संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
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| ९५६ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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| मोहन, मोही, स्तम्भोच्चाटनकृत्, खल, बहुमाय, विमाय, महामायाविमोहक।<br>मोक्षदो बन्धको वन्दी ह्याकर्षणविकर्षणः।<br>ह्रीङ्कारो बीजरूपी च क्लीङ्कारः कीलकाधिपः॥<br>सौङ्कारः शक्तिमाञ्छक्तिः सर्वशक्तिधरो धरः।<br>अकारोकार ओङ्कारश्छन्दो गायत्रसम्भवः॥<br>मोक्षद, बन्धक, वन्दी, आकर्षण, विकर्षण, ह्रींकार, बीजरूपी, क्लींकार, कीलकाधिप, सौंकार, शक्तिमान्, शक्ति, सर्वशक्तिधर, धर, अकार, उकार, ॐकार, छन्द, गायत्रसम्भव।<br>वेदो वेदविदो वेदी वेदाध्यायी सदाशिवः।<br>ऋग्यजुःसामाथर्वेशः सामगानकरोऽकरी॥<br>त्रिपदो बहुपादी च सत्पथः सर्वतोमुखः।<br>प्राकृतः संस्कृतो योगी गीतग्रन्थप्रहेलिकः॥<br>वेद, वेदविद, वेदी, वेदाध्यायी, सदाशिव, ऋग्यजुःसामाथर्वेश, सामगानकर, अकरी, त्रिपद, बहुपादी, सत्पथ, सर्वतोमुख, प्राकृत, संस्कृत, योगी, गीतग्रन्थप्रहेलिक।<br>सगुणो विगुणश्छन्दो निःसंगो विगुणो गुणी।<br>निर्गुणो गुणवान् संगी कर्मी धर्मी च कर्मदः॥<br>निष्कर्मा कामकामी च निःसंगः संगवर्जितः।<br>निर्लोभो निरहङ्कारी निष्किञ्चनजनप्रियः॥<br>सगुण, विगुण, छन्द, निःसंग, विगुण, गुणी, निर्गुण, गुणवान्, संगी, कर्मी, धर्मी, कर्मद, निष्कर्मा, कामकामी, निःसंग, संगवर्जित, निर्लोभ, निरहंकारी, निष्किंचनजनप्रिय।<br>सर्वसंगकरो रागी सर्वत्यागी बहिश्चरः।<br>एकपादो द्विपादश्च बहुपादोऽल्पपादकः॥<br>द्विपदस्त्रिपदः पादी विपादी पदसंग्रहः।<br>खेचरो भूचरो भ्रामी भृङ्गकीटमधुप्रियः॥<br>सर्वसंगकर, रागी, सर्वत्यागी, बहिश्चर, एकपाद, द्विपाद, बहुपाद, अल्पपादक, द्विपद, त्रिपद, पादी, विपादी, पदसंग्रह, खेचर, भूचर, भ्रामी, भृंगकीटमधुप्रिय।<br>ऋतुः संवत्सरो मासोऽयनः पक्षो ह्यहर्निशः।<br>कृतं त्रेता कलिश्चैव द्वापरश्चतुराकृतिः॥ | देशकालकरः कालः कुलधर्मः सनातनः।<br>कला काष्ठा पला नाड्यो यामः पक्षः सितासितः॥<br>ऋतु, संवत्सर, मास, अयन, पक्ष, अहर्निश, कृत, त्रेता, कलि, द्वापर, चतुराकृति, देशकालकर, काल, सनातन कुलधर्म, कला, काष्ठा, पला, नाडी, याम, सितासित, पक्ष।<br>युगो युगन्धरो योग्यो युगधर्मप्रवर्तकः।<br>कुलाचारः कुलकरः कुलदैवकरः कुली॥<br>चतुराश्रमचारी च गृहस्थो ह्यतिथिप्रियः।<br>वनस्थो वनचारी च वानप्रस्थाश्रमाश्रमी॥<br>युग, युगन्धर, योग्य, युगधर्मप्रवर्तक, कुलाचार, कुलकर, कुलदैवकर, कुली, चतुराश्रमचारी, गृहस्थ, अतिथिप्रिय, वनस्थ, वनचारी, वानप्रस्थाश्रम, आश्रमी।<br>वटुको ब्रह्मचारी च शिखासूत्री कमण्डली।<br>त्रिजटी ध्यानवान् ध्यानी बद्रिकाश्रमवासकृत्॥<br>हेमाद्रिप्रभवो हैमो हेमराशिर्हिमाकरः।<br>महाप्रस्थानको विप्रो विरागी रागवान् गृही॥<br>वटुक, ब्रह्मचारी, शिखासूत्री, कमण्डली, त्रिजटी, ध्यानवान्, ध्यानी, बद्रिकाश्रमवासकृत्, हेमाद्रिप्रभव, हैम, हेमराशि, हिमाकर, महाप्रस्थानक, विप्र, विरागी, रागवान्, गृही।<br>नरनारायणो नागी केदारोदारविग्रहः।<br>गङ्गाद्वारतपःसारस्तपोवनतपोनिधिः ॥<br>निधिरेश महापद्मः पद्माकरश्रियालयः।<br>पद्मनाभः परीतात्मा परिव्राट् पुरुषोत्तमः॥<br>नरनारायण, नागी, केदारोदारविग्रह, गङ्गाद्वार-तपःसार, तपोवनतपोनिधि, निधि, महापद्म, पद्माकर-श्रियालय, पद्मनाभ, परीतात्मा, परिव्राट्, पुरुषोत्तम।<br>परानन्दः पुराणश्च सम्राड् राजविराजकः।<br>चक्रस्थश्चक्रपालस्थश्चक्रवर्ती नराधिपः॥<br>आयुर्वेदविदो वैद्यो धन्वन्तरिश्च रोगहा।<br>ओषधीबीजसम्भूतो रोगिरोगविनाशकृत्॥<br>परानन्द, पुराण, सम्राट्, राजविराजक, चक्रस्थ, चक्रपालस्थ, चक्रवर्ती, नराधिप, आयुर्वेदवित्, वैद्य, धन्वन्तरि, रोगहा, ओषधीबीजसम्भूत, रोगिरोगविनाशकृत्। |