भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 980
  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * | ९५१ ---|---

प्यारसे सेवा करती हैं, उन भगवान् पुरुषोत्तमकी लक्ष्मीसहित पूजा करके शंकरके साथ पार्वतीदेवीका भी पूजन करे। जो ऐसा करता है, वह सैकड़ों मनोवांछित फलोंको पाकर भगवान् विष्णुके लोकमें पूजित होता है। भाद्रपद शुक्ल पक्षकी एकादशी तिथिको एकाग्रचित्त होकर जो पुरुष पुरुषोत्तम-सरोवरमें स्नान करता है, उसे स्त्री, पुत्र, धन, आयु, आरोग्य और सम्पदा प्राप्त होती है। पुरुषोत्तम-सरोवरके ईशान कोणमें भृगुश्रेष्ठ परशुरामजीने आत्मशुद्धिके लिये तपस्या की है। वहींपर सब तीर्थोंका श्रेष्ठ फल प्रदान करनेवाली सरिताओंमें श्रेष्ठ 'कौशिकी' नदी भी है। उसमें स्नान करके मनुष्य जातिहत्याके दोषसे मुक्त होता है। वहीं भगवान् रामेश्वरका दर्शन करके मानव अपने सब पाप धो डालता है।

एक समय नैमिषारण्य क्षेत्रमें बैठे हुए शौनकादि मुनि आपसमें सब तीर्थोंके विषयकी पुण्यदायिनी शुभ कथा कह रहे थे। उस पुण्यमय अवसरपर देवर्षि नारदजीने काशीका उत्तम माहात्म्य वर्णन किया। तत्पश्चात् स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माने सब देवताओं तथा ऋषियोंके समक्ष इस प्रकार कहा—'समस्त पाताल और भूलोकमें गोमतीके समान दूसरी कोई नदी नहीं है, श्रीकृष्णके तुल्य कोई देवता नहीं हैं और द्वारकाके समान दूसरी कोई पुरी नहीं है।'

इस बातको निश्चितरूपसे जानकर वहाँ यत्र-तत्र बैठे हुए शौनकादि सभी ऋषियोंने वहीं गोमतीके तटपर प्रातःकाल सन्ध्योपासना की। महर्षि सान्दीपनि भी वहीं थे। उन्होंने भी गोमती-तटपर सन्ध्योपासना की। इस प्रकार दीर्घकालतक व्रतका पालन करनेवाले अवन्तीनिवासी सान्दीपनि मुनिके पास उन्हींकी कामना पूर्ण करनेके लिये सुकुमार अंगवाले ब्रह्मचारी बलराम और श्रीकृष्ण आये। उन्होंने गुरुजीसे कहा—'ब्रह्मन्! नदियोंमें श्रेष्ठ गोमती अब यहीं अवन्तीपुरीमें आ गयी है। यज्ञकुण्डमें गोमती और सरस्वती दोनोंका समागम हुआ है। गोमतीकुण्ड सब पापोंका नाश करनेवाला बताया गया है। भाद्रपदमासके कृष्ण पक्षकी अष्टमी तिथिको कृष्णजन्मके दिन उस कुण्डमें स्नान करके मनुष्य रात्रिमें जागरण करे और विधिपूर्वक उपवास करके शिष्यसहित व्यासजीकी पूजा करे। जो लोग एकाग्रचित्त होकर उस दिन गौ-ब्राह्मणोंकी पूजा करते हैं, उनके लिये सब लोकोंमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है। उन्हें गोमती-स्नानका पुण्य, भगवान् वासुदेवका समागम तथा सब मनोरथोंकी सिद्धि प्राप्त होती है। चैत्र शुक्ला एकादशीके दिन मनुष्य गोमतीकुण्डमें विशेषरूपसे स्नान करके रात्रिमें जागरण और भगवान् विष्णुका पूजन करे। तत्पश्चात् आमलकी यात्रा करे तो उसे पग-पगपर सहस्रों गोदानका फल प्राप्त होता है।


गंगेश्वर और विश्वेश्वरतीर्थका माहात्म्य, बलिके द्वारा देवताओंकी पराजय, ब्रह्माजीका देवताओंको विष्णुसहस्त्रनामस्तोत्रका उपदेश देना

सनत्कुमारजी कहते हैं—ब्रह्मन्! गंगेश्वरके समीप जहाँ आकाशगंगाका संगम है, वहाँ सब पापोंको हरनेवाला एक श्रेष्ठ तीर्थ है। इस भूतलपर वह तीर्थ धन्य है और महान् पुण्यफल देनेवाला है। वहीं भगवान् शंकरने आकाशसे गिरती हुई गंगाको अपने मस्तकपर धारण किया था। उस तीर्थमें स्नान करके यदि मनुष्य गंगेश्वरका दर्शन करे तो वह गंगास्नानका फल पाकर विष्णुलोकमें पूजित होता है। विश्वनाथजीके पास पहुँचकर विश्वेश्वरतीर्थमें जो निवास करता है, वह सब पापोंसे शुद्धचित्त होकर विष्णुलोकको पाता है।

प्राचीन कालमें भगवान् विष्णुकी भक्तिमें तत्पर रहनेवाले एक दैत्यराज हो गये हैं, जो प्रह्लादके नामसे विख्यात थे। प्रह्लादजी समस्त धर्मात्माओंमें