संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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श्रेष्ठ थे। उन्होंने आचरणके द्वारा धर्मपर विजय पायी, सत्यके द्वारा लक्ष्मीजीको जीता, धैर्यसे सम्पूर्ण लोक धारण किये, क्षमासे पृथ्वीको जीता, गम्भीरतासे दिव्य समुद्रको पराजित किया तथा शौर्यसे शत्रुगणोंको परास्त किया था। महात्मा प्रह्लादने विनयसे अतिथियोंको, दक्षिणासे यज्ञको और हविष्यसे अग्निदेवको जीत लिया था। बाहर-भीतरकी पवित्रता और सदाचारके पालनसे उनका अन्तःकरण पूर्णतः शुद्ध हो गया था। तपस्यासे उनका अशुभ नष्ट हो चुका था। दान, मान और भोजन-आच्छादनादिसे उन्होंने ब्राह्मणोंके हृदयको जीत लिया था। उन्होंने संस्कारसे जन्मको, दम (इन्द्रियसंयम) से सनातन आत्माको, प्राणायामसे वायुको और योगध्यानसे श्रीहरिको अपने वशमें कर लिया था। प्रह्लादजीके समान धीर कोई नहीं हुआ।
प्रह्लादजीके सदाचारी पौत्र बलिके नामसे प्रसिद्ध हैं। उनके शासनकालमें प्रजाकी उत्तरोत्तर वृद्धि होती थी। पृथ्वीपर कोई अल्पायु, जड़-मूर्ख, रोगी, ईर्ष्यालु, पुत्रहीन और धनहीन नहीं था। राजा बलि सम्राट् थे। वे प्रचुर दक्षिणाओंसे सम्पन्न अनेकानेक यज्ञ करते रहते थे। उन्होंने सात द्वीपोंवाली पृथ्वीका सदैव पालन किया है। एक समय राजा बलि सभाके बीच श्रेष्ठ सिंहासनपर बैठे थे। सब ओर उनकी जय-जयकार हो रही थी तथा पुराणों और स्मृतियोंकी दिव्य कथा-वार्ता चल रही थी। इसी समय वहाँ बहुत-से ऋषि पधारे। बड़े-बड़े दैत्य और दानव राजा बलिकी सेवामें उपस्थित हुए। सिद्ध, नाग, यक्ष, किन्नर और किंपुरुष आदि भी राजाके दरबारमें आये थे। इन सबके समागमसे दैत्यसम्राट् बलिकी वह परम दिव्य सभा बड़ी शोभा पा रही थी। तदनन्तर उस सभामें देवदर्शन नारदजी कहींसे आ गये। उन्हें देखकर सब दैत्य उठकर खड़े हो गये और सबने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। राजा बलिने नारदजीका स्वागत-सत्कार करके आसन दिया और उनका कुशल-समाचार पूछा।
तब आनन्दपूर्वक बैठकर देवर्षि नारदजीने कहा—दैत्यराज! भूतलपर सदा तुम्हारे पितरों और पितामहोंका अधिकार होता आया है। दानवश्रेष्ठ! अपने पितरोंकी परम्परासे चली आती हुई पृथ्वीको जीतकर तुम चक्रवर्ती सम्राट् हो जाओ। यह सुनकर बलिने इन्द्रसहित सब देवताओंको जीतकर अपने वशमें कर लिया और वे सब लोकोंके स्वामी हो गये। उस समय सब देवगण ब्रह्माजीकी शरणमें गये और इस प्रकार बोले—'ब्रह्मन्! बलिने हमें देवलोकसे अलग कर दिया, क्या करें? कहाँ जायँ?'
ब्रह्माजी बोले—देवताओ! तुमलोग परम मनोहर पद्मावतीपुरीको जाओ। वहाँ सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ उत्तरमानस नामक तीर्थ है, जहाँ मनुष्योंको महासिद्धि देनेवाली अष्टसिद्धिदायिनी देवी विख्यात हैं। उसीसे दक्षिण भागमें परम उत्तम विष्णूतीर्थ है। वहाँ जाकर अमित तेजस्वी भगवान् विष्णुकी आराधना करो। वे तुम्हारी सब दुःखोंसे रक्षा करेंगे।
ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर उन श्रेष्ठ देवताओंने पूछा—ब्रह्मन्! किस विधिसे भगवान् विष्णुकी आराधनामें तत्पर होना चाहिये?
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः।
येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः॥
ब्रह्माजी बोले—देवताओ! भगवान् विष्णु श्वेत वस्त्र धारण किये चार भुजाओंसे सुशोभित हैं। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति चन्द्रमाके समान गौर है, उनके मुखपर सदैव प्रसन्नता छायी रहती है। ऐसे श्रीहरिका सब विघ्नोंकी शान्तिके लिये ध्यान करे। नील कमलके समान श्यामसुन्दर श्रीविष्णु जिनके हृदयमें विराजमान हैं, उन्हींको लाभ होता है, उन्हींकी विजय होती है, उनकी पराजय कैसे हो सकती है? भगवान् विष्णुका जो सहस्रनामस्तोत्र है, वह अत्यन्त शुभ और विष्णुभक्ति प्रदान करनेवाला है।
विनियोगः
ॐ अस्य श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रमन्त्रस्य ब्रह्मा