भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 949, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 949
९२०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

श्रद्धाके साथ पुष्यदन्तका दर्शन करनेके लिये जाय। उनके दर्शनमात्रसे मनुष्य सब पातकोंसे छूट जाता है। तत्पश्चात् एकाग्रचित्त हो गुह्यमहाकालके समीप जाय, जिनके दर्शनमात्रसे मनुष्यको गुप्त पापोंसे छुटकारा मिल जाता है। वहाँसे उत्तम दुर्वासेश्वरके समीप जाय, जिनके दर्शनमात्रसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। दुर्वासेश्वरके समीप श्वास रोककर चले और महादुर्गा गौरीके पास जाकर श्वास छोड़े। इसके बाद एकाग्रचित्त होकर देवीकी पूजा करे। इसके अनन्तर कायेश्वर नामसे प्रसिद्ध देवाधिदेव महेश्वरके समीप जाय, जिनके दर्शनमात्रसे यमलोकको देखनेका अवसर नहीं आता। वहाँसे वधिरेश्वरका दर्शन करनेके लिये जाय, जिनके दर्शनमात्रसे बहरापन दूर हो जाता है। तत्पश्चात् यात्रेश्वरके समीप जाय, जो यात्राके पूर्ण फलको देनेवाले हैं। वहाँ अपने नाम, स्थान और गोत्रका उच्चारण करना चाहिये। यदि नामका उच्चारण न करे तो उसकी यात्रा निष्फल होती है। यात्रेश्वरदेवके आगे एकाग्रचित्त होकर बैठे और भक्तियुक्त होकर बार-बार नमस्कार करके स्तुति बोले। स्तुतिके पश्चात् इस प्रकार कहे—

मया समर्पिता यात्रा त्वत्प्रसादान्महेश्वर।
संसारसागराद् घोरान्मामुद्धर जगत्पते॥

'महेश्वर! मैंने आपकी ही कृपासे यह यात्रा पूरी करके आपके चरणोंमें समर्पित की है। जगत्पते! इस घोर संसार-सागरसे मेरा उद्धार कीजिये।'

जो इस विधिसे भगवान् महाकालकी प्रदक्षिणा करता है, उसके द्वारा सातों द्वीपोंसे युक्त समस्त पृथ्वीकी परिक्रमा हो जाती है। श्रेष्ठ ब्राह्मणको दो लाख गोदान करनेसे जो फल होता है, वही देवाधिदेव महाकालकी एक बार प्रदक्षिणा करनेसे मिल जाता है। महाकालकी प्रदक्षिणा बड़ी भक्तिके साथ करनी चाहिये। इससे पग-पगपर अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है। यह मुझसे साक्षात् भगवान् शंकरने कहा है। जो इस प्रकार भगवान् शिवका चिन्तन करते हुए यात्रा पूरी करता है और वस्त्रसहित दक्षिणा देता है, वह सात जन्मोंमें किये हुए समस्त पापोंसे छूट जाता है। इस तरह यात्रा समाप्त करके मनुष्य अपने घर जाय और यात्रामें जो मुख्य-मुख्य देवता आते हैं, उनकी संख्याके अनुसार छब्बीस श्रेष्ठ ब्राह्मणों तथा शिवध्यानपरायण शिवभक्तोंको भोजन करावे। फिर वस्त्रसहित दक्षिणा देकर उनसे आशीर्वाद ले उन्हें विदा करे। तदनन्तर सब भृत्यवर्गके साथ स्वयं भोजन करे। दीनों, अनाथों, दरिद्रों, अन्धों और अंगविकल मनुष्योंको भी भोजन करावे। यह सब करनेसे एकाग्रचित्तवाला मनुष्य माता-पिताकी सौ पीढ़ियोंका उद्धार करके शिवलोकमें आनन्दका अनुभव करता है।


वाल्मीकिकी तपस्या और वाल्मीकेश्वरकी महिमा

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! जो मौन और ध्यानपरायण होकर भक्तिपूर्वक वाल्मीकेश्वर देवका पूजन करता है, वह उत्तम कवित्व-शक्तिको प्राप्त होता है।

व्यासजीने पूछा—भगवन्! भगवान् वाल्मीकेश्वर कौन हैं और वे यहाँ किस प्रकार प्रकट हुए हैं?

सनत्कुमारजीने कहा—विप्रवर! प्राचीन कालमें सुमति नामक एक भृगुवंशी ब्राह्मण थे। उनकी पत्नी कौशिकवंशकी कन्या थीं। सुमतिके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम अग्निशर्मा रखा गया। वह पिताके बार-बार कहनेपर भी वेदाभ्यासमें मन नहीं लगाता था। एक बार उसके देशमें बहुत दिनोंतक वर्षा नहीं हुई। उस समय बहुत लोग दक्षिण दिशामें चले गये। विप्रवर सुमति भी अपने पुत्र और स्त्रीके साथ विदिशाके वनमें चले गये और वहाँ आश्रम बनाकर रहने लगे। वहाँ अग्निशर्माका लुटेरोंसे साथ हो गया; अतः जो भी उस मार्गसे आता, उसे वह पापात्मा मारता और लूट लेता था। उसको अपने ब्राह्मणत्वकी स्मृति नहीं रही। वेदका अध्ययन जाता रहा, गोत्रका

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