम्भवा' कहते हैं और वाराहकल्पमें इसका नाम 'विष्णुदेहा' कहा गया है। अवन्तीपुरीमें भी 'शिप्रा' के नामसे ही इसकी ख्याति है। यह नदी साक्षात् कामधेनुसे प्रकट हुई है। वैकुण्ठलोकसे उत्पन्न होकर शिप्रा नदी तीनों लोकोंमें विख्यात हुई है। व्यास! शिप्राका नाम ज्वरघ्नी क्यों हुआ, यह बताता हूँ, सुनो। अनिरुद्धसे अपमानित होकर दैत्यराज बाणासुरने जब भगवान् श्रीकृष्णके साथ अपनी सहस्रों भुजाओंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर युद्ध किया, तब वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने क्षुरप्र नामक शीघ्रगामी बाणके द्वारा शीघ्रतापूर्वक

  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९४५

उसकी सहस्र भुजाओंको काट डाला (केवल दो भुजाएँ शेष छोड़ दीं)। भुजाएँ कट जानेसे बाणासुरका उत्साह भंग हो गया। वह उस युद्धसे पीड़ित हो भगवान् शंकरकी शरणमें गया। अपने समीप आये हुए भयविह्वल बाणासुरको देखकर भगवान् शिवको बड़ी दया आयी। वे, युद्धमें जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अविचलभावसे खड़े थे, वहाँ गये और बाणोंकी वर्षा करते हुए उन्होंने श्रीकृष्णको आगे बढ़नेसे रोका। फिर तो दोनोंमें बड़ा भयंकर संग्राम छिड़ गया। भगवान् शिवने माहेश्वर ज्वरको प्रकट किया। यह देख श्रीकृष्णने भी वैष्णव ज्वरकी सृष्टि की। फिर वे दोनों ज्वर एक-दूसरेसे भयंकर युद्ध करने लगे। अन्तमें माहेश्वर ज्वर भाग खड़ा हुआ। वह सब लोकोंमें घूमता फिरा, पर कहीं भी उसे शान्ति नहीं मिली। अन्तमें वह महाकाल वनमें आया और वैष्णव ज्वरसे पीड़ित हो शिप्रा नदीके जलमें कूद पड़ा। इससे उसको बड़ी शान्ति मिली। माहेश्वर ज्वरको शान्त हुआ देख वैष्णव ज्वरने भी वहाँ पहुँचकर शिप्राके जलमें स्नान किया। उस जलके प्रभावसे विष्णु और शिव दोनोंके ही ज्वर शान्त एवं विनष्ट हो गये। इसलिये शिप्रा नदी सब समयमें ज्वरका तत्क्षण नाश करनेवाली मानी गयी है। ज्वरसे पीड़ित एवं परम दुःखित हुए जो मानव एकाग्रचित्त हो शिप्रामें गोता लगाते और उसके तटपर निवास करते हैं, उन्हें ज्वरजनित पीड़ा कभी कष्ट नहीं देती है।

महामते व्यास ! एक समयकी बात है। भगवान् शिव हाथमें कपाल लेकर नागलोककी भोगवती-पुरीमें भिक्षाके लिये गये और घर-घर घूमकर उन्होंने 'भिक्षां देहि' (भिक्षा दो) की रट लगायी। किंतु उन भूखे भगवान् शिवको किसीने भी भिक्षा नहीं दी। तब वे पुरीसे बाहर निकले और उस स्थानपर गये, जहाँ नागलोकके संरक्षणमें अमृतके इक्कीस कुण्ड भरे हुए थे। वहाँ पहुँचकर सर्वान्तर्यामी भगवान् शंकरने अपने तृतीय नेत्रके मार्गसे अमृतके समस्त कुण्डोंको पी लिया और फिर वहाँसे उठकर चल दिये। यह सब देख-सुनकर समस्त नागलोक काँप उठा और सब एक-दूसरेसे पूछने लगे, 'यह किसका कर्म है? किसने क्या कर दिया है, जिससे इन कुण्डोंका अमृत यहाँसे चला गया?'

परस्पर ऐसा कहकर वासुकि आदि सभी नाग किसी महात्माका अपराध हो जानेकी आशंकासे नगर छोड़कर बाहर निकले और 'क्या करें, कहाँ जायँ? अब हमारा जीवन-निर्वाह कैसे होगा?' इत्यादि रूपसे चिन्ता प्रकट करते हुए स्त्री-बालकोंके साथ वे मन-ही-मन भगवान् श्रीहरिकी शरणमें गये। तब उनपर अनुग्रह करनेके लिये आकाशवाणी हुई—'नागगण! तुमलोगोंने घरपर आये हुए देवताका अपमान किया, अतिथिसत्कारका समय जानकर हाथमें कपाल लिये भिक्षुके वेषमें भिक्षा लेनेके लिये साक्षात् भगवान् शंकर तुम्हारे द्वारपर आये थे। परंतु भोगवतीपुरीमें किसीने भी उनको भिक्षा नहीं दी, तब वे बाहर चले गये हैं। इसी व्यतिक्रमके कारण तुम्हारे कुण्डोंका सम्पूर्ण अमृत नष्ट हो गया है। अब तुमलोग पातालसे निकलकर उत्तम महाकाल वनमें जाओ। वहाँ तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली श्रेष्ठ नदी शिप्रा बहती है, जो समस्त कामनाओं और फलोंको देनेवाली है। वहाँ जाकर तुम सब लोग विधिपूर्वक स्नान और देवाधिदेव भगवान् शिवका भजन करो। ऐसा करनेपर नागलोकमें तुम्हारी नष्ट हुई अमृतराशि पुनः प्राप्त हो जायगी।'

इस आकाशवाणीको सुनकर सब नाग स्त्री-बालक और वृद्धोंके साथ महाकाल वनमें गये। उन्होंने उस त्रिभुवनवन्दिता शिप्रा नदीका दर्शन किया। इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और वहाँ स्नान-दानादि करके उन्होंने महादेवजीकी आराधना की। कभी मलिन न होनेवाली कमलपुष्पोंकी माला, नाना प्रकारके फूल, अक्षत, वस्त्र, पुष्पहार, अनुलेपन, चन्दन, गन्ध, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, दक्षिणा और कपूरकी आरती आदि पूजनसामग्री लेकर वे सब-के-सब महादेवजीकी सेवामें उपस्थित

९४६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

हुए। उस समय अमृतकी इच्छा रखनेवाले नागोंने भगवान् शिवकी पूजा करके इस प्रकार उनका स्तवन किया।

नाग बोले— जिनका कहीं अन्त नहीं है, ऐसे ब्रह्मस्वरूप शिवको नमस्कार है। सर्वदेवमय शिव! आपको बार-बार नमस्कार है। चन्द्रचूड! जटाका मुकुट धारण करनेवाले! आपको नमस्कार है। शंकरात्मन्! आपको नमस्कार है। सबके साक्षी शंकर! आपको नमस्कार है। समस्त बीजोंकी उत्पत्तिके कारणभूत महादेव! आपको नमस्कार है। अमृतका स्रोत बहानेवाले ईश्वर! आपको नमस्कार है। कमनीय कामस्वरूप आपको नमस्कार है। सर्वकामवरप्रद! आपको नमस्कार है। शान्तस्वरूप शिवको नमस्कार है। पशुओं (अज्ञानी जीवों)-का पालन करनेवाले भगवान् पशुपतिको नमस्कार है। मृड (सुखस्वरूप), दान्त (मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले) और शान्तरूप आपको नमस्कार है।

नागोंके द्वारा इस प्रकार स्तुतिसे प्रसन्न किये हुए भगवान् शंकर प्रत्यक्ष दर्शन देकर बोले— नागगण! किसी पूर्वपुण्यके प्रभावसे तुम सब लोग नागलोक छोड़कर इस उत्तम महाकाल वनमें आये हो और बालकों, वृद्धों तथा स्त्रियोंके साथ तुमने सरिताओंमें श्रेष्ठ शिप्राका दर्शन किया है। तुम सब श्रेष्ठ नागोंने शिप्रामें स्नान किया है। अतः उसके पुण्यप्रभावसे तुम्हारे घर-घरमें अमृत प्राप्त होगा। तुम शिप्राका जल ले जाकर अपने अमृत-कुण्डोंमें छिड़क दो। उससे वे इक्कीसौं कुण्ड अमृतसे भर जायँगे और स्थिर रहेंगे।

तब उन नागोंने 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान् महेश्वरको प्रणाम किया और अपने हाथोंमें शिप्रा नदीका जल लेकर वे नागलोकमें लौट गये। तबसे नागलोकमें शिप्राका नाम अमृतोद्भवा (या अमृतसम्भवा) प्रसिद्ध हुआ। जो मनुष्य इसमें स्नान-दानादि पुण्यकर्म करते हैं, उनका पाप शेष नहीं रहता तथा उन्हें कभी आपत्ति और दुर्गति नहीं देखनी पड़ती।


जय-विजयको सनकादिका शाप, भगवान्का वाराहावतार, वाराहके हृदयसे शिप्राकी उत्पत्ति तथा उसका माहात्म्य

सनत्कुमारजी कहते हैं— महाभाग! शिप्रा नदी सर्वत्र पुण्यदायिनी, अतिशय पवित्र तथा पापहारिणी है। परंतु अवन्तीपुरीमें उसका यह महत्त्व बहुत बढ़ जाता है। पूर्वकालमें अनुपम तेजस्वी भगवान् विष्णुके मनोहर वैकुण्ठधाममें जय और विजय नामवाले दो द्वारपाल थे। दोनों ही बड़े पराक्रमी थे और सदा हाथमें डंडा लिये वैकुण्ठके द्वारपर खड़े रहते थे। मुनिश्रेष्ठ! एक समय ब्रह्माजीके मानसपुत्र सनकादि स्वेच्छासे सब लोकोंमें भ्रमण करते हुए भगवान् विष्णुके परम धाममें आये। उनके मनमें श्रीविष्णुके दर्शनकी बड़ी लालसा थी। द्वारपर आते ही द्वारपालोंने उन्हें सहसा रोक दिया। उनके धक्के खाकर वे चारों कुमार वहाँकी भूमिपर गिर पड़े और मूर्च्छित हो गये। द्वारपालोंके इस बर्तावसे उन्हें बड़ा दुःख हुआ। इतनेमें ही कमलके समान नेत्रवाले महाबाहु भगवान् विष्णु भी वहाँ आ गये। उन्होंने पृथ्वीपर दुःखित होकर पड़े हुए उन कुमारोंको ज्यों ही देखा, सहसा आगे बढ़कर उन्हें अपनी गोदमें उठा लिया। मधुसूदनने उन कुमारोंका मस्तक सूँघा और भुजाओंमें कसकर छातीसे चिपका लिया। तदनन्तर पूछा—'महात्माओ! आपको यह मूर्च्छा कैसे आ गयी। किसने आपलोगोंको इस भारी दुःखमें डाला है?'

कुमार बोले— महाराज! हम आपके दर्शनकी अभिलाषासे वैकुण्ठधामके भीतर आ रहे थे कि सहसा इन बलोन्मत्त द्वारपालोंने हमें रोक दिया, इसीसे हमें यह दशा प्राप्त हुई है। अतः आजसे इस स्थानपर इनकी सनातन स्थिति न हो, ये दोनों असुरयोनिको प्राप्त हो जायँ।

  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९४७

सनकादि कुमारोंके इतना कहते ही वे दोनों जय और विजय तत्काल आसुरी योनिमें चले गये। वे दोनों प्रथम जन्ममें 'हिरण्यकशिपु' और 'हिरण्याक्ष', दूसरे जन्ममें 'कुम्भकर्ण' तथा 'रावण' और तीसरे जन्ममें 'दन्तवक्र' एवं 'शिशुपाल' कहलाये। हिरण्याक्ष नामक दैत्य बड़ा बलवान् था। वह सब देवताओंको जीतकर स्वयं ही उनके लोकोंका अधिकारी बन बैठा। राज्यभ्रष्ट देवता पराजित होकर स्वर्गसे निकाल दिये गये। उस समय सब लोग पाखण्डी, पराक्रमशून्य तथा धर्मविमुख हो गये। 'सब कुछ ब्रह्म ही है' ऐसा कहते हुए दम्भी दैत्य पशुओंके समान आचरणवाले हो गये थे।

संसारकी ऐसी दुरवस्था देख भगवान् महाविष्णुने विचार किया कि जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मका उत्थान होता है, तब-तब मैं अपने-आपको संसारमें प्रकट करता हूँ।* अतः अब मुझे अवतार ग्रहण करना चाहिये। ऐसा सोचकर उन्होंने लीलासे ही श्वेतद्वीपके समान परम उज्ज्वल मंगलमय दिव्य वाराहशरीर धारण किया, जो पूर्णतः यज्ञमय था। यूप (यज्ञस्तम्भ) ही उनकी दाढ़ें थीं, हविष्यकी गन्ध ही उनके शरीरकी दिव्य गन्ध थी, बीज और ओषधियाँ ही उनकी रोमावलि थीं और चारों वेद ही उनके चार चरण थे। साक्षात् आदिपुरुष परमेश्वर ही, जिनके अनेकों नाम हैं और वेदोंमें जिनकी अनेक प्रकारसे स्तुति की गयी है, वाराहरूपसे प्रकट हुए थे। उन्होंने बड़ा भारी संग्राम करके उस दुर्धर्ष दैत्य हिरण्याक्षको मार डाला। उससे पीड़ित हुई यह पृथ्वी रसातलको चली गयी थी। उसे भगवान् वाराह अपनी दाढ़से उठाकर ऊपर ले आये। हिरण्याक्षके अनुगामी बहुतसे दैत्य मारे गये। शेष सभी भागकर पातालमें चले आये। उस समय पवित्र वायु चलने लगी। सूर्य उत्तम प्रभासे परिपूर्ण हो गये। अग्निकुण्डोंकी बुझी हुई अग्नियाँ पुनः प्रज्वलित हो उठीं और दिशाओंमें जो कोलाहल होते रहते थे, वे सब शान्त हो गये।

भगवान् वाराहमूर्ति सम्पूर्ण कामनाओं और फलोंको देनेवाले हैं। वे आनन्दसे परिपूर्ण दैव, दैत्योंका संहार करनेवाले तथा भक्तोंको वर देनेवाले हैं। उन्हींके हृदयसे यह सनातन नदी शिप्रा प्रकट हुई है, जो आनन्दमय जलसे परिपूर्ण तथा आनन्ददायक वर देनेवाली है। रमणीय महाकाल वनमें परम सुन्दर पद्मावतीपुरी है। उस पुरीमें सुन्दर कुण्ड परम रम्य प्राचीन और शुभ है। उसमें स्नान करके सब मनुष्य सनातन शिवलोकको जाते हैं। व्यास! उसी सुन्दर वनमें लोकपावनी शिप्रा लीन हुई है। भगवान् वाराहने समस्त दुष्ट दैत्योंका संहार करके देवताओंको निर्भय कर दिया। तदनन्तर इन्द्र आदि सब देवताओंने हाथ जोड़कर उन महाविष्णुको नमस्कार किया और सामने खड़े होकर इस प्रकार पूछा।

देवता बोले—देवदेव! जगन्नाथ! आपके गुणोंका श्रवण और कीर्तन परम पुण्यमय है। कृपया यह बताइये कि किस पुण्यके प्रभावसे हमें स्वर्गलोक प्राप्त हो सकता है?

भगवान् वाराह बोले—देवताओ! महाकाल वनमें तुम्हारी मनोरथसिद्धिका कारणभूत गुह्यसे भी गुह्य पुण्य-स्थान है। जहाँ मेरे शरीरसे उत्पन्न हुई शिप्रा नदी लीन हुई है, वह स्थान लीनगंगाके नामसे विख्यात है। जहाँ सरिताओंमें श्रेष्ठ लीनगंगा, प्राची, सरस्वती, पुष्कर, गयातीर्थ तथा शुभ पुरुषोत्तम सरोवर है, उस शिप्रा नदीको जाओ।

देवाधिदेव जगद्गुरु भगवान् वाराहका यह वचन सुनकर ब्रह्मा, इन्द्रादि सब देवता परम सुन्दर महाकाल वनमें, जहाँ सरिताओंमें श्रेष्ठ शिप्रा बहती हैं, गये। वहाँ स्नान-दानादि शुभकर्म करके उस पुण्यके प्रभावसे वे अपने-अपने लोकको प्राप्त हुए। व्यासजी! इस प्रकार शिप्रा नदी सम्पूर्ण लोकोंको पवित्र करनेवाली बतायी गयी है।


* यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्॥ (स्क० पु०, आ० अव० मा० ६३।४०)

९४८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

क्षातासंगम तथा उसके निकटवर्ती तीर्थोंकी महिमा, राजा युगादिदेवके धर्ममय राज्यकी प्रशंसा

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यास ! अब क्षाता नदीके संगमसे प्रकट हुए एक अन्य तीर्थका माहात्म्य बताया जाता है, जिसमें स्नान करनेमात्रसे मनुष्य महान् पातकोंसे मुक्त हो जाता है। जब अमावास्या और शनिवारका योग हो, तब मनुष्य एकाग्रचित्त होकर पितरोंके उद्देश्यसे श्राद्ध तथा तिल और जलसे तर्पण करे। तत्पश्चात् स्थावर लिंगके रूपमें प्रतिष्ठित उत्तम शनैश्चर देवका दर्शन करे। जो ऐसा करता है, उसे कभी शनैश्चर ग्रहसे पीड़ा नहीं होती। नर्मदा, चर्मण्वती और क्षाता—ये तीन नदियाँ पूर्वकालमें अमरकण्टक पर्वतसे पृथ्वीपर प्रकट हुईं। ये तीनों ही तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली हैं। क्षाता नर्मदा नदीका साथ छोड़कर उत्तम विन्ध्यगिरिका भेदन करती हुई परम सुन्दर महाकाल वनमें चली आयी, जहाँ सरिताओंमें श्रेष्ठ शिप्रा तथा परम पुण्यमयी यह अमरावतीपुरी है। यहाँ आकर क्षाता नदी पूर्वकालमें जहाँ शिप्राके साथ मिली थी, वहाँ 'क्षातासंगम' नामक उत्तम तीर्थ प्रकट हो गया।

यज्ञकुण्डसे उत्तर भागमें, जहाँ पवनपुत्र हनुमान्जी विराजमान हैं, 'धर्मसरोवर' नामसे विख्यात एक उत्तम तीर्थ है। पवनकुमार हनुमान्जीने वहीं तपस्याके द्वारा उत्तम सिद्धि प्राप्त की थी। जो मनुष्य उस तीर्थमें स्नान करके काँसेका पात्र दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। जो श्रावणमासके शुक्ल पक्षकी एकादशी तिथिको उत्तम आचारका पालन करते हुए धर्मतीर्थमें स्नान और दानादि सत्कर्म करता है, उसे सनातन विष्णुलोककी प्राप्ति होती है। च्यवनजीके आश्रममें स्नान करके मनुष्य च्यवनेश्वर शिवका दर्शन करे, जहाँ वैद्योंमें श्रेष्ठ दोनों अश्विनीकुमार सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। च्यवन मुनिकी कृपासे ही अश्विनीकुमारोंने देवताओंकी पंक्तिमें स्थान प्राप्त किया था और च्यवनने भी वहीं अश्विनीकुमारोंकी चिकित्सासे खोयी हुई दृष्टि प्राप्त की थी। द्विजश्रेष्ठ ! उस तीर्थमें मनुष्य दिव्य दृष्टि प्राप्त करता है। वहीं भगवान् सूर्यने अग्निहोत्रसहित उत्तम आसन प्राप्त किया है। उसी तीर्थके प्रभावसे महाभागा संज्ञा और विश्वविख्यात सावित्रीने सूर्यलोकमें जाकर विपुल ऐश्वर्यका उपभोग किया है। अतः क्षातासंगमतीर्थ बहुत उत्तम, सब पापोंको हर लेनेवाला, पुण्यवर्धक तथा समस्त कामनाओं एवं वरोंको देनेवाला है।

व्यासजी ! प्राचीन कालकी बात है। पुण्यमय सत्ययुगमें युगादिदेव नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। वे बड़े धर्मात्मा थे। उनके गुणोंका श्रवण और कीर्तन भी पुण्यजनक माना गया है। वे प्रजाको अपने सगे पुत्रोंकी भाँति मानकर उसका भलीभाँति पालन करते थे। उनकी प्रजा सब साधनोंसे सम्पन्न तथा सब ओरसे सदैव उन्नतिशील थी। उनके शासनकालमें धर्म अपने चारों चरणोंसे युक्त था। सदा समयपर वर्षा होती और सब ऋतुएँ अपने अंगोंसे सम्पन्न होकर आती थीं। पृथ्वीपर अनाज और फल अधिक पैदा होता था। उस राजाके राज्यमें कोई भी मनुष्य आधि-व्याधिसे पीड़ित नहीं दिखायी देते थे। स्त्रियाँ भी दुःशीला, दुर्भगा और विधवा नहीं देखी जाती थीं। उनमें बहुत पुत्रोंवाली, थोड़े पुत्रोंवाली, मरे पुत्रोंवाली अथवा वन्ध्या भी कोई दृष्टिगोचर नहीं होती थीं। सभी रूपवती, सुशीला, गुणवती तथा पातिव्रतधर्मका पालन करनेवाली थीं। राह-बाटमें शत्रुओंका आक्रमण नहीं होता था। चोर-डाकुओंका भी भय नहीं रहता था। घर-घरमें सदा यही शब्द सुनायी पड़ता था कि होम करो, भोजन कराओ और सदा दान देते रहो। जप, दान, तप, होम, स्तुति और यज्ञकर्मोंमें लगे हुए मनुष्य ही सर्वत्र दिखायी देते थे। वे सब धर्मोंका पालन करते थे। धर्म अपने चारों पैरोंसे चलता था, परंतु अधर्मका एक ही पाद था। राजा युगादिदेव ऐसे धर्मात्मा थे। उन्होंने धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन किया और अपनी प्रजाको बढ़ाया। व्यासजी ! अवन्तीपुरीमें भी राजा युगादिदेवने करोड़ों यज्ञोंका अनुष्ठान किया था।


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* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९४९

गयातीर्थकी महिमा, पुरुषोत्तममास और पुरुषोत्तमतीर्थकी महत्ता तथा गोमती कुण्डका माहात्म्य

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यास ! 'कुमुद्वती पुरी' (उज्जयिनी) में गया नामक तीर्थ भी है। गयामें जो-जो तीर्थ और पुण्यस्थान हैं, वे सब इस तीर्थमें भी निश्चित रूपसे वर्तमान हैं। इस गयातीर्थमें स्नान करके मनुष्य मुख्य गयातीर्थके विभिन्न फलोंको प्राप्त करता है। यहाँका गयाक्षेत्र गयाश्राद्धका भी फल देनेवाला है। प्रधान गयाकी भाँति इस तीर्थमें भी श्रेष्ठ नदी 'फल्गू' है, जो वैसा ही फल देनेवाली है। यहाँ भी आदिगया, बुद्धगया और विष्णुपदतीर्थ है। कोष्ठक भगवान् गदाधरके चरणचिह्न, सोलह वेदियाँ, अक्षयवट, प्रेतोंको मुक्त करनेवाली शिला, अच्छोदा नामवाली नदी तथा पितरोंका उत्तम आश्रम भी है। इन सब स्थानोंमें स्नान-दानादि क्रिया करनी चाहिये और विधिपूर्वक श्राद्धका दान भी देना चाहिये। जो ऐसा करता है, उसे उस तीर्थका फल प्राप्त होता है। गयामें जो पितरोंका लोक है, वहाँ साक्षात् भगवान् विष्णु विराजमान हैं। उन कमल-नयन श्रीहरिका ध्यान करके मनुष्य तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाता है। वर्षभरमें एक पक्ष गयाश्राद्धके लिये प्रतिष्ठित है। भगवान् सूर्य जब हस्त नक्षत्र एवं कन्याराशिपर स्थित हो, तब आश्विन कृष्णपक्षमें महालय काल बताया गया है। उस समय पितरोंके लिये जो कुछ दिया जाता है, वह सब अक्षय होता है। व्यासजी ! स्नान-दानादि कर्मोंके लिये परम मनोहर अवन्ती पुरी बहुत उत्तम है।

व्यासजीने कहा—प्रभो ! आपने पहले 'पुरुषोत्तम' तीर्थकी भी चर्चा की है। अतः उस तीर्थकी भी महिमा विस्तारपूर्वक बताइये।

सनत्कुमारजी बोले—द्विजश्रेष्ठ ! पूर्वकालकी बात है। भगवान् लक्ष्मीपति शुभ एवं निर्मल वैकुण्ठधाममें अपने पार्षदों, सनकादि महर्षियों तथा ब्रह्मा आदि देवेश्वरोंसे घिरे हुए बैठे थे। इन सबके बीचमें भगवती महालक्ष्मीने पूछा—

'प्राणनाथ ! पुण्यकी विधि क्या है? इसको मैं सुनना चाहती हूँ।'

भगवान् विष्णु बोले—कल्याणी ! स्नान, दान और तपस्या सदा ही उत्तम है तथापि यदि वह विधिसे प्राप्त हो तो सब अक्षय होता है। पूर्णिमा, अमावास्या, संक्रान्ति, ग्रहण, वैधृति तथा व्यतीपात योगमें किया हुआ दान परम समृद्धिदायक माना गया है। गंगा, भास्करक्षेत्र, अरुणक्षेत्र, पुष्कर, गोदावरी नदी और गयातीर्थमें तथा अमरकण्टक पर्वत एवं अवन्ती पुरीमें किया हुआ होम और दानादि सब कर्म अक्षय होता है। अतः सर्वथा प्रयत्न करके पर्वोंपर तीर्थसेवन करना चाहिये।

लक्ष्मीजीने पूछा—भगवन् ! कौन-कौनसे योग हैं और उनमें करने योग्य कर्म भी कौन हैं? यह सब विशेषरूपसे बतानेकी कृपा करें।

श्रीभगवान् बोले—प्रिये ! तीन वर्षपर मलमास पर्व आता है। इसमें सूर्यकी संक्रान्ति नहीं होती, इसलिये इसको अधिकमास कहा गया है। मैं पुरुषोत्तम ही इस अधिकमासका अधिपति हूँ, इसीलिये इसे पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं। महाकाल वनमें मेरे नामका उत्तम तीर्थ है। वहाँ मेरा पुरुषोत्तमधाम सदैव विद्यमान है। पुरुषोत्तम मास आनेपर मनुष्य मेरी प्रसन्नताके लिये उत्तम व्रतका पालन करे। जो श्रेष्ठ मानव पुरुषोत्तम मासमें मध्याह्नके समय स्नान-दान, जप-होम, स्वाध्याय, पितृतर्पण तथा देवार्चन करते हैं, उनका वह सब कर्म अवश्य ही अक्षय होता है। जो मनुष्य अवन्ती पुरीमें मलमास व्रत करनेवाले हैं, उन्हें मैं प्रसन्नतापूर्वक धन देता हूँ। मलमासमें जो कुछ थोड़ा भी दान बन सके वह इस तीर्थमें करना चाहिये। वह मेरी प्रसन्नतासे अनन्तगुना हो जाता है। प्रिये ! जब संक्रान्तिशून्य मास (मलमास) मनुष्योंको प्राप्त हो, तब अपना हित चाहनेवाले लोगोंको उस समय बड़ा भारी

९५० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


उत्सव करना चाहिये। देवेश्वरी! कृष्णपक्षकी चतुर्दशी, नवमी अथवा अष्टमीको शोकनाशक व्रत करना चाहिये। पुण्य दिवसमें प्रातःकाल उठकर पहले पूर्वाह्नमें किये जानेवाले नित्य-कर्मोंका अनुष्ठान करे। तत्पश्चात् मुझ वासुदेवका मन-ही-मन स्मरण करते हुए नियम ग्रहण करे। उपवास, नक्त-व्रत (केवल रात्रिमें भोजन करना) तथा एकभुक्तव्रत (केवल दिनमें एक बार अन्न-ग्रहण)—इन तीनोंमेंसे किसी एक व्रतके पालनका निश्चय करके ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। वे ब्राह्मण सपत्नीक, सदाचारी, कुलीन एवं कुटुम्बी हों। तदनन्तर मध्याह्नकालमें नूतन एवं छिद्ररहित कलशके ऊपर लक्ष्मीसहित सनातन देव श्रीविष्णुकी स्थापना करे और ब्राह्मणोंद्वारा वेदमन्त्रोंका उच्चारण कराते हुए अपने भाई-बन्धुओंके साथ बैठकर उत्तम भक्तिके साथ ब्रह्माजीसहित भगवान् लक्ष्मीनारायणकी पूजा करे। पहले चन्दनयुक्त जलसे स्नान कराकर फिर पंचामृतसे स्नान करावे। तत्पश्चात् शुद्ध जलसे स्नान कराकर आच्छादनके लिये रेशमी वस्त्र भेंट करे। फिर गन्ध, चन्दन, पुष्प, तुलसीदल, धूप, दीप तथा भाँति-भाँतिके मिष्टान्नयुक्त नैवेद्य अर्पण करे। अन्तमें घण्टा, मृदंग, शंखध्वनि एवं दिव्य घोषके साथ कपूर, अगर और चन्दनके द्वारा व्रती पुरुष भगवान्‌की आरती उतारे। कर्पूरादि न मिले तो घीमें डुबोयी हुई रूईकी बत्तियोंसे भी आरती कर सकते हैं। उसके बाद ताँबेके अर्घ्यपात्रमें रखे हुए जल, चन्दन, अक्षत और फूलसे प्रसन्नतापूर्वक भगवान्‌को विशेषार्घ्य दे। पूजन एवं अर्घ्यदानके समय अपनी पत्नीको भी साथ रखे। अर्घ्यपात्रमें जल-चन्दनादिके साथ पंचरत्न भी रखना चाहिये। अर्घ्य देनेकी विधि इस प्रकार है—दोनों घुटनोंको जमीनपर टेककर दोनों हाथोंसे अर्घ्यपात्र उठाकर भक्तिपूर्वक भगवान्‌के आगे वह जल गिरावे। अर्घ्यका मन्त्र इस प्रकार है—

कृपावान् सर्वभूतेषु जगदानन्दकारकः।
गृहाणार्घ्यमिदं देव सम्पूर्णफलदो भव॥

'देव! आप सम्पूर्ण जीवोंपर कृपा रखनेवाले हैं। जगत्‌को आनन्द देनेवाले हैं; इस अर्घ्यको ग्रहण कीजिये और मुझे व्रतका पूर्णफल प्रदान कीजिये।'

इसके बाद निम्नांकित मन्त्र पढ़कर प्रार्थना करे—

स्वयम्भुवे नमस्तुभ्यं ब्रह्मणेऽमिततेजसे।
नमोऽस्तु ते श्रियानन्द ब्रह्मानन्द कृपाकर॥

'अमित तेजस्वी स्वयम्भू ब्रह्माजीको नमस्कार है। लक्ष्मीजी तथा ब्रह्माजीको आनन्द प्रदान करनेवाले कृपानिधान पुरुषोत्तम! आपको सादर नमस्कार है।'

इस प्रकार भगवान् गोविन्दकी प्रार्थना करके लक्ष्मीनारायणका स्मरण करते हुए स्वयं ही सपत्नीक ब्राह्मणोंका पूजन करे। विधिपूर्वक पूजा सम्पन्न करके उन्हें घृतपक्व एवं खीर आदिका भोजन करावे। विद्या-विनयसे सम्पन्न सपत्नीक ब्राह्मणको विधिवत् भोजन कराकर यथाशक्ति वस्त्र, अलंकार और कुंकुम आदिके द्वारा उनका सत्कार करे। घीमें तैयार किये हुए गेहूँके आटेकी पूरी, कचौरी आदि उत्तम-उत्तम मिष्टान्न, भाँति-भाँतिके फल, शर्करा और घृतसे तैयार किये हुए भोज्यपदार्थ, मूली, अदरक, अनेक प्रकारके साग और गोरस आदि पदार्थोंको मीठे वचन बोल-बोलकर परोसना चाहिये। 'प्रभो! इसका रस बड़ा स्वादिष्ट है; यह भोजन करनेयोग्य बहुत उत्तम है, इसे तो आपके लिये खास तौरपर तैयार किया गया है, आपको जो रुचता हो वह और माँग लीजिये' इत्यादि बातें कह-कहकर प्रेमपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। भोजनके पश्चात् ताम्बूल और दक्षिणा देकर उन्हें विदा करना चाहिये। ब्राह्मण-भोजनके अनन्तर व्रती पुरुष भाई-बन्धुओंके साथ स्वयं भोजन करे। प्रिये! जो नारी इस संसारमें मलमास व्रतका पालन करती है, उसे दरिद्रता, पुत्रशोक एवं विधवापन कभी प्राप्त नहीं होता। स्त्री हो या पुरुष, जो भी मलमासमें पूर्वोक्त व्रतका पालन करता है, वह उत्तम फलका भागी होता है।

भगवती लक्ष्मी जिनके चरणोंकी बड़े लाड़-

  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * | ९५१ ---|---

प्यारसे सेवा करती हैं, उन भगवान् पुरुषोत्तमकी लक्ष्मीसहित पूजा करके शंकरके साथ पार्वतीदेवीका भी पूजन करे। जो ऐसा करता है, वह सैकड़ों मनोवांछित फलोंको पाकर भगवान् विष्णुके लोकमें पूजित होता है। भाद्रपद शुक्ल पक्षकी एकादशी तिथिको एकाग्रचित्त होकर जो पुरुष पुरुषोत्तम-सरोवरमें स्नान करता है, उसे स्त्री, पुत्र, धन, आयु, आरोग्य और सम्पदा प्राप्त होती है। पुरुषोत्तम-सरोवरके ईशान कोणमें भृगुश्रेष्ठ परशुरामजीने आत्मशुद्धिके लिये तपस्या की है। वहींपर सब तीर्थोंका श्रेष्ठ फल प्रदान करनेवाली सरिताओंमें श्रेष्ठ 'कौशिकी' नदी भी है। उसमें स्नान करके मनुष्य जातिहत्याके दोषसे मुक्त होता है। वहीं भगवान् रामेश्वरका दर्शन करके मानव अपने सब पाप धो डालता है।

एक समय नैमिषारण्य क्षेत्रमें बैठे हुए शौनकादि मुनि आपसमें सब तीर्थोंके विषयकी पुण्यदायिनी शुभ कथा कह रहे थे। उस पुण्यमय अवसरपर देवर्षि नारदजीने काशीका उत्तम माहात्म्य वर्णन किया। तत्पश्चात् स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माने सब देवताओं तथा ऋषियोंके समक्ष इस प्रकार कहा—'समस्त पाताल और भूलोकमें गोमतीके समान दूसरी कोई नदी नहीं है, श्रीकृष्णके तुल्य कोई देवता नहीं हैं और द्वारकाके समान दूसरी कोई पुरी नहीं है।'

इस बातको निश्चितरूपसे जानकर वहाँ यत्र-तत्र बैठे हुए शौनकादि सभी ऋषियोंने वहीं गोमतीके तटपर प्रातःकाल सन्ध्योपासना की। महर्षि सान्दीपनि भी वहीं थे। उन्होंने भी गोमती-तटपर सन्ध्योपासना की। इस प्रकार दीर्घकालतक व्रतका पालन करनेवाले अवन्तीनिवासी सान्दीपनि मुनिके पास उन्हींकी कामना पूर्ण करनेके लिये सुकुमार अंगवाले ब्रह्मचारी बलराम और श्रीकृष्ण आये। उन्होंने गुरुजीसे कहा—'ब्रह्मन्! नदियोंमें श्रेष्ठ गोमती अब यहीं अवन्तीपुरीमें आ गयी है। यज्ञकुण्डमें गोमती और सरस्वती दोनोंका समागम हुआ है। गोमतीकुण्ड सब पापोंका नाश करनेवाला बताया गया है। भाद्रपदमासके कृष्ण पक्षकी अष्टमी तिथिको कृष्णजन्मके दिन उस कुण्डमें स्नान करके मनुष्य रात्रिमें जागरण करे और विधिपूर्वक उपवास करके शिष्यसहित व्यासजीकी पूजा करे। जो लोग एकाग्रचित्त होकर उस दिन गौ-ब्राह्मणोंकी पूजा करते हैं, उनके लिये सब लोकोंमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है। उन्हें गोमती-स्नानका पुण्य, भगवान् वासुदेवका समागम तथा सब मनोरथोंकी सिद्धि प्राप्त होती है। चैत्र शुक्ला एकादशीके दिन मनुष्य गोमतीकुण्डमें विशेषरूपसे स्नान करके रात्रिमें जागरण और भगवान् विष्णुका पूजन करे। तत्पश्चात् आमलकी यात्रा करे तो उसे पग-पगपर सहस्रों गोदानका फल प्राप्त होता है।


गंगेश्वर और विश्वेश्वरतीर्थका माहात्म्य, बलिके द्वारा देवताओंकी पराजय, ब्रह्माजीका देवताओंको विष्णुसहस्त्रनामस्तोत्रका उपदेश देना

सनत्कुमारजी कहते हैं—ब्रह्मन्! गंगेश्वरके समीप जहाँ आकाशगंगाका संगम है, वहाँ सब पापोंको हरनेवाला एक श्रेष्ठ तीर्थ है। इस भूतलपर वह तीर्थ धन्य है और महान् पुण्यफल देनेवाला है। वहीं भगवान् शंकरने आकाशसे गिरती हुई गंगाको अपने मस्तकपर धारण किया था। उस तीर्थमें स्नान करके यदि मनुष्य गंगेश्वरका दर्शन करे तो वह गंगास्नानका फल पाकर विष्णुलोकमें पूजित होता है। विश्वनाथजीके पास पहुँचकर विश्वेश्वरतीर्थमें जो निवास करता है, वह सब पापोंसे शुद्धचित्त होकर विष्णुलोकको पाता है।

प्राचीन कालमें भगवान् विष्णुकी भक्तिमें तत्पर रहनेवाले एक दैत्यराज हो गये हैं, जो प्रह्लादके नामसे विख्यात थे। प्रह्लादजी समस्त धर्मात्माओंमें

९५२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

श्रेष्ठ थे। उन्होंने आचरणके द्वारा धर्मपर विजय पायी, सत्यके द्वारा लक्ष्मीजीको जीता, धैर्यसे सम्पूर्ण लोक धारण किये, क्षमासे पृथ्वीको जीता, गम्भीरतासे दिव्य समुद्रको पराजित किया तथा शौर्यसे शत्रुगणोंको परास्त किया था। महात्मा प्रह्लादने विनयसे अतिथियोंको, दक्षिणासे यज्ञको और हविष्यसे अग्निदेवको जीत लिया था। बाहर-भीतरकी पवित्रता और सदाचारके पालनसे उनका अन्तःकरण पूर्णतः शुद्ध हो गया था। तपस्यासे उनका अशुभ नष्ट हो चुका था। दान, मान और भोजन-आच्छादनादिसे उन्होंने ब्राह्मणोंके हृदयको जीत लिया था। उन्होंने संस्कारसे जन्मको, दम (इन्द्रियसंयम) से सनातन आत्माको, प्राणायामसे वायुको और योगध्यानसे श्रीहरिको अपने वशमें कर लिया था। प्रह्लादजीके समान धीर कोई नहीं हुआ।

प्रह्लादजीके सदाचारी पौत्र बलिके नामसे प्रसिद्ध हैं। उनके शासनकालमें प्रजाकी उत्तरोत्तर वृद्धि होती थी। पृथ्वीपर कोई अल्पायु, जड़-मूर्ख, रोगी, ईर्ष्यालु, पुत्रहीन और धनहीन नहीं था। राजा बलि सम्राट् थे। वे प्रचुर दक्षिणाओंसे सम्पन्न अनेकानेक यज्ञ करते रहते थे। उन्होंने सात द्वीपोंवाली पृथ्वीका सदैव पालन किया है। एक समय राजा बलि सभाके बीच श्रेष्ठ सिंहासनपर बैठे थे। सब ओर उनकी जय-जयकार हो रही थी तथा पुराणों और स्मृतियोंकी दिव्य कथा-वार्ता चल रही थी। इसी समय वहाँ बहुत-से ऋषि पधारे। बड़े-बड़े दैत्य और दानव राजा बलिकी सेवामें उपस्थित हुए। सिद्ध, नाग, यक्ष, किन्नर और किंपुरुष आदि भी राजाके दरबारमें आये थे। इन सबके समागमसे दैत्यसम्राट् बलिकी वह परम दिव्य सभा बड़ी शोभा पा रही थी। तदनन्तर उस सभामें देवदर्शन नारदजी कहींसे आ गये। उन्हें देखकर सब दैत्य उठकर खड़े हो गये और सबने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। राजा बलिने नारदजीका स्वागत-सत्कार करके आसन दिया और उनका कुशल-समाचार पूछा।

तब आनन्दपूर्वक बैठकर देवर्षि नारदजीने कहा—दैत्यराज! भूतलपर सदा तुम्हारे पितरों और पितामहोंका अधिकार होता आया है। दानवश्रेष्ठ! अपने पितरोंकी परम्परासे चली आती हुई पृथ्वीको जीतकर तुम चक्रवर्ती सम्राट् हो जाओ। यह सुनकर बलिने इन्द्रसहित सब देवताओंको जीतकर अपने वशमें कर लिया और वे सब लोकोंके स्वामी हो गये। उस समय सब देवगण ब्रह्माजीकी शरणमें गये और इस प्रकार बोले—'ब्रह्मन्! बलिने हमें देवलोकसे अलग कर दिया, क्या करें? कहाँ जायँ?'

ब्रह्माजी बोले—देवताओ! तुमलोग परम मनोहर पद्मावतीपुरीको जाओ। वहाँ सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ उत्तरमानस नामक तीर्थ है, जहाँ मनुष्योंको महासिद्धि देनेवाली अष्टसिद्धिदायिनी देवी विख्यात हैं। उसीसे दक्षिण भागमें परम उत्तम विष्णूतीर्थ है। वहाँ जाकर अमित तेजस्वी भगवान् विष्णुकी आराधना करो। वे तुम्हारी सब दुःखोंसे रक्षा करेंगे।

ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर उन श्रेष्ठ देवताओंने पूछा—ब्रह्मन्! किस विधिसे भगवान् विष्णुकी आराधनामें तत्पर होना चाहिये?

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः।
येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः॥

ब्रह्माजी बोले—देवताओ! भगवान् विष्णु श्वेत वस्त्र धारण किये चार भुजाओंसे सुशोभित हैं। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति चन्द्रमाके समान गौर है, उनके मुखपर सदैव प्रसन्नता छायी रहती है। ऐसे श्रीहरिका सब विघ्नोंकी शान्तिके लिये ध्यान करे। नील कमलके समान श्यामसुन्दर श्रीविष्णु जिनके हृदयमें विराजमान हैं, उन्हींको लाभ होता है, उन्हींकी विजय होती है, उनकी पराजय कैसे हो सकती है? भगवान् विष्णुका जो सहस्रनामस्तोत्र है, वह अत्यन्त शुभ और विष्णुभक्ति प्रदान करनेवाला है।

विनियोगः
ॐ अस्य श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रमन्त्रस्य ब्रह्मा

* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य *९५३

ऋषिर्विष्णुर्देवता अनुष्टुप्छन्दः सर्वकामावाप्त्यर्थं जपे विनियोगः।

इस श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका मैं ब्रह्मा ऋषि हूँ, भगवान् विष्णु देवता हैं, अनुष्टुप् छन्द है और सब कामनाओंकी प्राप्तिके लिये जप अथवा पाठ करनेमें इसका विनियोग किया जाता है।

ध्यानम्
सजलजलदनीलं दर्शितादारशीलं
करतलधृतशैलं वेणुवाद्ये रसालम्।
व्रजजनकुलपालं कामिनीकेलिलोलं
तरुणतुलसिमालं नौमि गोपालबालम्॥

इस प्रकार विनियोग करके ध्यान करना चाहिये। वह इस प्रकार है—जिनके श्रीअंगोंकी कान्ति नूतन जलधरके समान श्याम है, जिन्होंने सदा उदारस्वभावका परिचय दिया है, अपने हाथपर गिरिराज गोवर्द्धनको उठाया है, जो बड़ी रसीली बाँसुरी बजाते हैं, व्रजवासियोंके समूहका पालन करते हैं, व्रजांगनाओंकी प्रसन्नताके लिये भाँति-भाँतिकी बाल-लीलाएँ करते डोलते हैं तथा जिनके गलेमें नूतन तुलसीकी माला शोभा पा रही है, उन गोपालबालक भगवान् श्रीकृष्णको मैं नमस्कार करता हूँ।

अथ विष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्*
ॐ विष्णुर्जिष्णुर्हृषीकेशः सर्वात्मा सर्वभावनः।
सर्वगः शर्वरीनाथो भूतग्रामाशयाशयः॥
अनादिनिधनो देवः सर्वज्ञः सर्वसम्भवः।
सर्वव्यापी जगद्धाता सर्वशक्तिधरोऽनघः॥

ॐ विष्णु, जिष्णु, हृषीकेश, सर्वात्मा, सर्वभावन, सर्वग, शर्वरीनाथ, भूतग्रामाशयाशय, अनादिनिधन, देव, सर्वज्ञ, सर्वसम्भव, सर्वव्यापी, जगद्धाता, सर्वशक्तिधर, अनघ।

जगद्बीजं जगत्स्रष्टा जगदीश्रो जगत्पतिः।
जगद्गुरुर्जगन्नाथो जगद्धाता जगन्मयः॥
सर्वाकृतिधरः सर्वो विश्वरूपी जनार्दनः।
अजन्मा शाश्वतो नित्यो विश्वाधारो विभुः प्रभुः॥

जगद्बीज, जगत्स्रष्टा, जगदीश, जगत्पति, जगद्गुरु, जगन्नाथ, जगद्धाता, जगन्मय, सर्वाकृतिधर, सर्व, विश्वरूपी, जनार्दन, अजन्मा, शाश्वत, नित्य, विश्वाधार, विभु, प्रभु।

बहुरूपैकरूपश्च सर्वरूपधरो हरः।
कालाग्निप्रभवो वायुः प्रलयान्तकरोऽक्षयः॥
महार्णवो महामेघो जलबुद्बुदसम्भवः।
संस्कृतोऽविकृतो मत्स्यो महामत्स्यस्तिमिंग्गिलः॥

बहुरूप, एकरूप, सर्वरूपधर, हर, कालाग्निप्रभव, वायु, प्रलयान्तकर, अक्षय, महार्णव, महामेघ, जलबुद्बुदसम्भव, संस्कृत, अविकृत, मत्स्य, महामत्स्य, तिमिंगिल।

अनन्तो वासुकिः शेषो वराहो धरणीधरः।
पयःक्षीरविवेकाढ्यो हंसो हैमगिरिस्थितः॥
हयग्रीवो विशालाक्षो हयकणों हयाकृतिः।
मन्थनो रत्नहारी च कूर्मोऽधरधराधरः॥

अनन्त, वासुकि, शेष, वराह, धरणीधर, पयःक्षीर-विवेकाढ्य, हंस, हैमगिरिस्थित, हयग्रीव, विशालाक्ष, हयकर्ण, हयाकृति, मन्थन, रत्नहारी, कूर्म, अधरधराधर।

विनिद्रो निद्रितो नन्दी सुनन्दो नन्दनप्रियः।
नाभिनालमृणाली च स्वयम्भूश्चतुराननः॥
प्रजापतिपरो दक्षः सृष्टिकर्ता प्रजाकरः।
मरीचिः कश्यपो वत्सः सुरासुरगुरुः कविः॥

विनिद्र, निद्रित, नन्दी, सुनन्द, नन्दनप्रिय, नाभिनालमृणाली, स्वयम्भू, चतुरानन, प्रजापतिपर, दक्ष, सृष्टिकर्ता, प्रजाकर, मरीचि, कश्यप, वत्स, सुरासुरगुरु, कवि।

वामनो वामभागी च वामकर्मा बृहद्वपुः।
त्रैलोक्यक्रमणो दीपो बलियज्ञविनाशनः॥
यज्ञहर्ता यज्ञकर्ता यज्ञेशो यज्ञभुग् विभुः।
सहस्रांशुर्भर्गो भानुर्विवस्वान् रविरंशुमान्॥


* नवलकिशोरप्रेसकी छपी हुई प्रतिके अनुसार यह स्तोत्र स्कन्दपुराण आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्यके ७४ वें अध्यायमें श्लोकांक ७४ से लेकर २०३ तकमें है। इसका पाठ विशेषतः वेंकटेश्वरप्रेसकी छपी पुस्तकके अनुसार लिया गया है, उसमें अध्याय ६३ में यह स्तोत्र आया है।

९५४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


वामन, वामभागी, वामकर्मा, बृहद्वपु, त्रैलोक्यक्रमण, दीप, बलियज्ञविनाशन, यज्ञहर्ता, यज्ञकर्ता, यज्ञेश, यज्ञभुक्, विभु, सहस्रांशु, भग, भानु, विवस्वान्, रवि, अंशुमान्।

तिग्मतेजाश्चाल्पतेजाः कर्मसाक्षी मनुर्यमः।
देवराजः सुरपतिर्दानवारिः शचीपतिः॥
अग्निर्वायुसखो वह्निर्वरुणो यादसांपतिः।
नैर्ऋतो नादनोऽनादी रक्षोयक्षधनाधिपः॥

तिग्मतेजा, अल्पतेजा, कर्मसाक्षी, मनु, यम, देवराज, सुरपति, दानवारि, शचीपति, अग्नि, वायुसखा, वह्नि, वरुण, यादसाम्पति, नैर्ऋत, नादन, अनादि, रक्षोयक्षधनाधिप।

कुबेरो वित्तवान् वेगो वसुपालो विलासकृत्।
अमृतस्रवणः सोमः सोमपानकरः सुधीः॥
सर्वौषधिकरः श्रीमान्निशाकारो दिवाकरः।
विषारिर्विषहर्ता च विषकण्ठधरो गिरिः॥

कुबेर, वित्तवान्, वेग, वसुपाल, विलासकृत्, अमृतस्रवण, सोम, सोमपानकर, सुधी, सर्वौषधिकर, श्रीमान्, निशाकार, दिवाकर, विषारि, विषहर्ता, विषकण्ठधर, गिरि।

नीलकण्ठो वृषी रुद्रो भालचन्द्रो ह्युमापतिः।
शिवः शान्तो वशी वीरो ध्यानी मानी च मानदः॥
कृमिकीटो मृगव्याधो मृगहा मृगवत्सलः।
वटुको भैरवो बालः कपाली दण्डविग्रहः॥

नीलकण्ठ, वृषी, रुद्र, भालचन्द्र, उमापति, शिव, शान्त, वशी, वीर, ध्यानी, मानी, मानद, कृमिकीट, मृगव्याध, मृगहा, मृगवत्सल, वटुक, भैरव, बाल, कपाली, दण्डविग्रह।

श्मशानवासी मांसाशी दुष्टनाशी स्मरान्तकृत्।
योगिनीत्रासको योगी ध्यानस्थो ध्यानवासनः॥
सेनानीः सैन्यदः स्कन्दो महाकालो गणाधिपः।
आदिदेवो गणपतिर्विघ्नहा विघ्ननाशनः॥

श्मशानवासी, मांसाशी, दुष्टनाशी, स्मरान्तकृत्, योगिनीत्रासक, योगी, ध्यानस्थ, ध्यानवासन, सेनानी, सैन्यद, स्कन्द, महाकाल, गणाधिप, आदिदेव, गणपति, विघ्नहा, विघ्ननाशन।


ऋद्धिसिद्धिप्रदो दन्ती भालचन्द्रो गजाननः।
नृसिंह उग्रदंष्ट्रश्च नखी दानवनाशकृत्॥
प्रह्लादपोषकर्ता च सर्वदैत्यजनेश्वरः।
शलभः सागरः साक्षी कल्पद्रुमविकल्पकः॥

ऋद्धिसिद्धिप्रद, दन्ती, भालचन्द्र, गजानन, नृसिंह, उग्रदंष्ट्र, नखी, दानवनाशकृत्, प्रह्लादपोषकर्ता, सर्वदैत्यजनेश्वर, शलभ, सागर, साक्षी, कल्पद्रुमविकल्पक।

हेमदो हेमभागी च हिमकर्ता हिमाचलः।
भूधरो भूमिदो मेरुः कैलासशिखरो गिरिः॥
लोकालोकान्तरो लोकी विलोकी भुवनेश्वरः।
दिक्पालो दिक्पतिर्दिव्यो दिव्यकायो जितेन्द्रियः॥

हेमद, हेमभागी, हिमकर्ता, हिमाचल, भूधर, भूमिद, मेरु, कैलासशिखर, गिरि, लोकालोकान्तर, लोकी, विलोकी, भुवनेश्वर, दिक्पाल, दिक्पति, दिव्य, दिव्यकाय, जितेन्द्रिय।

विरूपो रूपवान् रागी नृत्यगीतविशारदः।
हाहा हूहूश्चित्ररथो देवर्षिर्नारदः सखा॥
विश्वेदेवाः साध्यदेवा धृताशीश्च चलोऽचलः।
कपिलो जल्पको वादी दत्तो हैहयसंघराट्॥

विरूप, रूपवान्, रागी, नृत्यगीतविशारद, हाहा, हूहू, चित्ररथ, देवर्षि, नारद, सखा, विश्वेदेव, साध्यदेव, धृताशी, चल, अचल, कपिल, जल्पक, वादी, दत्त, हैहयसंघराट्।

वसिष्ठो वामदेवश्च सप्तर्षिप्रवरो भृगुः।
जामदग्न्यो महावीर्यः क्षत्रियान्तकरो ऋषिः॥
हिरण्यकशिपुश्चैव हिरण्याक्षो हरप्रियः।
अगस्तिः पुलहो रक्षः पौलस्त्यो रावणो घटः॥

वसिष्ठ, वामदेव, सप्तर्षिप्रवर, भृगु, जामदग्न्य, महावीर, क्षत्रियान्तकर, ऋषि, हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, हरप्रिय, अगस्ति, पुलह, रक्ष, पौलस्त्य, रावण, घट।

देवारिस्तापसस्तापी विभीषणहरिप्रियः।
तेजस्वी तेजदस्तेजी ईशो राजपतिः प्रभुः॥
दाशरथी राघवो रामो रघुवंशविवर्धनः।
सीतापतिः पतिः श्रीमान् ब्रह्मण्यो भक्तवत्सलः॥

देवारि, तापस, तापी, विभीषणहरिप्रिय, तेजस्वी, तेजद, तेजी, ईश, राजपति, प्रभु, दाशरथि, राघव,

* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९५५

राम, रघुवंशविवर्धन, सीतापति, पति, श्रीमान्, ब्रह्मण्य, भक्तवत्सल।

सन्नद्धः कवची खड्गी, चीरवासा दिगम्बरः।
किरीटी कुण्डली चापी शङ्खचक्री गदाधरः॥
कौसल्यानन्दनोदारो भूमिशायी गुहप्रियः।
सौमित्रो भरतो बालः शत्रुघ्नो भरताग्रजः॥
सन्नद्ध, कवची, खड्गी, चीरवासा, दिगम्बर, किरीटी, कुण्डली, चापी, शंखचक्री, गदाधर, कौसल्यानन्दन, उदार, भूमिशायी, गुहप्रिय, सौमित्र, भरत, बाल, शत्रुघ्न, भरताग्रज।

लक्ष्मणः परवीरघ्नः स्त्रीसहायः कपीश्वरः।
हनुमान् ऋक्षराजश्च सुग्रीवो वालिनाशनः॥
दूतप्रियो दूतकारी ह्यङ्गदो गदतां वरः।
वनध्वंसी वनी वेगी वानरो वानरध्वजः॥
लक्ष्मण, परवीरघ्न, स्त्रीसहाय, कपीश्वर, हनुमान्, ऋक्षराज, सुग्रीव, वालिनाशन, दूतप्रिय, दूतकारी, अंगद, गदतां वर, वनध्वंसी, वनी, वेगी, वानर, वानरध्वज।

लाङ्गूली च नखी दंष्ट्री लङ्काहाहाकरो वरः।
भवसेतुर्महासेतुर्बद्धसेतू रमेश्वरः॥
जानकीवल्लभः कामी किरीटी कुण्डली खगी।
पुण्डरीकविशालाक्षो महाबाहुर्घनाकृतिः॥
लांगूली, नखी, दंष्ट्री, लंकाहाहाकर, वर, भवसेतु, महासेतु, बद्धसेतु, रमेश्वर, जानकीवल्लभ, कामी, किरीटी, कुण्डली, खगी, पुण्डरीकविशालाक्ष, महाबाहु, घनाकृति।

चञ्चलश्चपलः कामी वामी वामाङ्गवत्सलः।
स्त्रीप्रियः स्त्रीपरः स्त्रैणः स्त्रियो वामाङ्गवासकः॥
जितवैरी जितकामो जितक्रोधो जितेन्द्रियः।
शान्तो दान्तो दयाऽऽरामो ह्येकस्त्रीव्रतधारकः॥
चंचल, चपल, कामी, वामी, वामांगवत्सल, स्त्रीप्रिय, स्त्रीपर, स्त्रैण, स्त्रियो-वामांगवासक, जितवैरी, जितकाम, जितक्रोध, जितेन्द्रिय, शान्त, दान्त, दयाराम, एकस्त्रीव्रतधारक।

सात्त्विकः सत्त्वसंस्थानो मदहा क्रोधहा खरः।
बहुराक्षससंवीतः सर्वराक्षसनाशकृत्॥
रावणारि रणक्षुद्रदशमस्तकछेदकः।
राज्यकारी यज्ञकारी दाता भोक्ता तपोधनः॥
सात्त्विक, सत्त्वसंस्थान, मदहा, क्रोधहा, खर, बहुराक्षससंवीत, सर्वराक्षसनाशकृत्, रावणारि, रणक्षुद्रदशमस्तकछेदक, राज्यकारी, यज्ञकारी, दाता, भोक्ता, तपोधन।

अयोध्याधिपतिः कान्तो वैकुण्ठोऽकुण्ठविग्रहः।
सत्यव्रतो व्रती शूरस्तपी सत्यफलप्रदः॥
सर्वसाक्षी सर्वगश्च सर्वप्राणहरोऽव्ययः।
प्राणश्चाथाप्यानश्च व्यानोदानः समानकः॥
अयोध्याधिपति, कान्त, वैकुण्ठ, अकुण्ठविग्रह, सत्यव्रत, व्रती, शूर, तपी, सत्यफलप्रद, सर्वसाक्षी, सर्वग, सर्वप्राणहर, अव्यय, प्राण, अपान, व्यान, उदान, समानक।

नागः कृकलः कूर्मश्च देवदत्तो धनञ्जयः।
सर्वप्राणविदो व्यापी योगधारकधारकः॥
तत्त्ववित्तत्त्वदस्तत्त्वी सर्वतत्त्वविशारदः।
ध्यानस्थो ध्यानशाली च मनस्वी योगवित्तमः॥
नाग, कृकल, कूर्म, देवदत्त, धनंजय, सर्वप्राणविद, व्यापी, योगधारकधारक, तत्त्ववित्, तत्त्वद, तत्त्वी, सर्वतत्त्वविशारद, ध्यानस्थ, ध्यानशाली, मनस्वी, योगवित्तम।

ब्रह्मज्ञो ब्रह्मदो ब्रह्मज्ञाता च ब्रह्मसम्भवः।
अध्यात्मविद् विदो दीपो ज्योतीरूपो निरञ्जनः॥
ज्ञानदोऽज्ञानहा ज्ञानी गुरुः शिष्योपदेशकः।
सुशिष्यः शिक्षितः शाली शिष्यशिक्षाविशारदः॥
ब्रह्मज्ञ, ब्रह्मद, ब्रह्मज्ञाता, ब्रह्मसम्भव, अध्यात्मवित्, विद, दीप, ज्योतीरूप, निरंजन, ज्ञानद, अज्ञानहा, ज्ञानी, गुरु, शिष्योपदेशक, सुशिष्य, शिक्षित, शाली, शिष्यशिक्षाविशारद।

मन्त्रदो मन्त्रहा मन्त्री तन्त्री तन्त्रजनप्रियः।
सन्मन्त्रो मन्त्रविन्मन्त्री यन्त्रमन्त्रैकभञ्जनः॥
मारणो मोहनो मोही स्तम्भोच्चाटनकृत् खलः।
बहुमायो विमायश्च महामायाविमोहकः॥
मन्त्रद, मन्त्रहा, मन्त्री, तन्त्री, तन्त्रजनप्रिय, सन्मन्त्र, मन्त्रवित्, मन्त्री, यन्त्रमन्त्रैकभंजन, मारण,

९५६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
मोहन, मोही, स्तम्भोच्चाटनकृत्, खल, बहुमाय, विमाय, महामायाविमोहक।<br>मोक्षदो बन्धको वन्दी ह्याकर्षणविकर्षणः।<br>ह्रीङ्कारो बीजरूपी च क्लीङ्कारः कीलकाधिपः॥<br>सौङ्कारः शक्तिमाञ्छक्तिः सर्वशक्तिधरो धरः।<br>अकारोकार ओङ्कारश्छन्दो गायत्रसम्भवः॥<br>मोक्षद, बन्धक, वन्दी, आकर्षण, विकर्षण, ह्रींकार, बीजरूपी, क्लींकार, कीलकाधिप, सौंकार, शक्तिमान्, शक्ति, सर्वशक्तिधर, धर, अकार, उकार, ॐकार, छन्द, गायत्रसम्भव।<br>वेदो वेदविदो वेदी वेदाध्यायी सदाशिवः।<br>ऋग्यजुःसामाथर्वेशः सामगानकरोऽकरी॥<br>त्रिपदो बहुपादी च सत्पथः सर्वतोमुखः।<br>प्राकृतः संस्कृतो योगी गीतग्रन्थप्रहेलिकः॥<br>वेद, वेदविद, वेदी, वेदाध्यायी, सदाशिव, ऋग्यजुःसामाथर्वेश, सामगानकर, अकरी, त्रिपद, बहुपादी, सत्पथ, सर्वतोमुख, प्राकृत, संस्कृत, योगी, गीतग्रन्थप्रहेलिक।<br>सगुणो विगुणश्छन्दो निःसंगो विगुणो गुणी।<br>निर्गुणो गुणवान् संगी कर्मी धर्मी च कर्मदः॥<br>निष्कर्मा कामकामी च निःसंगः संगवर्जितः।<br>निर्लोभो निरहङ्कारी निष्किञ्चनजनप्रियः॥<br>सगुण, विगुण, छन्द, निःसंग, विगुण, गुणी, निर्गुण, गुणवान्, संगी, कर्मी, धर्मी, कर्मद, निष्कर्मा, कामकामी, निःसंग, संगवर्जित, निर्लोभ, निरहंकारी, निष्किंचनजनप्रिय।<br>सर्वसंगकरो रागी सर्वत्यागी बहिश्चरः।<br>एकपादो द्विपादश्च बहुपादोऽल्पपादकः॥<br>द्विपदस्त्रिपदः पादी विपादी पदसंग्रहः।<br>खेचरो भूचरो भ्रामी भृङ्गकीटमधुप्रियः॥<br>सर्वसंगकर, रागी, सर्वत्यागी, बहिश्चर, एकपाद, द्विपाद, बहुपाद, अल्पपादक, द्विपद, त्रिपद, पादी, विपादी, पदसंग्रह, खेचर, भूचर, भ्रामी, भृंगकीटमधुप्रिय।<br>ऋतुः संवत्सरो मासोऽयनः पक्षो ह्यहर्निशः।<br>कृतं त्रेता कलिश्चैव द्वापरश्चतुराकृतिः॥देशकालकरः कालः कुलधर्मः सनातनः।<br>कला काष्ठा पला नाड्यो यामः पक्षः सितासितः॥<br>ऋतु, संवत्सर, मास, अयन, पक्ष, अहर्निश, कृत, त्रेता, कलि, द्वापर, चतुराकृति, देशकालकर, काल, सनातन कुलधर्म, कला, काष्ठा, पला, नाडी, याम, सितासित, पक्ष।<br>युगो युगन्धरो योग्यो युगधर्मप्रवर्तकः।<br>कुलाचारः कुलकरः कुलदैवकरः कुली॥<br>चतुराश्रमचारी च गृहस्थो ह्यतिथिप्रियः।<br>वनस्थो वनचारी च वानप्रस्थाश्रमाश्रमी॥<br>युग, युगन्धर, योग्य, युगधर्मप्रवर्तक, कुलाचार, कुलकर, कुलदैवकर, कुली, चतुराश्रमचारी, गृहस्थ, अतिथिप्रिय, वनस्थ, वनचारी, वानप्रस्थाश्रम, आश्रमी।<br>वटुको ब्रह्मचारी च शिखासूत्री कमण्डली।<br>त्रिजटी ध्यानवान् ध्यानी बद्रिकाश्रमवासकृत्॥<br>हेमाद्रिप्रभवो हैमो हेमराशिर्हिमाकरः।<br>महाप्रस्थानको विप्रो विरागी रागवान् गृही॥<br>वटुक, ब्रह्मचारी, शिखासूत्री, कमण्डली, त्रिजटी, ध्यानवान्, ध्यानी, बद्रिकाश्रमवासकृत्, हेमाद्रिप्रभव, हैम, हेमराशि, हिमाकर, महाप्रस्थानक, विप्र, विरागी, रागवान्, गृही।<br>नरनारायणो नागी केदारोदारविग्रहः।<br>गङ्गाद्वारतपःसारस्तपोवनतपोनिधिः ॥<br>निधिरेश महापद्मः पद्माकरश्रियालयः।<br>पद्मनाभः परीतात्मा परिव्राट् पुरुषोत्तमः॥<br>नरनारायण, नागी, केदारोदारविग्रह, गङ्गाद्वार-तपःसार, तपोवनतपोनिधि, निधि, महापद्म, पद्माकर-श्रियालय, पद्मनाभ, परीतात्मा, परिव्राट्, पुरुषोत्तम।<br>परानन्दः पुराणश्च सम्राड् राजविराजकः।<br>चक्रस्थश्चक्रपालस्थश्चक्रवर्ती नराधिपः॥<br>आयुर्वेदविदो वैद्यो धन्वन्तरिश्च रोगहा।<br>ओषधीबीजसम्भूतो रोगिरोगविनाशकृत्॥<br>परानन्द, पुराण, सम्राट्, राजविराजक, चक्रस्थ, चक्रपालस्थ, चक्रवर्ती, नराधिप, आयुर्वेदवित्, वैद्य, धन्वन्तरि, रोगहा, ओषधीबीजसम्भूत, रोगिरोगविनाशकृत्।