संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * | ९५३ |
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ऋषिर्विष्णुर्देवता अनुष्टुप्छन्दः सर्वकामावाप्त्यर्थं जपे विनियोगः।
इस श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका मैं ब्रह्मा ऋषि हूँ, भगवान् विष्णु देवता हैं, अनुष्टुप् छन्द है और सब कामनाओंकी प्राप्तिके लिये जप अथवा पाठ करनेमें इसका विनियोग किया जाता है।
ध्यानम्
सजलजलदनीलं दर्शितादारशीलं
करतलधृतशैलं वेणुवाद्ये रसालम्।
व्रजजनकुलपालं कामिनीकेलिलोलं
तरुणतुलसिमालं नौमि गोपालबालम्॥
इस प्रकार विनियोग करके ध्यान करना चाहिये। वह इस प्रकार है—जिनके श्रीअंगोंकी कान्ति नूतन जलधरके समान श्याम है, जिन्होंने सदा उदारस्वभावका परिचय दिया है, अपने हाथपर गिरिराज गोवर्द्धनको उठाया है, जो बड़ी रसीली बाँसुरी बजाते हैं, व्रजवासियोंके समूहका पालन करते हैं, व्रजांगनाओंकी प्रसन्नताके लिये भाँति-भाँतिकी बाल-लीलाएँ करते डोलते हैं तथा जिनके गलेमें नूतन तुलसीकी माला शोभा पा रही है, उन गोपालबालक भगवान् श्रीकृष्णको मैं नमस्कार करता हूँ।
अथ विष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्*
ॐ विष्णुर्जिष्णुर्हृषीकेशः सर्वात्मा सर्वभावनः।
सर्वगः शर्वरीनाथो भूतग्रामाशयाशयः॥
अनादिनिधनो देवः सर्वज्ञः सर्वसम्भवः।
सर्वव्यापी जगद्धाता सर्वशक्तिधरोऽनघः॥
ॐ विष्णु, जिष्णु, हृषीकेश, सर्वात्मा, सर्वभावन, सर्वग, शर्वरीनाथ, भूतग्रामाशयाशय, अनादिनिधन, देव, सर्वज्ञ, सर्वसम्भव, सर्वव्यापी, जगद्धाता, सर्वशक्तिधर, अनघ।
जगद्बीजं जगत्स्रष्टा जगदीश्रो जगत्पतिः।
जगद्गुरुर्जगन्नाथो जगद्धाता जगन्मयः॥
सर्वाकृतिधरः सर्वो विश्वरूपी जनार्दनः।
अजन्मा शाश्वतो नित्यो विश्वाधारो विभुः प्रभुः॥
जगद्बीज, जगत्स्रष्टा, जगदीश, जगत्पति, जगद्गुरु, जगन्नाथ, जगद्धाता, जगन्मय, सर्वाकृतिधर, सर्व, विश्वरूपी, जनार्दन, अजन्मा, शाश्वत, नित्य, विश्वाधार, विभु, प्रभु।
बहुरूपैकरूपश्च सर्वरूपधरो हरः।
कालाग्निप्रभवो वायुः प्रलयान्तकरोऽक्षयः॥
महार्णवो महामेघो जलबुद्बुदसम्भवः।
संस्कृतोऽविकृतो मत्स्यो महामत्स्यस्तिमिंग्गिलः॥
बहुरूप, एकरूप, सर्वरूपधर, हर, कालाग्निप्रभव, वायु, प्रलयान्तकर, अक्षय, महार्णव, महामेघ, जलबुद्बुदसम्भव, संस्कृत, अविकृत, मत्स्य, महामत्स्य, तिमिंगिल।
अनन्तो वासुकिः शेषो वराहो धरणीधरः।
पयःक्षीरविवेकाढ्यो हंसो हैमगिरिस्थितः॥
हयग्रीवो विशालाक्षो हयकणों हयाकृतिः।
मन्थनो रत्नहारी च कूर्मोऽधरधराधरः॥
अनन्त, वासुकि, शेष, वराह, धरणीधर, पयःक्षीर-विवेकाढ्य, हंस, हैमगिरिस्थित, हयग्रीव, विशालाक्ष, हयकर्ण, हयाकृति, मन्थन, रत्नहारी, कूर्म, अधरधराधर।
विनिद्रो निद्रितो नन्दी सुनन्दो नन्दनप्रियः।
नाभिनालमृणाली च स्वयम्भूश्चतुराननः॥
प्रजापतिपरो दक्षः सृष्टिकर्ता प्रजाकरः।
मरीचिः कश्यपो वत्सः सुरासुरगुरुः कविः॥
विनिद्र, निद्रित, नन्दी, सुनन्द, नन्दनप्रिय, नाभिनालमृणाली, स्वयम्भू, चतुरानन, प्रजापतिपर, दक्ष, सृष्टिकर्ता, प्रजाकर, मरीचि, कश्यप, वत्स, सुरासुरगुरु, कवि।
वामनो वामभागी च वामकर्मा बृहद्वपुः।
त्रैलोक्यक्रमणो दीपो बलियज्ञविनाशनः॥
यज्ञहर्ता यज्ञकर्ता यज्ञेशो यज्ञभुग् विभुः।
सहस्रांशुर्भर्गो भानुर्विवस्वान् रविरंशुमान्॥
* नवलकिशोरप्रेसकी छपी हुई प्रतिके अनुसार यह स्तोत्र स्कन्दपुराण आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्यके ७४ वें अध्यायमें श्लोकांक ७४ से लेकर २०३ तकमें है। इसका पाठ विशेषतः वेंकटेश्वरप्रेसकी छपी पुस्तकके अनुसार लिया गया है, उसमें अध्याय ६३ में यह स्तोत्र आया है।