संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९५५
राम, रघुवंशविवर्धन, सीतापति, पति, श्रीमान्, ब्रह्मण्य, भक्तवत्सल।
सन्नद्धः कवची खड्गी, चीरवासा दिगम्बरः।
किरीटी कुण्डली चापी शङ्खचक्री गदाधरः॥
कौसल्यानन्दनोदारो भूमिशायी गुहप्रियः।
सौमित्रो भरतो बालः शत्रुघ्नो भरताग्रजः॥
सन्नद्ध, कवची, खड्गी, चीरवासा, दिगम्बर, किरीटी, कुण्डली, चापी, शंखचक्री, गदाधर, कौसल्यानन्दन, उदार, भूमिशायी, गुहप्रिय, सौमित्र, भरत, बाल, शत्रुघ्न, भरताग्रज।
लक्ष्मणः परवीरघ्नः स्त्रीसहायः कपीश्वरः।
हनुमान् ऋक्षराजश्च सुग्रीवो वालिनाशनः॥
दूतप्रियो दूतकारी ह्यङ्गदो गदतां वरः।
वनध्वंसी वनी वेगी वानरो वानरध्वजः॥
लक्ष्मण, परवीरघ्न, स्त्रीसहाय, कपीश्वर, हनुमान्, ऋक्षराज, सुग्रीव, वालिनाशन, दूतप्रिय, दूतकारी, अंगद, गदतां वर, वनध्वंसी, वनी, वेगी, वानर, वानरध्वज।
लाङ्गूली च नखी दंष्ट्री लङ्काहाहाकरो वरः।
भवसेतुर्महासेतुर्बद्धसेतू रमेश्वरः॥
जानकीवल्लभः कामी किरीटी कुण्डली खगी।
पुण्डरीकविशालाक्षो महाबाहुर्घनाकृतिः॥
लांगूली, नखी, दंष्ट्री, लंकाहाहाकर, वर, भवसेतु, महासेतु, बद्धसेतु, रमेश्वर, जानकीवल्लभ, कामी, किरीटी, कुण्डली, खगी, पुण्डरीकविशालाक्ष, महाबाहु, घनाकृति।
चञ्चलश्चपलः कामी वामी वामाङ्गवत्सलः।
स्त्रीप्रियः स्त्रीपरः स्त्रैणः स्त्रियो वामाङ्गवासकः॥
जितवैरी जितकामो जितक्रोधो जितेन्द्रियः।
शान्तो दान्तो दयाऽऽरामो ह्येकस्त्रीव्रतधारकः॥
चंचल, चपल, कामी, वामी, वामांगवत्सल, स्त्रीप्रिय, स्त्रीपर, स्त्रैण, स्त्रियो-वामांगवासक, जितवैरी, जितकाम, जितक्रोध, जितेन्द्रिय, शान्त, दान्त, दयाराम, एकस्त्रीव्रतधारक।
सात्त्विकः सत्त्वसंस्थानो मदहा क्रोधहा खरः।
बहुराक्षससंवीतः सर्वराक्षसनाशकृत्॥
रावणारि रणक्षुद्रदशमस्तकछेदकः।
राज्यकारी यज्ञकारी दाता भोक्ता तपोधनः॥
सात्त्विक, सत्त्वसंस्थान, मदहा, क्रोधहा, खर, बहुराक्षससंवीत, सर्वराक्षसनाशकृत्, रावणारि, रणक्षुद्रदशमस्तकछेदक, राज्यकारी, यज्ञकारी, दाता, भोक्ता, तपोधन।
अयोध्याधिपतिः कान्तो वैकुण्ठोऽकुण्ठविग्रहः।
सत्यव्रतो व्रती शूरस्तपी सत्यफलप्रदः॥
सर्वसाक्षी सर्वगश्च सर्वप्राणहरोऽव्ययः।
प्राणश्चाथाप्यानश्च व्यानोदानः समानकः॥
अयोध्याधिपति, कान्त, वैकुण्ठ, अकुण्ठविग्रह, सत्यव्रत, व्रती, शूर, तपी, सत्यफलप्रद, सर्वसाक्षी, सर्वग, सर्वप्राणहर, अव्यय, प्राण, अपान, व्यान, उदान, समानक।
नागः कृकलः कूर्मश्च देवदत्तो धनञ्जयः।
सर्वप्राणविदो व्यापी योगधारकधारकः॥
तत्त्ववित्तत्त्वदस्तत्त्वी सर्वतत्त्वविशारदः।
ध्यानस्थो ध्यानशाली च मनस्वी योगवित्तमः॥
नाग, कृकल, कूर्म, देवदत्त, धनंजय, सर्वप्राणविद, व्यापी, योगधारकधारक, तत्त्ववित्, तत्त्वद, तत्त्वी, सर्वतत्त्वविशारद, ध्यानस्थ, ध्यानशाली, मनस्वी, योगवित्तम।
ब्रह्मज्ञो ब्रह्मदो ब्रह्मज्ञाता च ब्रह्मसम्भवः।
अध्यात्मविद् विदो दीपो ज्योतीरूपो निरञ्जनः॥
ज्ञानदोऽज्ञानहा ज्ञानी गुरुः शिष्योपदेशकः।
सुशिष्यः शिक्षितः शाली शिष्यशिक्षाविशारदः॥
ब्रह्मज्ञ, ब्रह्मद, ब्रह्मज्ञाता, ब्रह्मसम्भव, अध्यात्मवित्, विद, दीप, ज्योतीरूप, निरंजन, ज्ञानद, अज्ञानहा, ज्ञानी, गुरु, शिष्योपदेशक, सुशिष्य, शिक्षित, शाली, शिष्यशिक्षाविशारद।
मन्त्रदो मन्त्रहा मन्त्री तन्त्री तन्त्रजनप्रियः।
सन्मन्त्रो मन्त्रविन्मन्त्री यन्त्रमन्त्रैकभञ्जनः॥
मारणो मोहनो मोही स्तम्भोच्चाटनकृत् खलः।
बहुमायो विमायश्च महामायाविमोहकः॥
मन्त्रद, मन्त्रहा, मन्त्री, तन्त्री, तन्त्रजनप्रिय, सन्मन्त्र, मन्त्रवित्, मन्त्री, यन्त्रमन्त्रैकभंजन, मारण,