भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 979, कुल 1406 में से

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९५० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


उत्सव करना चाहिये। देवेश्वरी! कृष्णपक्षकी चतुर्दशी, नवमी अथवा अष्टमीको शोकनाशक व्रत करना चाहिये। पुण्य दिवसमें प्रातःकाल उठकर पहले पूर्वाह्नमें किये जानेवाले नित्य-कर्मोंका अनुष्ठान करे। तत्पश्चात् मुझ वासुदेवका मन-ही-मन स्मरण करते हुए नियम ग्रहण करे। उपवास, नक्त-व्रत (केवल रात्रिमें भोजन करना) तथा एकभुक्तव्रत (केवल दिनमें एक बार अन्न-ग्रहण)—इन तीनोंमेंसे किसी एक व्रतके पालनका निश्चय करके ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। वे ब्राह्मण सपत्नीक, सदाचारी, कुलीन एवं कुटुम्बी हों। तदनन्तर मध्याह्नकालमें नूतन एवं छिद्ररहित कलशके ऊपर लक्ष्मीसहित सनातन देव श्रीविष्णुकी स्थापना करे और ब्राह्मणोंद्वारा वेदमन्त्रोंका उच्चारण कराते हुए अपने भाई-बन्धुओंके साथ बैठकर उत्तम भक्तिके साथ ब्रह्माजीसहित भगवान् लक्ष्मीनारायणकी पूजा करे। पहले चन्दनयुक्त जलसे स्नान कराकर फिर पंचामृतसे स्नान करावे। तत्पश्चात् शुद्ध जलसे स्नान कराकर आच्छादनके लिये रेशमी वस्त्र भेंट करे। फिर गन्ध, चन्दन, पुष्प, तुलसीदल, धूप, दीप तथा भाँति-भाँतिके मिष्टान्नयुक्त नैवेद्य अर्पण करे। अन्तमें घण्टा, मृदंग, शंखध्वनि एवं दिव्य घोषके साथ कपूर, अगर और चन्दनके द्वारा व्रती पुरुष भगवान्‌की आरती उतारे। कर्पूरादि न मिले तो घीमें डुबोयी हुई रूईकी बत्तियोंसे भी आरती कर सकते हैं। उसके बाद ताँबेके अर्घ्यपात्रमें रखे हुए जल, चन्दन, अक्षत और फूलसे प्रसन्नतापूर्वक भगवान्‌को विशेषार्घ्य दे। पूजन एवं अर्घ्यदानके समय अपनी पत्नीको भी साथ रखे। अर्घ्यपात्रमें जल-चन्दनादिके साथ पंचरत्न भी रखना चाहिये। अर्घ्य देनेकी विधि इस प्रकार है—दोनों घुटनोंको जमीनपर टेककर दोनों हाथोंसे अर्घ्यपात्र उठाकर भक्तिपूर्वक भगवान्‌के आगे वह जल गिरावे। अर्घ्यका मन्त्र इस प्रकार है—

कृपावान् सर्वभूतेषु जगदानन्दकारकः।
गृहाणार्घ्यमिदं देव सम्पूर्णफलदो भव॥

'देव! आप सम्पूर्ण जीवोंपर कृपा रखनेवाले हैं। जगत्‌को आनन्द देनेवाले हैं; इस अर्घ्यको ग्रहण कीजिये और मुझे व्रतका पूर्णफल प्रदान कीजिये।'

इसके बाद निम्नांकित मन्त्र पढ़कर प्रार्थना करे—

स्वयम्भुवे नमस्तुभ्यं ब्रह्मणेऽमिततेजसे।
नमोऽस्तु ते श्रियानन्द ब्रह्मानन्द कृपाकर॥

'अमित तेजस्वी स्वयम्भू ब्रह्माजीको नमस्कार है। लक्ष्मीजी तथा ब्रह्माजीको आनन्द प्रदान करनेवाले कृपानिधान पुरुषोत्तम! आपको सादर नमस्कार है।'

इस प्रकार भगवान् गोविन्दकी प्रार्थना करके लक्ष्मीनारायणका स्मरण करते हुए स्वयं ही सपत्नीक ब्राह्मणोंका पूजन करे। विधिपूर्वक पूजा सम्पन्न करके उन्हें घृतपक्व एवं खीर आदिका भोजन करावे। विद्या-विनयसे सम्पन्न सपत्नीक ब्राह्मणको विधिवत् भोजन कराकर यथाशक्ति वस्त्र, अलंकार और कुंकुम आदिके द्वारा उनका सत्कार करे। घीमें तैयार किये हुए गेहूँके आटेकी पूरी, कचौरी आदि उत्तम-उत्तम मिष्टान्न, भाँति-भाँतिके फल, शर्करा और घृतसे तैयार किये हुए भोज्यपदार्थ, मूली, अदरक, अनेक प्रकारके साग और गोरस आदि पदार्थोंको मीठे वचन बोल-बोलकर परोसना चाहिये। 'प्रभो! इसका रस बड़ा स्वादिष्ट है; यह भोजन करनेयोग्य बहुत उत्तम है, इसे तो आपके लिये खास तौरपर तैयार किया गया है, आपको जो रुचता हो वह और माँग लीजिये' इत्यादि बातें कह-कहकर प्रेमपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। भोजनके पश्चात् ताम्बूल और दक्षिणा देकर उन्हें विदा करना चाहिये। ब्राह्मण-भोजनके अनन्तर व्रती पुरुष भाई-बन्धुओंके साथ स्वयं भोजन करे। प्रिये! जो नारी इस संसारमें मलमास व्रतका पालन करती है, उसे दरिद्रता, पुत्रशोक एवं विधवापन कभी प्राप्त नहीं होता। स्त्री हो या पुरुष, जो भी मलमासमें पूर्वोक्त व्रतका पालन करता है, वह उत्तम फलका भागी होता है।

भगवती लक्ष्मी जिनके चरणोंकी बड़े लाड़-

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