भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * १९३

पूजनीय है। संसारके बन्धनसे छुटकारा दिलानेके लिये यह कल्याणमय व्रत परम पवित्र है, क्योंकि यह सम्पूर्ण धर्मके द्वारा मोक्षका कारण है। जो अजितेन्द्रिय पुरुष इस कपालव्रत (संन्यास)-को ग्रहण करके फिर छोड़ देता है, वह यमदूतोंद्वारा शीघ्र ही रौरव नरकमें डाला जाता है। जो भावसे इस व्रतकी बात तो करता है, किंतु तदनुकूल कर्म नहीं करता है, वह रागयुक्त चित्तवाला शृंगारी (शृंगाररसमें डूबा हुआ) पुरुष धर्मका प्रिय नहीं है। जो इस व्रतको लेकर भी किसी एक स्थानपर ही भोजन करता है, मिठाइयाँ उड़ाता है, निष्कपट बातें जिसे अच्छी नहीं लगतीं, जो बुरे गाँव और नगरोंमें रहता है, खेती और वाणिज्य-व्यवसायका सेवन करता है—इत्यादि दोषोंसे दूषित उस मिथ्याचारीके साथ वार्तालाप करनेसे भी मनुष्य नरकगामी होता है, क्योंकि वह मेरे व्रतको कलंकित करनेवाला है।

सनत्कुमारजी कहते हैं—ऐसा कहकर भगवान् सदाशिवने ब्रह्मा आदि देवताओंके साथ उस क्षेत्रको बसाया। श्रेष्ठ मुनिगण इस आदिक्षेत्रको श्मशान कहते हैं। जहाँ भगवान् शिवका निवास है, वह स्थान महाकाल वन कहलाता है। वह भूभाग भगवान् शंकरके अनुग्रहका घर है, इसमें संशय नहीं है। मरणशील प्राणियोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही इस क्षेत्रका प्रादुर्भाव हुआ है। वहाँ सुवर्ण और मणिसे निर्मित वेदिका बनायी गयी, जो सब ओरसे परम सुन्दर थी। चौंतीस सुन्दर कलश स्थापित किये गये, जो भरे हुए थे। वहाँ वेदीके चारों ओर चार दरवाजे थे, जो होमाग्निसे तप रहे थे। उस स्थानपर रखे हुए घट नवोदित सूर्यकी भाँति दिखायी देते थे। ऐसे उत्तम महाकाल वनमें भगवान् शिव क्रीड़ा करते हैं। यह सब कुछ सत्ययुगमें सबको प्रत्यक्ष दिखायी देता है, त्रेतामें धर्मपरायण तपस्वी ब्रह्मचारी ही भगवान्‌को प्रत्यक्ष देखते हैं, द्वापरमें धर्मात्मा और वैदिक ज्ञानसे सम्पन्न पुरुष ही उन्हें देख पाते हैं, परंतु कलियुगमें विशुद्ध विज्ञानसे सुशोभित अधिक तपस्यावाले पुरुष ही महाकाल वनमें शूलपट्टिशधारी उन देवाधिदेव भगवान् महेश्वरका दर्शन करते हैं, जो सम्पूर्ण लोकोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं। व्यास ! मैंने तुम्हें यह सब यथार्थ वृत्तान्त बतलाया है। भगवान् शिवका यह स्थान विश्वविख्यात गुणगणोंसे पूजित है और सब दोषोंका नाश करनेवाला है। जो कल्याणमयी बुद्धिसे युक्त मानव इहलोकमें एकाग्रचित्त होकर इस स्थानके माहात्म्यको पढ़ता अथवा सुनता है, वह देवताओंसे अभिषिक्त एवं पूजित होकर भगवान् शंकरके धामको जाता है।

o

रुद्रभक्तिका निरूपण तथा महाकाल क्षेत्रमें निवास करनेवाले मनुष्योंके नियम

व्यासजीने पूछा— भगवन् ! महाकाल वनमें रुद्रलोककी इच्छा रखनेवाले उस क्षेत्रके निवासियोंको किस विधिसे रहना चाहिये ?

सनत्कुमारजीने कहा— व्यास ! भगवान् शंकरकी भक्ति तीन प्रकारकी बतायी गयी है—मानसिक, वाचिक और कायिक। लौकिकी, वैदिकी और आध्यात्मिकी—ये तीन भेद और भी हैं। ध्यान, धारणा एवं बुद्धिके द्वारा जो भगवान् रुद्रके स्वरूपोंका स्मरण किया जाता है, वह रुद्रके प्रति भक्ति-भावको बढ़ानेवाली मानसी भक्ति कहलाती है। स्तुति और कीर्तन आदि वाचिकी भक्तिके अन्तर्गत हैं। इन्द्रियोंको रोककर संयममें रखनेवाले पुरुषोंद्वारा जो व्रत, उपवास और नियम आदिका पालन किया जाता है—ज्ञान और ध्यानमें स्थित धर्मात्मा पुरुषोंकी वह भक्ति कायिक कही गयी है। गोघृत, गोदुग्ध, गोदधि, चन्दन, कुंकुम, कुशोदक, गन्ध,

९१४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

विविध माल्य, अनेक प्रकारके धातु, घी, गुग्गुल, धूप, कालागुरु, सुगन्धित पदार्थ, सुवर्ण और रत्नोंके आभूषण, विचित्र माला, वस्त्र, स्तोत्र, पताका, व्यजन, नृत्य, वाद्य, गीत, सब प्रकारके उपहार, भक्ष्य, भोज्य, अनुपान तथा अक्षतोंके द्वारा जो पूजा की जाती है, वह लौकिकी भक्ति मानी गयी है। वेदमन्त्रोंके द्वारा हविष्यकी आहुति आदिके योगसे जो यजनक्रिया की जाती है, वह वैदिकी भक्ति कहलाती है। मुने! आध्यात्मिकी शिव-भक्ति दो प्रकारकी है—एक सांख्या भक्ति और दूसरी यौगिकी भक्ति। अब इनका विभागपूर्वक वर्णन सुनो। संख्यासे प्रधान (प्रकृति) आदि तत्त्व चौबीस* हैं। वे सभी अचेतन तथा चेतनके उपयोगमें आने योग्य भोग्य हैं। इनसे भिन्न पुरुष पचीसवाँ तत्त्व है, वह चेतन एवं भोक्ता है। भगवान् रुद्र छब्बीसवें तत्त्व हैं। वे कर्ता, सर्वज्ञ, चेतन और सबके स्वामी हैं। अव्यक्त प्रकृति नित्य (अनादि) एवं अजन्मा है तथा पुरुष उसका अधिष्ठाता और प्रेरक है। वह व्यक्त और नित्य है। महेश्वर इन सबके कारण हैं। पहले चौबीस तत्त्वोंकी सृष्टि हुई; फिर उन्हीं तत्त्वोंसे पंचभूतोंकी सृष्टि हुई है। प्रधान या प्रकृति त्रिगुणात्मक है। भगवान् रुद्रका पुरुषके साथ साधर्म्य है—चैतन्यरूप धर्म दोनोंमें समान रूपसे है; परंतु प्रधान तत्त्व जड होनेके कारण उनसे विपरीत धर्मवाला है। वह रुद्रकी इच्छा (संकल्पशक्ति)-के अनुसार भौतिक जगत्का कारण होता है। सर्वत्र रुद्रमें ही कर्तृत्व है, पुरुषमें कर्तृत्वका अभाव है और प्रधान (प्रकृति)-में अचेतनता है। इन तीनोंका विवेक तत्त्वज्ञान कहा गया है। कार्य और कारण दोनों तत्त्वान्तरसे मुक्त होते हैं। प्रेरक-तत्त्वमें जो विलक्षणता है, उसको जानकर रुद्रतत्त्वार्थका विचार करनेवाले पुरुष तत्त्वोंकी संख्या निश्चित करते हैं। इस प्रकार रुद्रके यथार्थस्वरूपका विवेचन तथा तत्त्वोंकी तात्त्विक संख्या बतायी गयी है। सांख्यमतमें रुद्रके स्वरूपका यह चिन्तन ही विद्वानोंद्वारा आध्यात्मिक सांख्या भक्ति बतायी गयी है।

ब्रह्मन्! अब मुझसे यौगिकी भक्तिका वर्णन सुनो। जो पुरुष अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखकर सदा प्राणायाम-परायण होकर ध्यान करता है, अथवा जो हृदयमें धारणाको स्थिर करके महेश्वरका इस प्रकार ध्यान करता है कि 'हृदयकमलकी कर्णिकाके आसनपर भगवान् शिव विराजमान हैं, उनके पाँच मुख हैं, प्रत्येक मुखमें तीन नेत्र हैं, चन्द्रमाकी कलासे उनकी जटा जगमगा रही है और कटिभागमें सर्पकी करधनी शोभा पाती है। उनका श्रीअंग श्वेत है, वे दस भुजाओंसे सुशोभित हैं, उनका स्वरूप सबके लिये मंगलमय है, उनके हाथोंमें वरद और अभयकी मुद्रा है।' उस योगीके द्वारा किये जानेवाले इस ध्यानको भगवान् रुद्रकी 'पराभक्ति' कहते हैं। जो इस प्रकार भगवान् शिवके प्रति भक्ति रखता है, वह रुद्रभक्त कहलाता है।

व्यास! अब महाकाल क्षेत्रमें निवास करनेवाले मनुष्योंके लिये जो विधि बतायी गयी है, उसको सुनो। जो ब्राह्मण ममता, अहंकार, आसक्ति तथा परिग्रहसे रहित हैं, बन्धुजनोंके प्रति अनासक्त रहकर मिट्टी, पत्थर और सुवर्णको समान समझते हुए महाकाल वनमें निवास करते हैं, मन, वाणी और शरीरद्वारा किये जानेवाले त्रिविध कर्मोंद्वारा सदा सब प्राणियोंको अभय दान देते हैं, सांख्य और योगकी विधिको जानते हैं, धर्मके स्वरूपको समझते हैं और संशयरहित हो नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा भगवान् शंकरका यजन करते हैं, वहाँ मृत्यु होनेके पश्चात् वे सभी अत्यन्त दुर्लभ एवं अक्षय ब्रह्म-सायुज्यको प्राप्त होते हैं। इस संसारमें पुनर्जन्म न पाकर अक्षय मुक्ति लाभ करते हैं। क्षेत्रनिवासी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र सबको अपने-अपने धर्ममें तत्पर होना तथा अपनी ही वृत्ति एवं आचार-व्यवहारसे जीवन


* प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, शब्दतन्मात्रा, स्पर्शतन्मात्रा, रूपतन्मात्रा, रसतन्मात्रा, गन्धतन्मात्रा, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, मन और पंचमहाभूत—ये चौबीस तत्त्व हैं।

* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९१५

निर्वाह करना चाहिये। भगवान् शिवके भक्त सर्वतोभावसे जीवोंपर अनुग्रह करनेवाले होते हैं। जो मुमुक्षु मानव महाकाल वन नामक क्षेत्रमें निवास करते हैं, वे मृत्युके पश्चात् सुन्दर विमानोंद्वारा रुद्रलोकमें जाते हैं। अथवा जोउपलब्ध हुई ज्ञानाग्निमें अपने शरीर आदि अनात्मपदार्थोंका हवन करता है, नित्य रुद्राध्यायका पाठ करता है और महान् सत्त्व (सत्त्वगुण एवं धैर्य) से सम्पन्न है, वह भगवान् शंकरके धाममें निवास करता है।

$\sim\sim\circ\sim\sim$

हालाहल दैत्यका वध, रुद्रसरोवरकी महिमा तथा कुशस्थलीमें चार समुद्रोंका आगमन और उसका माहात्म्य

व्यासजी बोले—भगवन्! आचार सब धर्मोंमें मुख्य है। वही सब धर्मोंका आश्रय है। जो स्वधर्ममें तत्पर, क्रोधको जीतनेवाले तथा इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले हैं, वे तो भगवान् शिवके लोकमें जाते ही हैं, उनके लिये मेरे मनमें कोई चिन्ता नहीं है। वैसे लोग तो किसी उत्तम क्षेत्रमें निवास किये बिना भी पूर्वोक्त नियमोंके पालनसे ही चन्द्रमाके समान कान्तिमान् विमानोंद्वारा निश्चय ही रुद्रलोकमें चले जाते हैं। परंतु जो स्त्रियाँ, शूद्र, म्लेच्छ, पशु-पक्षी, मृग, मूक, जड़, अन्ध और बधिर हैं, जिनमें तप और नियमका अभाव है, वे यदि महाकालक्षेत्रमें मृत्युको प्राप्त हों, तो उनकी क्या गति होती है?महादैत्यको शिवगणोंने त्रिशूलसमूहों, तलवारों, मूसलों तथा बाणसमुदायसे मूर्च्छित करके पृथ्वीपर मार गिराया। उसके मारे जानेपर महादेवजीने कहा—'अहो! इस मूढ़को बड़ा घमण्ड हो गया था, उसीसे यह मृत्युको प्राप्त हुआ है।' इसी समय पूर्वोक्त कपालसे बड़ी भयानक और प्रज्वलित मुखवाली प्रचण्ड मातृकाएँ प्रकट हुईं, जो बड़ी बलवती और भयानक अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित थीं। वे उस स्थानपर दौड़ी हुई आयीं और महादेवजीको निवेदन करके उस महाबली दैत्यको काट-काटकर खाने लगीं। इससे वे इस क्षेत्रमें कपालमातृकाके नामसे विख्यात हुईं।
सनत्कुमारजीने कहा—ब्रह्मन्! यदि स्त्री, म्लेच्छ, शूद्र, पशु-पक्षी और मृग भी अपनी स्वाभाविक वृत्तिसे ही उस क्षेत्रमें मरें तो वे दिव्य शरीर धारण करके रुद्रलोकमें जाते हैं और वहाँ सब प्रकारके सुखभोगसे सम्पन्न होते हैं।पूर्वकालमें वहाँ स्थापित हुए कपालको भेदकर एक कुण्ड प्रकट हुआ, जो शिवतड़ागके नामसे प्रसिद्ध है। वह सब पापोंका नाश करनेवाला है। आज भी वह महादिव्य रुद्रसरोवर वहाँ प्रकाशित होता है। गन्धर्वगण उसका सेवन करते हैं। रुद्रसरोवरका जल किसी पात्रमें रखा हो अथवा हाथमें निकाला गया हो, ठंडा हो, गरम हो या उसका क्वाथ बनाया गया हो, किसी प्रकार भी उपयोगमें लाये जानेपर वह अश्वमेध-यज्ञके अवभृथ-स्नानकी भाँति पवित्र करता है। सैकड़ों देवताओंसे घिरे हुए ब्रह्माजी भी उस रुद्रसरोवरपर गये हैं तथा उन्होंने उसे स्वर्गलोककी सीढ़ी कहा है। जो यहाँ प्राण त्याग करते हैं, वे रुद्रलोकमें जाते हैं। व्यासजी! जो लोग महाकाल वनमें निवास करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं। जो रुद्रसरोवरमें स्नान करते अथवा उसका जल पीते हैं, वे स्वधर्म तथा
एक समय देवताओंके लिये कण्टकरूप हालाहल नामक दानव महाकाल वनकी ओर दौड़ा हुआ आया। वह दुरात्मा क्रोधसे जल रहा था। ब्रह्माजीका वरदान पाकर देवताओंके लिये दुर्जय हो गया था। उसने भैंसेका स्वरूप धारण कर रखा था। उस देवशत्रुको आते देख पिनाकधारी भगवान् शिव अपने गणोंसे बोले—'पार्षदो! यह मायावी दैत्य तीनों लोकोंके लिये कण्टक है और बड़े वेगसे इधर आ रहा है, अतः तुम सब लोग मिलकर इसे मारो।' तब वहाँ आते हुए उस

९१६ संक्षिप्त स्कन्दपुराण


सदाचारमें तत्पर रहनेवाले पुरुष सबके स्वामी महादेवजीका प्रत्यक्ष दर्शन करते हैं।

**सनत्कुमारजी कहते हैं—**प्राचीनकालमें सुद्युम्न नामक एक धर्मात्मा राजा थे। उनकी पत्नीका नाम सुदर्शना था। उसने दाल्भ्य मुनिका दर्शन करके पुत्रकी कामनासे पूछा—'भगवन्! किस दान, स्नान और विधिसे मुझे समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न पुत्र प्राप्त हो सकता है?'

**दाल्भ्यजी बोले—**बेटी! लोकस्रष्टा ब्रह्माजीने तुम्हारे लिये पहलेसे ही श्रेष्ठ पुत्र रच रखा है। तुम्हारे पतिदेव भगवान् शंकरकी आराधना करके उनके प्रसादसे अवन्तीपुरीमें जब चारों समुद्रोंको स्वरूपतः ले आवेंगे, तब उनमें राजाके स्नान करनेपर तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा। अतः तुम अपने पतिको शंकरकी आराधनाके लिये प्रेरित करो।

दाल्भ्यके वचनसे रानी सुदर्शनाने अपने पतिको भगवान् शंकरकी आराधनाके लिये भेजा। उन्होंने गन्धमादन पर्वतपर जाकर आराधनाद्वारा भगवान् शिवको सन्तुष्ट किया। सन्तुष्ट होनेपर शंकरजी बोले—'राजेन्द्र! तुम अवन्तीपुरीको जाओ। वहाँ तुम्हें सुन्दर पुत्रकी प्राप्ति होगी। मेरे आदेशसे बादल उस मरुप्राय प्रदेशमें कुशस्थलीके निकट जायँगे और वहीं तुम्हें चारों समुद्र एकत्र दिखायी देंगे। नरश्रेष्ठ! तुम्हारे प्रार्थना करनेपर वे सभी समुद्र अंशकलाद्वारा वहाँ सदा निवास करेंगे।' ऐसा कहकर महादेवजी अन्तर्धान हो गये। तब राजा सुद्युम्न अपनी पत्नीके साथ कुशस्थलीमें गये और वहाँ उन्होंने राजस्थलके समीप चारों समुद्रोंको आया हुआ देखा। देखकर उन सबको नमस्कार किया। सुद्युम्नको नमस्कार करते देख वे समुद्र बोले—'सुव्रत! कोई उत्तम वरदान माँगो।' तब उन्होंने समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त पुत्र माँगा और इस प्रकार कहा—'जबतक यह पृथ्वी स्थित है, तबतक इस राजस्थलके समीप आप सब लोग निवास करें।'

**समुद्रोंने कहा—**राजन्! जबतक इस कल्पका अन्त न हो जायगा, तबतक हम सब लोग यहीं स्थित रहेंगे और हमारे जलमें स्नान करनेमात्रसे तुम्हें समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त पुत्रकी प्राप्ति होगी। इसलिये यहाँ स्नान करो।

व्यासजी! इस प्रकार राजा सुद्युम्नने अवन्तीपुरीमें चारो समुद्रोंको उतारा है। जो वहाँकी यात्रा करता है, उसके पुण्यफलका वर्णन सुनो। मनुष्यको चाहिये कि वह महापुण्यमय क्षार-समुद्रमें स्नान करके भक्तिपूर्वक पितरोंका श्राद्ध करे। फिर स्थलभागमें विद्यमान पार्वतीवल्लभ महादेवजीकी पूजा करे। तत्पश्चात् ताँबेका एक पात्र लेकर उसे नमकसे भर दे और उसमें कुछ सुवर्ण रखकर वेदवेत्ता ब्राह्मणको दान कर दे। उसके बाद सप्तधान्यसे युक्त और वस्त्रसे वेष्टित बाँसके पात्रमें फल और दक्षिणा रखकर यत्नपूर्वक अर्घ्य प्रदान करे। तदनन्तर क्षीरसागरमें जाकर पूर्ववत् स्नान करे और ताम्रके पात्रमें दूध भरकर दान करे। फिर दधिसमुद्रमें स्नान करके शुभ दही-भात दान करे। पुनः इक्षुसमुद्रमें स्नान करके ब्राह्मणको गुड़ समर्पित करे। इस प्रकार यात्रा करके दूध देनेवाली गौका दान करे। जो इस विधिसे राजस्थलके समीप यात्रा करता है, वह कल्याणमयी लक्ष्मी और सुन्दर पुत्र पाता है तथा मरनेपर स्वर्गलोकमें जाता है।


शंकरवापी, शंकरादित्य, गन्धवती नदी, हरसिद्धि देवी, वटयक्षिणी, पिशाचतीर्थ, शिप्रागुप्तेश्वर आदि तथा हनुमत्केश्वरकी महिमा

**सनत्कुमारजी कहते हैं—**व्यासजी! क्रीड़ा करते हुए भगवान् शंकरने 'शंकरवापी' नामक एक शुभ महातीर्थका निर्माण किया है। जो मनुष्य रविवारयुक्त अष्टमीको उक्त शंकरवापीमें पूर्व आदि दिशाओंके क्रमसे सभी दिशाओं और कोणोंमें एवं वापीके मध्यभागमें भी स्नान करके ब्राह्मणोंको

  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९१७

हविष्यान्नयुक्त नूतन कमण्डलु देता है और उन्हें शाक एवं मूल-फल अर्पण करता है, वह इहलोक और परलोकमें जो सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न स्थान है, वहाँ जाता और उत्तम ऐश्वर्य भोगता है।

तदनन्तर देवदेवेश्वर पिनाकपाणि भगवान् शिवने पवित्र भावसे देवाधिदेव दिवाकरका स्तवन किया। इससे सन्तुष्ट होकर दिवानाथ सूर्य वहाँ आये और इस प्रकार बोले—'भूतनाथ ! आप मुझसे वर माँगिये।' भगवान् शिव बोले—'देव ! आप समस्त देहधारियोंके हितके लिये यहाँ एक अंशसे स्थित होइये।' भगवान् शंकरका यह वचन सुनकर सूर्यदेवने वहाँ अवतार लिया। सम्पूर्ण लोकोंको शान्ति प्रदान करनेवाले देवेश्वर सूर्य वहाँ शंकरादित्यके नामसे प्रसिद्ध हैं। उस समय देवगण विस्मित होकर कहने लगे—'अहो ! यह स्थान धन्य है, जहाँ साक्षात् भगवान् शिव विराजमान हैं और सूर्यदेव भी इस तीर्थका माहात्म्य बढ़ानेके लिये यहीं आकर बस गये हैं।' तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवता शंकरादित्यकी स्थापना और पूजा आदि करके बोले—'प्रभो ! जो मनुष्य आपकी स्तुति करेंगे, उन्हें जरा और मृत्युका कष्ट नहीं भोगना पड़ेगा। शंकरादित्यके दर्शन करनेवालेको कभी आधि-व्याधि और दारिद्र्य, रोग और बन्धु-वियोग आदि नहीं होते।'

सनत्कुमारजी कहते हैं—एक समय भगवान् महेश्वरने कपाल धोनेके लिये शुद्ध जल लेकर उससे कपालको अच्छी तरह धोकर उस जलको पृथ्वीपर फेंक दिया। वहीं त्रिभुवन-विख्यात गन्धवती नामवाली पुण्य नदी प्रकट हुई। उसमें स्नान करना सदा ही उत्तम है, ऐसा साक्षात् महादेवजीने कहा है। वहाँ किया हुआ श्राद्ध और तर्पण सब अक्षय होता है। जो मनुष्य वहाँ चन्द्रग्रहणमें स्नान करके पिण्डदान देता है, उसके पितर बारह वर्षोंतक तृप्त रहते हैं। काशी और गया आदि तीर्थोंमें जो एक मासमें तृप्ति होती है, वह यहाँ तत्काल हो जायगी और सन्तुष्ट हुए पितर उन मनुष्योंको मनोवांछित सिद्धिका वरदान देंगे। वहाँ दशाश्वमेध तीर्थमें स्नान करके शिवजीका दर्शन करनेपर मनुष्य दस अश्वमेध-यज्ञोंका फल पाता है।

अब मैं हरसिद्धि देवीका माहात्म्य बतलाऊँगा, जो उत्तम सिद्धि देनेवाली हैं। पूर्वकालमें चण्ड और प्रचण्ड नामवाले दो महाबली दानव स्वर्गलोकको उजाड़कर कैलास पर्वतपर आये। वहाँ उन्होंने दाहिने हाथमें पिनाक और खट्वांग लिये हुए और दूसरे हाथमें 'पाँसा' उठाये हुए भगवान् सदाशिवको देखा। तब वे दैत्य शिवजीके पार्षदोंको पीड़ा देने लगे। यह देख नन्दीने उन्हें रोका। उनके मना करनेपर उन दानवोंने अपने-अपने त्रिशूलोंसे एक ही साथ नन्दीके दायें और बायें पार्श्वमें आघात किया। नन्दी दोनों ओरसे विदीर्ण हो गये और उनके अंगोंसे रक्तकी बड़ी भारी धारा बह चली। उन्हें घायल हुआ देख भगवान् शिवने देवीसे कहा—'इन दोनों महादैत्योंको मार डालना चाहिये।' देवीने कहा—'अभी मारती हूँ।' इतना कहते-कहते वे दोनों बलाभिमानी दानव देवीके हाथसे मरे हुए दिखायी दिये। तब भगवान् हरने कहा—'चण्डि ! तुमने दोनों दुष्ट दानवोंका तत्काल संहार किया है, इसलिये लोकमें तुम 'हरसिद्धि' के नामसे विख्यात होओगी। जो मनुष्य हरसिद्धि देवीका परम भक्तिपूर्वक दर्शन करता है, वह अक्षय भोग पाता और मृत्युके पश्चात् शिवधामको जाता है।'

जो मनुष्य भक्तिपूर्वक एक महीनेतक प्रतिदिन भगवती वटयक्षिणीका दर्शन करता है और धतूरके फूलोंसे उनकी पूजा करता है, उसकी सिद्धि कभी क्षीण नहीं होती।

जो मनुष्य पिशाचतीर्थमें विशेषतः चतुर्दशीको स्नान करके भक्तिपूर्वक तिलदान देता है, वह कभी पिशाच नहीं होता। इतना ही नहीं, उसका कुल भी पिशाचतासे मुक्त हो जाता है। जिसका नाम लेकर मनुष्य वहाँ स्नान करता है, वह भी पिशाचतासे छुटकारा पा जाता है। शिवभक्त एवं जितेन्द्रिय मनुष्य 'शिप्रागुप्तेश्वर' का दर्शन करके सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य

९१८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

स्नान करके भक्तिपूर्वक अगस्त्येश्वरका दर्शन करता है, वह यमराजके घरमें न जाकर रुद्रलोकको जाता है। जो मनुष्य शिप्रा में स्नान करके दुण्ढेश्वर शिवका दर्शन करता है, वह अश्वमेध-यज्ञका फल पाता है। पूर्वकालमें महादेवजीने यहाँ डमरू बजाया था, इसलिये वे डमरुकेश्वरके नामसे प्रसिद्ध हुए। जो भक्तिपूर्वक डमरुकेश्वर महादेवका दर्शन करता है, उसे रोगका भय नहीं होता और वह मरनेपर शिवलोकको जाता है। जो मानव भक्तिके साथ अनादिकल्पेश्वरका दर्शन करता है, वह स्वर्गलोकका राज्य पाता है। जो सिद्धेश्वर, वीरभद्र और चण्डिकाका दर्शन करता है, वह सिद्धि और सर्वत्र विजय पाता है। त्रिविष्टपतीर्थमें स्नान करके स्वर्णजालेश्वरका दर्शन करनेके पश्चात् जो स्वर्ण (धतूर) से उनका पूजन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो स्नानके पश्चात् भक्तिपूर्वक कर्कटेश्वर शिवका दर्शन करता है, उसे कभी सर्पसे भय और दरिद्रता नहीं होती। जो पराभक्तिपूर्वक सनातनी महामायाका दर्शन करता है, वह विष्णुमायासे मुक्त होकर परम पदको प्राप्त होता है। स्वर्गद्वारमें स्नान करके भैरव-देवका दर्शन करनेसे मनुष्य सौ यज्ञोंका फल पाता है।

जो शिव-सरोवरमें स्नान करके हनुमत्केश्वरका दर्शन करता है, वह कोटि सहस्र कल्पोंतक वायुलोकमें आनन्द भोगता है।

व्यासजी बोले— भगवन् ! आपने जिस हनुमत्-केश्वरकी चर्चा की है, उनकी सनातन कथा कहिये।

सनत्कुमारजीने कहा— ब्रह्मन् ! पूर्वकालमें रावण नामक सुप्रसिद्ध राक्षस हो चुका है, जो तीनों लोकोंके लिये कण्टक था। भगवान् विष्णुने श्रीरामचन्द्रजीका अवतार धारण करके उसे लंकामें मार गिराया। दुष्ट रावणका वध करके जनकनन्दिनी सीताको साथ ले वे वानर और भालुओंसहित अपनी नगरी अयोध्याको लौटे। वहाँ राज्य पाकर श्रीरामचन्द्रजी ऋषियोंसे घिरे हुए बैठते और कथा सुनते थे। एक दिन कथाके अन्तमें श्रीरामने मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यसे पूछा—'मुने! भगवान् शंकर और हनुमान्‌जीमें कौन अधिक बलवान् है?' तब मुनिवर अगस्त्यने दशरथनन्दन श्रीरामसे कहा—'प्रभो! युद्ध और शौर्यमें जैसे भगवान् महेश्वरकी कहीं उपमा नहीं है, उसी प्रकार वायुनन्दन हनुमान्‌जीको भी समझना चाहिये।'

यह सुनकर हनुमान्‌जीने मन-ही-मन सोचा—'मुनिवर अगस्त्यजीने श्रीरघुनाथजीके सामने मेरी उपमा शिवजीके साथ दी है, अतः अब मैं लंकापुरीमें राक्षसराज विभीषणसे एक शिवलिंग माँग लानेके लिये जाऊँगा।' इस निश्चयके अनुसार वे लंकामें जाकर विभीषणसे बोले—'महाभाग! तुम मुझे एक उत्तम शिवलिंग प्रदान करो।' राक्षसराज विभीषण बोले—'सुव्रत! रावणके द्वारा स्थापित किये हुए ये छः लिंग हैं। इनमेंसे जो तुम्हें प्रिय हो उसे बताओ, वही मैं तुम्हें दे दूँगा।'

तदनन्तर हनुमान्‌जीने मोतीके समान स्वच्छ एक शिवलिंगका हाथसे स्पर्श किया। विभीषण बोले—'महावीर! तुमने जिस शिवलिंगको ग्रहण किया है, वह मैंने तुम्हें दे दिया।' तत्पश्चात् उस महालिंगको लेकर हनुमान्‌जी निर्मल आकाशमार्गसे चले और सातवें दिन अवन्तीपुरीमें आ पहुँचे। वहाँ रुद्रसरोवरके तटपर उसे स्थापित करके उन्होंने सरोवरमें स्नान किया और महाकालजीकी पूजाके लिये जानेका विचार किया। उस समय हनुमान्‌जीने उस लिंगको उठा लेनेकी चेष्टा की, किंतु उठानेमें समर्थ न हुए। तब वहाँ स्थित हुए महादेवजीने प्रत्यक्ष दर्शन दे वायुनन्दन हनुमान्‌से कहा—'हनुमन्! तुम इस क्षेत्रमें अपने नामसे मेरी स्थापना करके पूजन करो। यह शिवलिंग संसारमें हनुमत्केश्वरके नामसे प्रसिद्ध होगा।' तब हनुमान्‌जीने पर्वतके समान ऊँचे उस शिवलिंगको वहीं स्थापित कर दिया। जो मनुष्य शनिवारको हनुमत्केश्वर शिवका दर्शन करता है, उसे शत्रु का भय नहीं होता और वह संग्राममें विजय पाता है।

$\sim\sim\circ\sim\sim$

  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * १९९

महाकालकी परिक्रमा, यात्रा और विभिन्न देवताओंके दर्शनका माहात्म्य

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी ! जो मनुष्य यमेश्वरका दर्शन करता और तिलमिश्रित जलसे उन्हें स्नान कराकर कुंकुमका अनुलेप दे कमल-पुष्पोंसे उनकी पूजा करता है, उसकी जहाँ कहीं भी मृत्यु क्यों न हुई हो, यमराज उसके लिये पिताके समान बर्ताव करनेवाले हो जाते हैं।

रुद्रसरोवर नामक तीर्थ तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। जो उस तीर्थमें स्नान करके कोटीश्वर शिवका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और भगवान् शिवके लोकमें जाता है। कोटि तीर्थमें पितरोंके उद्देश्यसे जो कुछ दिया जाता है, वह सब कोटिगुना होकर उन्हें मिलता है। कोटि तीर्थमें नहाकर जो अविनाशी परब्रह्मका चिन्तन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। कार्तिक अथवा वैशाखकी पूर्णिमाको सामयिक पुष्पों तथा सुन्दर वस्त्र एवं गन्ध आदिसे महादेवजीकी पूजा करे। कर्पूर, पुष्प, चन्दन तथा अगरु—इन सबको बराबर-बराबर लेकर सिलपर पीस ले और उसीका महाकालजीके श्रीअंगोंमें अनुलेपन करे। जो इस प्रकार उनकी आराधना करता है, वह उन्हींका पार्षद होता है।

रुद्रसरोवरमें स्नान करके कोटीश्वर शिवका दर्शन तथा वन्दन करनेके पश्चात् मनुष्य सनातन महाकालजीका दर्शन करनेके लिये जाय। गन्ध, पुष्प, नमस्कार आदि उपचारोंके द्वारा उन देवेश्वर शिवकी भलीभाँति आराधना करके प्रणाम करे। तत्पश्चात् कपालमोचन तीर्थको जाय। यह वही स्थान है, जहाँ देवेश्वर शिवने पृथ्वीपर कपाल रखा था। वहाँ कपाल रखते ही एक उत्तम शिवलिंग प्रकट हुआ, जो कपालमोचन कहलाया। वह सब पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ कृपणता छोड़कर सौ पल घीसे कपालमोचनको स्नान करावे। इतना सम्भव न हो तो पचास, पचीस अथवा साढ़े बारह पल घीसे भी स्नान करावे। जो ऐसा करता है, वह आयु पूर्ण होनेपर शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तत्पश्चात् नमस्कार करके उत्तम कपिलेश्वर तीर्थमें जाय। कपिलेश्वरजीके दर्शनसे ब्रह्महत्यारा भी मुक्त हो जाता है। वहाँसे हनुमत्केश्वर देवका दर्शन करनेके लिये एकाग्रचित्तसे जाय। व्यासजी ! हनुमत्केश्वरके दर्शनसे अतुल ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है। तदनन्तर सनातन पिप्पलाद महादेवजीके समीप जाय, जिनके दर्शनमात्रसे मुक्ति हो जाती है। तदनन्तर भक्ति और श्रद्धाके साथ स्वप्नेश्वरका दर्शन करनेके लिये जाय। स्वप्नेश्वरदेवके दर्शनसे दुःस्वप्नका नाश होता है। वहाँसे सब ओर मुखवाले विश्वतोमुख ईशान महादेवजीके पास जाय, जिनके दर्शनमात्रसे मनुष्य सम्पूर्ण विश्वका स्वामी होता है। तत्पश्चात् क्रोधको जीतकर इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए सोमेश्वरका दर्शन करनेके लिये जाय। उनके दर्शनसे मनुष्य कुष्ठ रोग आदि दोषोंसे मुक्त हो जाता है। व्यासजी ! वहाँसे एकाग्रचित्त होकर मनुष्य वैश्वानरेश्वरके समीप जाय। उनके दर्शनसे इहलोकमें मनुष्यका सदा अभ्युदय होता है। इसके बाद हाथमें बीजपूरक (बिजौरा नींबू) धारण करनेवाले लकुलीशके समीप जाय। उनके दर्शनसे रुद्रत्व प्राप्त होता है। तत्पश्चात् गणपेश्वर महादेवकी सेवामें जाय, जिनके दर्शनमात्रसे सब प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। वहाँसे वयोवृद्ध सनातन महाकालका दर्शन करनेके लिये जाय, जिनके दर्शनसे रोग, जरा और व्याधिका सर्वथा अभाव हो जाता है। तदनन्तर विघ्नोंका नाश करनेवाले प्राणीशदेवके समीप जाय और भक्तिपूर्वक एकाग्रचित्त हो सौ घड़ा जलसे उनको स्नान करावे। उनको स्नान करानेसे सब प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं और उनके दर्शनसे स्वर्ग मिलता है। तत्पश्चात् उसी मार्गमें प्राप्त होनेवाले दण्डपाणिजीके समीप जाय, जिनके दर्शनमात्रसे यमलोक नहीं देखना पड़ता। तदनन्तर भक्ति और

९२०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

श्रद्धाके साथ पुष्यदन्तका दर्शन करनेके लिये जाय। उनके दर्शनमात्रसे मनुष्य सब पातकोंसे छूट जाता है। तत्पश्चात् एकाग्रचित्त हो गुह्यमहाकालके समीप जाय, जिनके दर्शनमात्रसे मनुष्यको गुप्त पापोंसे छुटकारा मिल जाता है। वहाँसे उत्तम दुर्वासेश्वरके समीप जाय, जिनके दर्शनमात्रसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। दुर्वासेश्वरके समीप श्वास रोककर चले और महादुर्गा गौरीके पास जाकर श्वास छोड़े। इसके बाद एकाग्रचित्त होकर देवीकी पूजा करे। इसके अनन्तर कायेश्वर नामसे प्रसिद्ध देवाधिदेव महेश्वरके समीप जाय, जिनके दर्शनमात्रसे यमलोकको देखनेका अवसर नहीं आता। वहाँसे वधिरेश्वरका दर्शन करनेके लिये जाय, जिनके दर्शनमात्रसे बहरापन दूर हो जाता है। तत्पश्चात् यात्रेश्वरके समीप जाय, जो यात्राके पूर्ण फलको देनेवाले हैं। वहाँ अपने नाम, स्थान और गोत्रका उच्चारण करना चाहिये। यदि नामका उच्चारण न करे तो उसकी यात्रा निष्फल होती है। यात्रेश्वरदेवके आगे एकाग्रचित्त होकर बैठे और भक्तियुक्त होकर बार-बार नमस्कार करके स्तुति बोले। स्तुतिके पश्चात् इस प्रकार कहे—

मया समर्पिता यात्रा त्वत्प्रसादान्महेश्वर।
संसारसागराद् घोरान्मामुद्धर जगत्पते॥

'महेश्वर! मैंने आपकी ही कृपासे यह यात्रा पूरी करके आपके चरणोंमें समर्पित की है। जगत्पते! इस घोर संसार-सागरसे मेरा उद्धार कीजिये।'

जो इस विधिसे भगवान् महाकालकी प्रदक्षिणा करता है, उसके द्वारा सातों द्वीपोंसे युक्त समस्त पृथ्वीकी परिक्रमा हो जाती है। श्रेष्ठ ब्राह्मणको दो लाख गोदान करनेसे जो फल होता है, वही देवाधिदेव महाकालकी एक बार प्रदक्षिणा करनेसे मिल जाता है। महाकालकी प्रदक्षिणा बड़ी भक्तिके साथ करनी चाहिये। इससे पग-पगपर अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है। यह मुझसे साक्षात् भगवान् शंकरने कहा है। जो इस प्रकार भगवान् शिवका चिन्तन करते हुए यात्रा पूरी करता है और वस्त्रसहित दक्षिणा देता है, वह सात जन्मोंमें किये हुए समस्त पापोंसे छूट जाता है। इस तरह यात्रा समाप्त करके मनुष्य अपने घर जाय और यात्रामें जो मुख्य-मुख्य देवता आते हैं, उनकी संख्याके अनुसार छब्बीस श्रेष्ठ ब्राह्मणों तथा शिवध्यानपरायण शिवभक्तोंको भोजन करावे। फिर वस्त्रसहित दक्षिणा देकर उनसे आशीर्वाद ले उन्हें विदा करे। तदनन्तर सब भृत्यवर्गके साथ स्वयं भोजन करे। दीनों, अनाथों, दरिद्रों, अन्धों और अंगविकल मनुष्योंको भी भोजन करावे। यह सब करनेसे एकाग्रचित्तवाला मनुष्य माता-पिताकी सौ पीढ़ियोंका उद्धार करके शिवलोकमें आनन्दका अनुभव करता है।


वाल्मीकिकी तपस्या और वाल्मीकेश्वरकी महिमा

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! जो मौन और ध्यानपरायण होकर भक्तिपूर्वक वाल्मीकेश्वर देवका पूजन करता है, वह उत्तम कवित्व-शक्तिको प्राप्त होता है।

व्यासजीने पूछा—भगवन्! भगवान् वाल्मीकेश्वर कौन हैं और वे यहाँ किस प्रकार प्रकट हुए हैं?

सनत्कुमारजीने कहा—विप्रवर! प्राचीन कालमें सुमति नामक एक भृगुवंशी ब्राह्मण थे। उनकी पत्नी कौशिकवंशकी कन्या थीं। सुमतिके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम अग्निशर्मा रखा गया। वह पिताके बार-बार कहनेपर भी वेदाभ्यासमें मन नहीं लगाता था। एक बार उसके देशमें बहुत दिनोंतक वर्षा नहीं हुई। उस समय बहुत लोग दक्षिण दिशामें चले गये। विप्रवर सुमति भी अपने पुत्र और स्त्रीके साथ विदिशाके वनमें चले गये और वहाँ आश्रम बनाकर रहने लगे। वहाँ अग्निशर्माका लुटेरोंसे साथ हो गया; अतः जो भी उस मार्गसे आता, उसे वह पापात्मा मारता और लूट लेता था। उसको अपने ब्राह्मणत्वकी स्मृति नहीं रही। वेदका अध्ययन जाता रहा, गोत्रका

  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९२१

ध्यान चला गया और वेद-शास्त्रोंकी सुधि भी जाती रही। किसी समय तीर्थयात्राके प्रसंगसे उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सप्तर्षि उस मार्गपर आ निकले। अग्निशर्माने उन्हें देखकर मारनेकी इच्छासे कहा—'ये सब वस्त्र उतार दो, छाता और जूता भी रख दो।' उसकी यह बात सुनकर अत्रि बोले—'तुम्हारे हृदयमें हमें पीड़ा देनेका विचार कैसे उत्पन्न हो रहा है? हम तपस्वी हैं और तीर्थयात्राके लिये जा रहे हैं।'

अग्निशर्माने कहा—मेरे माता-पिता, पुत्र और पत्नी हैं। उन सबका पालन-पोषण मैं ही करता हूँ। इसलिये मेरे हृदयमें यह विचार प्रकट हुआ है।

अत्रि बोले—तुम अपने पितासे जाकर पूछो तो सही कि मैं आपलोगोंके लिये पाप करता हूँ, यह पाप किसको लगेगा। यदि वे यह पाप करनेकी आज्ञा न दें, तब तुम व्यर्थ प्राणियोंका वध न करो।

अग्निशर्मा बोला—अबतक तो कभी मैंने उन लोगोंसे ऐसी बात नहीं पूछी थी। आज आपलोगोंके कहनेसे मेरी समझमें यह बात आयी है। अब मैं उन सबसे जाकर पूछता हूँ। देखूँ किसका कैसा भाव है? जबतक मैं लौटकर नहीं आता, तबतक आपलोग यहीं रहें।

ऐसा कहकर अग्निशर्मा तुरंत अपने पिताके समीप गया और बोला—'पिताजी! धर्मका नाश करने और जीवोंको पीड़ा देनेसे बड़ा भारी पाप देखा जाता है (और मुझे जीविकाके लिये यही सब पाप करना पड़ता है)। बताइये, यह पाप किसको लगेगा?' पिता और माताने उत्तर दिया—'तुम्हारे पापसे हम दोनोंका कोई सम्बन्ध नहीं है। तुम करते हो, अतः तुम जानो। जो कुछ तुमने किया है, उसे फिर तुम्हें ही भोगना पड़ेगा।' उनका यह वचन सुनकर अग्निशर्माने अपनी पत्नीसे भी पूर्वोक्त बात पूछी। पत्नीने भी यही उत्तर दिया—'पापसे मेरा सम्बन्ध नहीं है, सब पाप तुम्हें ही लगेगा।' फिर उसने अपने पुत्रसे पूछा। पुत्र बोला—'मैं तो अभी बालक हूँ (मेरा आपके पापसे क्या सम्बन्ध?)।' उनकी बातचीत और व्यवहारको ठीक-ठीक समझकर अग्निशर्मा मन-ही-मन बोला—'हाय! मैं तो नष्ट हो गया। अब वे तपस्वी महात्मा ही मुझे शरण देनेवाले हैं।' फिर तो उसने उस डंडेको दूर फेंक दिया, जिससे कितने ही प्राणियोंका वध किया था और सिरके बाल बिखराये हुए वह तपस्वी महात्माओंके आगे जाकर खड़ा हुआ। वहाँ उनके चरणोंमें दण्डवत्-प्रणाम करके बोला—'तपोधनो! मेरे माता, पिता, पत्नी और पुत्र कोई नहीं हैं। सबने मुझे त्याग दिया है, अतः मैं आपलोगोंकी शरणमें आया हूँ। अब उत्तम उपदेश देकर आप नरकसे मेरा उद्धार करें।'

उसके इस प्रकार कहनेपर ऋषियोंने अत्रिजीसे कहा—मुने! आपके कथनसे ही इसको बोध प्राप्त हुआ है, अतः आप ही इसे अनुगृहीत करें। यह आपका शिष्य हो जाय। 'तथास्तु' कहकर अत्रिजी अग्निशर्मासे बोले—'तुम इस वृक्षके नीचे बैठकर इस प्रकार ध्यान करो। इस ध्यानयोगसे और महामन्त्र (रामनाम)-के जपसे तुम्हें परम सिद्धि प्राप्त होगी।' ऐसा कहकर वे सब ऋषि यथेष्ट स्थानको चले गये। अग्निशर्मा तेरह वर्षोंतक मुनिके बताये अनुसार ध्यानयोगमें संलग्न रहा। वह अविचल भावसे बैठा रहा और उसके ऊपर बाँबी जम गयी। तेरह वर्षोंके बाद जब वे सप्तर्षि पुनः उसी मार्गसे लौटे, तब उन्हें वल्मीकमेंसे उच्चारित होनेवाली रामनामकी ध्वनि सुनायी पड़ी। इससे उनको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने काठकी कीलोंसे वह बाँबी खोदकर अग्निशर्माको देखा और उसे उठाया। उठकर उसने उन सभी श्रेष्ठ मुनियोंको, जो तपस्याके तेजसे उद्भासित हो रहे थे, प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'मुनिवरो! आपके ही प्रसादसे आज मैंने शुभ ज्ञान प्राप्त किया है। मैं पाप-पंकमें डूब रहा था, आपने मुझ दीनका उद्धार कर दिया है।'

उसकी यह बात सुनकर परम धर्मात्मा सप्तर्षि बोले—वत्स! तुम एकचित्त होकर दीर्घकालतक

९२२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

वल्मीक (बाँबी) में बैठे रहे हो, अतः इस पृथ्वीपर तुम्हारा नाम 'वाल्मीकि' होगा। यों कहकर वे तपस्वी मुनि अपनी गन्तव्य दिशाकी ओर चल दिये। उनके चले जानेपर तपस्वीजनोंमें श्रेष्ठ वाल्मीकिने कुशस्थलीमें आकर महादेवजीकी आराधना की और उनसे कवित्वशक्ति पाकर एक मनोरम काव्यकी रचना की, जिसे 'रामायण' कहते हैं और जो कथा-साहित्यमें सबसे प्रथम माना गया है।

व्यासजी! तभीसे अवन्तीमें वाल्मीकेश्वर शिवकी ख्याति हुई, जो मनुष्योंको कवित्वशक्ति देनेवाले हैं।


शुक्रेश्वर आदिके पूजनकी महिमा, पंचेशानी यात्राका माहात्म्य तथा पद्मावती आदिके दर्शनका फल

सनत्कुमारजी कहते हैं—श्वेत पुष्प और चन्दनसे शुक्रेश्वरकी पूजा करके उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणाम करनेसे मनुष्य रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। व्यासजी! भीमेश्वरका दर्शन और भक्तिसे उनका पूजन करके मनुष्य युद्धमें, रात्रिमें, जलमें और अग्निमें कहीं भी भयको प्राप्त नहीं होता। जो मनुष्य तिलके तेलसे गर्गेश्वरको स्नान कराकर बिल्वपत्रसे उनका पूजन करता है, उसके धर्मकी वृद्धि होती है। जो चतुर्दशीको उपवास करके एक प्रस्थ तिलके जलसे गर्गेश्वरको नहलाकर तिलोंसे ही उनकी पूजा करता है, वह सदा सौख्यका भागी होता है। कामेश्वरका कुंकुम, चन्दन आदिसे भलीभाँति पूजन करके मनुष्य इच्छानुसार चलनेवाले विमानके द्वारा निःसन्देह स्वर्गलोकको जाता है। कार्तिक शुक्लपक्षकी नवमी तिथिमें चूडामणि देवको नमस्कार करके मनुष्य कभी विपरीत योनिमें नहीं जाता और उसकी बुद्धि सदा धर्ममें लगी रहती है। कृष्णपक्षकी अष्टमीको उपवास करके जो मनुष्य चण्डेश्वरजीकी पूजा करता है, वह निर्माल्य-लंघनजनित पाप-तापसे कभी लिप्त नहीं होता। महादेवजीके इन सब पवित्र तीर्थोंकी यात्रा करके विशुद्ध चित्तवाला मनुष्य सदाशिवके मनोहर धामको प्राप्त होता है।

जो मानव इस महाकाल-क्षेत्रमें निवास करते हैं, वे मृत्युके पश्चात् समस्त कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले विमानोंद्वारा रुद्रलोकको जाते हैं। कृष्णपक्षकी चतुर्दशी अथवा अमावास्याको एक दिन उपवास करके जो मनुष्य महेश्वरके ध्यानपूर्वक प्रतिलोम और अनुलोम-क्रमसे पंचेशानी यात्रा करते हुए पाँचों ईशान-विग्रहोंको नमस्कार करता है, वह बहुत जन्मोंके किये हुए समस्त पापोंसे छुटकारा पा जाता है और वह इसी शरीरसे रुद्रलोकको जाता है।

पंचेशानी यात्रा इस प्रकार की जाती है—एकादशीको प्रातःकाल एकाग्रचित्त हो रुद्रसरोवरमें स्नान करे। तत्पश्चात् श्राद्ध करके महाकालेश्वरको प्रणाम करे। फिर पिंगलेश्वरके समीप जाकर वहाँ स्नान और श्राद्ध करे। तदनन्तर पिंगलेश्वर गणेशजीके समीप जाकर गन्ध, पुष्प और धूप आदिसे उनका पूजन करे। वहाँसे लौटकर फिर महाकालेश्वरके समीप आकर स्नान करे। स्नानके पश्चात् जितेन्द्रिय पुरुष स्वयं प्रकट हुए सनातन देवदेवेश्वर महाकालका पूजन करे। वहीं ईशानके समीप रात्रिमें भोजन करके महेश्वरका ध्यान करते हुए भूमिपर शयन करे। इस प्रकार रात्रि बितानेके अनन्तर द्वादशीको प्रातःकाल उठकर स्नानके पश्चात् पूर्ववत् सब कुछ करे। कायावरोहणतीर्थमें जाकर पिंगलेश्वरकी ही भाँति पूजा करे। इसी प्रकार त्रयोदशीको भी यात्रा करके पश्चिममें बिल्वेश्वरका पूजन करे। चतुर्दशीको उत्तर दिशामें उत्तरेश्वरका पूजन करे। फिर अमावास्यामें स्नान करके पवित्र हो महाकालेश्वरके समीप जाकर गन्ध, पुष्प, धूप और भाँति-भाँतिके नैवेद्योंद्वारा उनका पूजन करे। गीत, नृत्य

* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * १२३


आदि एवं प्रणाम करके उनसे क्षमा-प्रार्थना करे। | फूलोंसे अमरावती देवीका पूजन करता है, वह इस प्रकार यात्रा करके अपने घर जाय और | स्वर्गमें देवताओंके साथ सदा आनन्द भोगता वहाँ शिवभक्तिपरायण पाँच ब्राह्मणोंको भोजन | है। जो एकाग्रचित्त हो भक्तिपूर्वक उज्जयिनी करावे। व्यासजी! जो मनुष्य ऐसा करता है, | देवीका दर्शन करता है, वह रुद्रलोकमें सम्पूर्ण वह स्वर्गलोकमें आनन्दका भागी होता है। | ऐश्वर्योंसे सम्पन्न हो प्रतिष्ठित होता है। जो जो नियमपूर्वक कुशस्थलीकी परिक्रमा करता | भगवान् शिवमें भक्ति रखते हुए विशाला देवीका है, उसके द्वारा सात द्वीपोंवाली वसुन्धराकी | दर्शन करता है, वह कायिक, वाचिक और परिक्रमा हो जाती है। जो मनुष्य पद्मावतीजीका | मानसिक त्रिविध पापोंसे मुक्त हो जाता है। दर्शन और कमलके पुष्पोंद्वारा उनका पूजन करता | कृष्ण पक्षकी अष्टमी तिथिको उपवास करके तथा धूप और नैवेद्य चढ़ाता है, वह मृत्युके | जितेन्द्रिय, पवित्र एवं जितात्मा होकर किसीके पश्चात् ब्रह्मलोकमें जाता है। जो सुवर्णके समान | साथ भी वार्तालाप न करे—मौन रहे। इस प्रकार पीले रंगवाले पुष्पोंसे महाभक्तिपूर्वक स्वर्णशृंगाटिका | रहकर जो अक्रूरेश्वर देवका दर्शन और पूजन देवीकी पूजा करता है, वह शिवलोकको जाता | करता है, वह रुद्रलोकको प्राप्त होता है। जो है। जो त्रिभुवन-विख्यात अवन्ती देवीका दर्शन | स्नान करके पवित्र हो, इन्द्रियोंको वशमें रखते करता है, वह इच्छानुसार चलनेवाले विमानद्वारा | हुए ब्रह्माजीका दर्शन करता है, वह घोर पातकसे इन्द्रलोकको जाता है। जो भक्तिपूर्वक कमलके | मुक्त हो ब्रह्मलोकको जाता है।

$\approx\approxO\approx\approx$

अंकपादतीर्थकी महिमा, श्रीकृष्णके द्वारा मरे हुए गुरुपुत्रके लाये जानेकी कथा

सनत्कुमारजी कहते हैं—जहाँ भगवान् | प्रकट हुए थे। उन दोनोंका रूप दिव्य था। दोनों महाकाल हैं, शिप्रा नदी है, अत्यन्त निर्मल गति | ही बड़े तेजस्वी पुरुष थे। यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णने प्राप्त होती है और जिस उज्जयिनीमें विशालाक्षी | कंस और चाणूरको मारकर उग्रसेनको यदुकुलके देवीका दर्शन प्राप्त होता है, वहाँका निवास किसको | राजपर अभिषिक्त किया और पूछा—'राजन्! अब नहीं भाता है। जो मनुष्य महानदी शिप्रा में स्नान | मेरे लिये क्या आज्ञा है?' उनके ऐसा कहनेपर करके भगवान् महाकालको नमस्कार करता है, वह | राजा उग्रसेन बोले—'कृष्ण! मेरा सब कार्य सिद्ध मृत्युका शोक नहीं करता। महाकाल क्षेत्रमें मरा | है, तुम्हारे रहते मेरे लिये कोई भी वस्तु दुर्लभ हुआ कीट और पतंग भी भगवान् शिवका सेवक | नहीं है। अब तुम दोनों उज्जयिनी पुरीमें जाकर होता है। अवन्तीमें अंकपाद नामक तीर्थके भीतर | विद्या पढ़ो।' राजाका यह आदेश पाकर बलराम श्रीबलराम और श्रीकृष्णका दर्शन करे। उन दोनोंके | और श्रीकृष्ण आचार्य सान्दीपनि मुनिके घर गये। दर्शनमात्रसे मनुष्य यमलोकको नहीं देखता। | वहाँ जाकर उन्होंने चारों वेदोंको कण्ठस्थ किया, व्यासजीने पूछा—महामुने! वे दोनों बलराम | सम्पूर्ण आचार-विचारका ज्ञान प्राप्त किया और और श्रीकृष्ण अंकपाद नामक तीर्थमें कैसे गये? | रहस्य तथा संहारसहित धनुर्वेदकी शिक्षा प्राप्त सनत्कुमारजीने कहा—मुने! बलराम और | की। यह सारा ज्ञान उन्होंने चौंसठ दिन-रातमें ही श्रीकृष्ण—ये दोनों भाई भगवान्‌के अवतार थे | प्राप्त कर लिया। सान्दीपनि मुनिने उन दोनोंका और इस पृथ्वीका भार उतारनेके लिये यदुकुलमें | यह असम्भव एवं अलौकिक कर्म देखकर सोचा,

९२४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

जान पड़ता है इन दोनोंके रूपमें साक्षात् सूर्य और चन्द्रमा आ गये हैं। तदनन्तर वे अपने शिष्योंके साथ स्नान करनेके लिये महाकाल तीर्थमें गये। उन शिष्योंके साथ बलराम और श्रीकृष्ण भी थे। वहाँ उन दोनों भाइयोंने जब भगवान् महाकालको प्रणाम किया, तब वे साक्षात् प्रकट होकर उनसे बोले—'प्रभो! तुम सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी हो। मनुष्यरूपमें अवतीर्ण हुए तुम्हारे द्वारा साधु पुरुषों और अज्ञानी जीवोंको भी सदा सुख ही प्राप्त हुआ है तथा मनुष्योंको पीड़ा देनेवाले राजा कंस आदि बलाभिमानी दैत्योंको तुम दोनोंने मार गिराया है। अब तुम्हें मुनियों, सिद्धों और देवताओंका पालन करना चाहिये।'

'बहुत अच्छा, ऐसा ही करूँगा'—ऐसा कहकर विश्ववन्द्य भगवान् श्रीकृष्ण वहाँसे चले गये। अपना अध्ययन पूरा करके कृतकृत्य हुए श्रीकृष्ण और बलरामने सान्दीपनि मुनिसे हर्षमें भरकर कहा—'आचार्य! श्रीचरणोंकी सेवामें गुरुदक्षिणाके रूपमें हम क्या दें।' उनका यह प्रिय वचन सुनकर गुरुने प्रसन्न होकर कहा—'मेरे एक पुत्र पैदा हुआ था। उसे तीर्थयात्रामें प्रभासक्षेत्रके भीतर समुद्रके जलमें एक जल-जन्तुने मार डाला। मेरे उसी पुत्रको तुम ले आओ।'

'बहुत अच्छा' कहकर श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ चले गये। प्रभासक्षेत्रमें समुद्रने उनसे कहा—'भगवन्! मेरे जलमें पंचजन नामक एक महादैत्य रहता है। उसीने तिमिका रूप धारण करके उस बालकको खा लिया है।' तब ग्राहरूपी उस महाबली पंचजनको मारकर श्रीकृष्णने उसके उदरमें स्थित शंखको ग्रहण किया। उसके पेटमें जब बालक नहीं दिखायी दिया, तब वे वरुणलोकमें गये और वरुणदेवसे बोले—'भगवन्! मुझे एक महान् रथ दीजिये, जिसपर आरूढ़ होकर मैं प्रेतराज यमका दर्शन करूँ।' यह सुनकर वरुणजीने प्रसन्नचित्त होकर श्रीकृष्णको रथ प्रदान किया। उस रथको देखकर श्रीकृष्ण और बलराम बड़े प्रसन्न हुए और उसकी परिक्रमा करके बड़े भाईके साथ श्रीकृष्णचन्द्र उसपर आरूढ़ हुए। तदनन्तर वे यमलोकको लक्ष्य करके दक्षिण दिशाकी ओर गये। सहस्रों किरणोंसे आवृत्त यमपुरीको देखकर भगवान् श्रीकृष्णने शंख हाथमें लिया और उसे खूब जोरसे बजाया। उसकी ध्वनिसे समस्त यमलोकवासी भयभीत हो गये। श्रीकृष्णके दर्शनसे नरक-यातना भोगनेवाले पापियोंको भी सुख प्राप्त हुआ और उन नरकोंमें जलती हुई आग स्वतः बुझ गयी। जगदीश्वर श्रीकृष्णके नरकोंके समीप पदार्पण करनेपर सबके पापोंका नाश हो गया। सभी पापी नरकसे छूट गये और अक्षय धामको प्राप्त हो गये। उस समय सब नरक सूने हो गये। यह देख यमराजके दूतोंने नरकोंकी ओर जानेसे उनको रोका।

दूत बोले—वीरवर! इस मार्गसे अपना रथ न लाइये; क्योंकि यहाँ परस्त्रीहरण, परधनहरण करनेवाले पापी अपने पापके फलसे यमराजकी आज्ञाके अनुसार अधोगतिको प्राप्त हुए हैं। जिन्हें करोड़ों वर्षोंमें नरकसे छूटना चाहिये, वे आपका दर्शन करके तत्काल ही स्वर्गलोकको जा पहुँचे हैं।

यमदूतोंकी यह बात सुनकर श्रीकृष्णने दयासे आर्द्र होकर कहा—यमदूतो! मैं इन पापी जीवोंका उद्धार करनेके लिये ही यहाँ आया हूँ। मैं सबके लिये यमलोकका निवारक और स्वर्गलोकका दाता हूँ। तुम मेरी बातें यमराजसे जाकर कहो। श्रीकृष्णका यह कथन सुनकर यमदूत बड़ी उतावलीके साथ यमराजके समीप गये और उनसे नारकी जीवोंके मुक्त हो जानेका सब समाचार कह सुनाया। दूतोंकी बात सुनकर यमराजको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने श्रीकृष्ण-बलरामके साथ घोर युद्ध किया; परंतु पग-पगपर उन्हें पराजित ही होना पड़ा। अन्ततोगत्वा यमने अमोघ अस्त्र कालदण्डका प्रहार किया। उस जलते हुए कालदण्डको आते देख बलरामजीने लीलापूर्वक पकड़ लिया और पुनः उसे यमराजपर ही चलानेका विचार किया। इतनेमें ही ब्रह्माजी उन दोनोंके बीचमें आ गये और उन्होंने श्रीकृष्णको युद्धसे रोका। तत्पश्चात् बलरामजीसे कहा—'चराचर

  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * | ९२५ ---|---

जगत्को धारण करनेवाले वीरवर बलभद्रजी ! आप इस कालास्त्रको यमराजके ऊपर न छोड़िये। इस संसारमें आपकी समानता करनेवाला कोई नहीं है। सम्पूर्ण विश्वका पालन करनेवाले भगवान् विष्णुको भी आप सदा अपनी गोदमें धारण करते हैं। भला आपके समान दूसरा कौन है, जो सम्पूर्ण जगत्का भार वहन करनेमें समर्थ हो। जो जगत्की सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले जगदीश्वर हैं, उन एकमात्र विश्वनायक विष्णुको भी आप गोदमें लेकर लाड़-प्यार करते हैं। जगत्में आपकी स्तुति कर सकनेवाला कौन है? कौन आपके गुणोंको जान सकता है? हम तो भगवान् विष्णुकी नाभिसे प्रकट हुए एक कमलके निवासी हैं, अतः सदा आपके अंकमें ही रहते हैं। हमें आपकी महान् महिमाका ज्ञान कैसे हो सकता है?'

बलरामजीसे इस प्रकार कहकर चतुर्मुख ब्रह्माने पुनः भगवान् वासुदेवसे कहा—'कृष्ण! कृष्ण! आप इस विकराल काल (यमराज)-पर कृपा कीजिये। आप सम्पूर्ण विश्वके एकमात्र अधीश्वर साक्षात् विष्णु हैं और नरक-समुद्रसे सबका उद्धार करनेवाले हैं। जगन्नाथ! यह आपको नहीं जानता। भगवन्! आपने ही पूर्वकालमें इसे यमके पदपर स्थापित किया था। प्रभो! पापी पुरुषोंको नरकमें ले जानेके लिये ही यमराजकी नियुक्ति हुई है। अतः जगदीश्वर! पुरुषोत्तम! आप इसके अपराधको क्षमा करें। भगवन्! यमराज आपका अपराधी है। इससे आप जो कुछ कहना चाहते हैं, वह कहिये।

ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर श्रीकृष्णने कहा—'पितामह! सुनिये। मेरे गुरु सान्दीपनि मुनिका पुत्र यहाँ लाया गया है। हम उसीके लिये यहाँ आये हैं। हमें अपने श्रेष्ठ गुरुको गुरु-दक्षिणा देनेके लिये वह बालक सौंप दीजिये। प्रभो! हम दोनोंने जो प्रतिज्ञा कर ली है, उसका पालन करवाइये।

यह सुनकर ब्रह्माजीने युद्धमें हारे हुए यमराजको बुलाकर कहा—'ये विष्णुस्वरूप श्रीकृष्ण जो आज्ञा देते हैं उसका पालन करो। यह सुनकर धर्मराजने सान्दीपनि मुनिके पुत्रको श्रीकृष्णकी सेवामें अर्पित कर दिया। गुरुपुत्रको पाकर प्रसन्न हुए श्रीकृष्णने ब्रह्माजीसे कहा—'ब्रह्मन्! आजसे लेकर उज्जयिनीमें मेरे चरणोंसे चिह्नित जो अंकपाद नामक स्थान है, वहाँ मरे हुए मनुष्य यमराजका दर्शन नहीं करेंगे। महाकालके उत्तर भागमें पुरुषोत्तम, विश्वरूप, गोविन्द, शंखोद्धार तथा केशव—इन पाँचों विग्रहोंका जो कुशस्थलीमें दर्शन करेंगे, वे कभी नरकमें नहीं जायँगे। इसी प्रकार मेरे और बलरामजीके यहाँ आनेसे नरकोंमें पड़े हुए जीव घोर नरकसे मुक्त होकर सब-के-सब दिव्यलोकको प्राप्त होंगे।'

भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर ब्रह्माजीने प्रसन्न होकर कहा—'श्रीकृष्ण! आपने जो कुछ कहा है, वह सब पूरा हो। इस प्रकार बलभद्रसहित श्रीकृष्ण गुरुपुत्रको साथ लेकर श्रीब्रह्माजीसे पूछकर अपने रथपर सवार हुए और नरकमें पड़े हुए प्राणियोंके उद्धारके लिये उन्होंने पुनः शंखध्वनि की। उस शंखनादको सुनकर और श्रीकृष्णके स्मरणजनित पुण्यसे समस्त नारकी जीव दिव्य विमानोंपर चढ़कर स्वर्गलोकमें चले गये। यमराजने भी पुनः बलदेवजीसे अपना दण्ड लेकर नगरमें प्रवेश किया और ब्रह्माजी वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर बलभद्रसहित श्रीकृष्ण शीघ्रगामी रथके द्वारा उज्जयिनीपुरीमें आये। वहाँ उन्होंने गुरुको उनका पुत्र समर्पित किया।

इस प्रकार वहाँ आये हुए सान्दीपनि मुनिके पुत्रको देखकर समस्त नगर-निवासियों तथा वहाँके राजाको बड़ा विस्मय हुआ और उन्होंने श्रीकृष्ण-बलरामको कोई श्रेष्ठ देवता मानकर उनका पूजन किया। वहाँ शंखी, विश्वरूप, माधव और चक्री—ये चार भगवान् विष्णुके क्षेत्र हैं और पाँचवाँ अंकपाद नामक क्षेत्र है। अब मैं इनकी यात्राका क्रम बतलाऊँगा। मन्दाकिनीमें स्नान करके बलराम और श्रीकृष्णका दर्शन करे। तत्पश्चात् शंखोद्धारतीर्थमें

९२६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

स्नान करके पुनः उन्हीं दोनोंका दर्शन करे। उसके बाद कुण्डमें स्नान करके गोविन्दकी पूजा करे। फिर चक्री और शंखीभगवान्‌का दर्शन करके युगल अंकपादों (चरणचिह्नों)-का दर्शन करके विश्वरूपका दर्शन करे। विश्वरूपके आगे करीकुण्डमें विधिपूर्वक स्नान करनेके पश्चात् पूर्ववत् बलराम और श्रीकृष्णका दर्शन करे। तदनन्तर पुनः कुण्डमें स्नान करके गोविन्दजीकी पूजा करे। उसके बाद चक्रधारी श्रीकृष्ण और बलरामका दर्शन करके केशवके समीप जाय। शिप्राके जलमें स्नान करके मनुष्य भक्तिपूर्वक केशवकी पूजा करे। फिर वहाँसे अंकपादमें लौटकर वहीं रात्रि व्यतीत करे। प्रातःकाल स्नान आदिसे पवित्र हो वहाँ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पाँच ब्राह्मणोंको भोजन करावे। जो पुरुष द्वादशीको उपवास करके चन्दन, पुष्प, धूप तथा भाँति-भाँतिके नैवेद्योंद्वारा अंकपादजीकी पूजा करता है तथा जो वहाँ श्राद्ध करता है, वह सदैव वैकुण्ठधाममें निवास करता है।


लड्डुकप्रिय गणेश, कुसुमेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर, ब्रह्माणी देवी, ब्रह्मेश्वर, यज्ञवापी, रूपकुण्ड, अनंगेश्वर तथा सोमेश्वरका माहात्म्य

**सनत्कुमारजी कहते हैं—**देवताओंने लड्डुओंसे विघ्नराज गणेशजीकी पूजा की थी, तबसे यहाँ गणेशजी लड्डुकप्रियके नामसे प्रसिद्ध हैं। जो भक्तिपूर्वक विघ्नराज गणेशजीकी पूजा करता है, उसे कभी विघ्नका सामना नहीं करना पड़ता। गणेशजी सन्तुष्ट होकर उस पुरुषकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूरी कर देते हैं। चतुर्थीको केवल रातमें भोजन करनेका व्रत लेकर विशेषतः शिप्रा नदीमें स्नान करके रक्त वस्त्र धारण करे और लाल चन्दनके जलसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक गणेशजीको स्नान करावे। फिर लाल चन्दनका अनुलेपन करके लाल फूलोंसे उनकी पूजा करे। धूप और उत्तम गन्ध निवेदन करे। नैवेद्यमें लड्डुओंका भोग लगावे। जो ऐसा करता है, वह मृत्युके पश्चात् शिवधामको जाता है।

जो सुरद्वारमें देवदानववन्दित कुसुमेश्वर शिवकी श्रद्धासे पूजा करता है, वह शिवलोकमें आनन्दका अनुभव करता है। जो देवाधिदेव जयेश्वर महादेवका दर्शन करता है, वह सब कार्योंमें विजयी होता है और अन्तमें शिवलोकको जाता है। यदि मनुष्य शिवद्वारमें शिवलिंगका अर्चन करे तो विमानद्वारा दिव्यलोकको जाता है और गणपतिका पद प्राप्त करता है। पूर्वकालमें महामुनि मार्कण्डेयजीने जहाँ बड़ी भारी तपस्या की थी, वहाँ भगवान् शंकरका दर्शन करके मनुष्य वाजपेय यज्ञका फल पाता है और वह सब पापोंसे शुद्ध होकर दीर्घायु होता है। जहाँ हंसवाहिनी ब्रह्माणी देवी स्थित हैं, वह महास्थान अवन्ती पुरीमें बहुत उत्तम माना गया है। वे भक्तोंकी आशा पूर्ण करती तथा जैसे माता अपने पुत्रका पालन करती है, उसी प्रकार भक्तोंका पालन करती हैं। सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाली उन हंसवाहिनी देवीका गन्ध, पुष्प और नैवेद्योंद्वारा पूजन करे। जो ब्रह्मसरोवरमें स्नान करके ब्रह्मेश्वर शिवका दर्शन करता है, वह संसार-बन्धनसे मुक्त हो ब्रह्मलोकमें आनन्दका अनुभव करता है। जहाँ ब्रह्माजीने यज्ञ किया था, उस स्थानपर यज्ञके लिये जो कुण्ड बनाया गया था, उसका नाम यज्ञवापी है। उसमें स्नान करके पवित्र हो जो पशुपतिका दर्शन करता है, वह पशुयोनिमें पड़े हुए पितरोंका भी उद्धार कर देता है और स्वयं शिवलोकमें जाता है, जहाँ साक्षात् महेश्वर निवास करते हैं। रूपकुण्डमें स्नान करके मनुष्य रूपवान् होता है। जो अनंगकुण्डमें स्नान करके अनंग (कामदेव) द्वारा पूजित अनंगेश्वर महादेवकी पूजा करता है, वह मनोवांछित कामना प्राप्त करता है और मरनेके बाद शिवधामको जाता है। जो करीकुण्डमें नहाकर भगवान् विश्वरूपका पूजन

* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९२७

करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकको जाता है। जो मनुष्य अजागन्धमें स्नान करके ब्रह्मेश्वर शिवका दर्शन करता है, वह ब्रह्महत्याके समान पापोंको तत्काल नष्ट कर देता है। जो चक्रतीर्थमें स्नान करके चक्रस्वामीकी पूजा करता है, वह इस पृथ्वीपर चक्रवर्ती राजा होता है। जो विधिपूर्वक स्नान करके सिद्धेश्वरका दर्शन करता है, वह इच्छानुसार चलनेवाले विमानके द्वारा रुद्रलोकमें जाता है। जो मनुष्य सोमवतीमें स्नान करके सोमेश्वर शिवका पूजन करता है, वह चन्द्रमाके समान निर्मल होकर चन्द्रलोकमें आनन्द भोगता है।

व्यासजीने पूछा—भगवन्! सोमवतीतीर्थ और सोमेश्वर लिंगका प्राकट्य किस प्रकार हुआ, इसको मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ।

सनत्कुमारजीने कहा—व्यास! सुनो, सम्पूर्ण लोकोंको तृप्ति प्रदान करनेवाले जो भगवान् सोम हैं, उनके पिता महाभाग अत्रिमुनि पूर्वकालमें उज्जयिनीपुरीमें रहकर तीन हजार दिव्य वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्यामें लगे रहे। वे दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर ब्रह्मध्यानमें तत्पर हो तपस्या करते थे। उन महात्माका ब्रह्मतेज उनके नेत्रोंसे प्रकट हुआ और सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ ऊर्ध्वलोकतक फैल गया। जब कोई भी उसे धारण करनेमें समर्थ न हुआ, तब वह असह्य तेज सम्पूर्ण लोकोंको उद्भासित करता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसीसे शीतकिरणोंवाले सोम प्रकट हुए, जो सब लोगोंको प्रिय हैं। उसी तेजसे सोमा नामकी एक नदी भी उत्पन्न हुई, जो अमृतमय जलसे पूरित हो शिप्रा नदीमें जाकर मिल गयी। तबसे वह तीर्थ सोमवती-शिप्राके नामसे विख्यात है। सोमवती-शिप्रा अत्यन्त पुण्यदायिनी है। उसका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंको त्याग देता है। मुने! सोमवती अमावास्याका योग आनेपर जो बुद्धिमान् मनुष्य सोमवती-शिप्रामें स्नान-दान, जप तथा होम करता है, उसका किया हुआ वह सब पुण्य अक्षय होता है। यहाँपर तिल और जलद्वारा तर्पण तथा पिण्डदान करनेसे पितरोंकी यथावत् तृप्ति होती है। शिप्रा नदी एवं सोमवतीके संगमका जल कोटि तीर्थोंका फल देनेवाला है। यदि अमावास्या और सोमवारका योग मिल जाय तब तो वह साक्षात् पितृतीर्थ (गया)-के समान हो जाता है। अमावास्या, सोमवार और व्यतीपात तीनोंका योग होनेपर सोमवतीतीर्थमें गयासे सौ गुना अधिक पुण्य कहा गया है।

चन्द्रमाको पृथ्वीपर गिरा हुआ देख जगद्गुरु ब्रह्माजीने उन्हें सम्पूर्ण लोकोंके हितकी इच्छासे रथपर बिठाया। उस रथपर ब्रह्माजीके साथ चन्द्रमाको देखकर सब देवताओंने प्रसन्नतापूर्वक स्तवन किया। उस समय चन्द्रमाका प्रकाशमान तेज पृथ्वीपर सब ओर गिरा। ब्रह्माजीने उस रथसे इक्कीस बार पृथ्वीकी परिक्रमा की। इससे चन्द्रमाका शीतल तेज सर्वत्र गिरा। वह तेज ही पृथ्वीसे अत्यन्त निर्मल ओषधियों (अन्न आदि)-के रूपमें उत्पन्न हुआ। उन्हीं ओषधियोंके द्वारा यह सम्पूर्ण विश्व तथा यहाँ रहनेवाली चार प्रकारकी प्रजा जीवन धारण करती है। तदनन्तर भगवान् सोमने प्रसन्न होकर दस हजार वर्षोंतक अत्यन्त दुःसह तप किया। उस तपस्यासे सन्तुष्ट हुए लोकपितामह ब्रह्माजीने सोमको आधिपत्य प्रदान किया। वे बीज, ओषधि और ब्राह्मणोंके राजा हुए। प्रचेताओैंके पुत्र प्रजापति दक्षने अपनी सत्ताईस कन्याओंको, जो महान् व्रतका पालन करनेवाली तथा नक्षत्र नामसे प्रसिद्ध थीं, राजा सोमके साथ ब्याह दिया।

एक समय सोमवारके दिन सोमवती अमावास्याके योगमें राजा सोम महादेवजीके दर्शनकी इच्छासे अवन्ती पुरीमें आये। उन्होंने अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके सोमवतीमें स्नान किया और सोमेश्वरकी पूजा की। उनकी भक्तिसे सन्तुष्ट होकर महादेवजीने कहा—'सोम! मेरी कृपासे तुम्हारा शरीर बहुत सुन्दर एवं कमनीय हो जायगा और आजसे यह मेरा विग्रह सोमेश्वर नामसे विख्यात होकर भोग

९२८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

और मोक्ष देनेवाला होगा।' व्यासजी! इस प्रकार वह शिवलिंग और तीर्थ अत्यन्त दुर्लभ बताया गया है। जो श्रावणमासमें इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए प्रतिदिन भगवान् सोमेश्वरका दर्शन करता है, वह प्रतिदिन सौराष्ट्रप्रदेशके ज्योतिर्मय लिंग सोमनाथकी पूजाका फल पाता है।


$\sim\sim\circ\sim\sim$

नरकोंका संक्षिप्त वर्णन, केदारेश्वर, जटेश्वर, इन्द्रेश्वर, कुण्डेश्वर, गोपेश्वर, आनन्देश्वर तथा रामेश्वरके दर्शन-पूजनका माहात्म्य

सनत्कुमारजी कहते हैं—नरकतीर्थमें स्नान करके भगवान् महेश्वरका दर्शन करनेसे मनुष्यको कभी नरक नहीं देखना पड़ता।

व्यासजीने पूछा—प्रभो! नरक कितने हैं? और किस स्थानपर उनकी स्थिति है? यह बतानेकी कृपा करें।

सनत्कुमारजीने कहा—व्यास! समस्त नरक पाताललोकमें स्थित हैं, जो सदैव दुःख देनेवाले हैं। सब जीव अपने-अपने पुण्योंका नाश होनेसे अपने-अपने कर्मोंके अनुसार अधोगतिको प्राप्त होते हैं। रौरव, शूकर, रौद्र, ताल, विनशक, तप्तकुम्भ, तप्तायस, महाज्वाल, कुम्भीपाक, क्रकचन, अतिदारुण, कृमिभुक्ति, रक्त, लालाभक्ष, गण्डक, अधोमुख, अस्थिभंग, यन्त्र-पीड़नका, सन्दंश, रुधिरांग, असिपत्र और कुभोजन इत्यादि सभी नरक अत्यन्त भयंकर हैं। यमराजके राज्यमें उन सबकी स्थिति है। उनका नाम सुन लेनेमात्रसे अत्यन्त भय हो जाता है। पापकर्मोंमें संलग्न रहनेवाले मनुष्य उनमें गिरते हैं और गिरे हुए जीव अपने कर्मोंके अनुसार उनमें पकाये जाते हैं। भाँति-भाँतिकी यातनाओं द्वारा उनके भयानक पापकर्मोंका क्षय होता है। तपायी हुई लोहेकी साँकलसे मनुष्योंके दोनों हाथ खूब कसकर बाँध दिये जाते हैं और बड़े-बड़े वृक्षोंके शिखरोंपर यमदूत उन्हें लटका देते हैं। वे अपने-अपने कर्मोंके लिये शोक करते हुए चुपचाप लटके रहते हैं और भयंकर यमदूत अग्निके समान कीलों, काँटों और लोह-दण्डोंसे उन पापात्माओंको मारते-पीटते रहते हैं। कभी क्षणभरमें वे आगसे तपाये जाते हैं और कभी काटकर सारे शरीरको जर्जर करके उन्हें सब ओर फेंक दिया जाता है। इस प्रकार उन नरकोंमें यातना दे-देकर पापी पुरुषोंको पकाया जाता है। यह यातना उन्हीं पापियोंको भोगनी पड़ती है, जो बहुत पाप करके उनके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं करते। जिस पुरुषको पाप करनेके बाद उसके लिये बहुत पश्चात्ताप होता है, उसकी पापशुद्धिके लिये एकमात्र भगवान् शिवका स्मरण ही सर्वोत्तम प्रायश्चित्त है। इसलिये दिन-रात पुरुषोत्तम शिवका स्मरण करनेवाला मनुष्य अपने समस्त पापोंका नाश करके शुद्ध हो जाता है, फिर उसे नरकमें नहीं जाना पड़ता।

जो मनुष्य यहाँ समस्त लोकोंमें विख्यात केदारतीर्थमें स्नान करके शुद्ध हो केदारेश्वर महादेवका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो शिवलोकमें परमानन्दका अनुभव करता है। जटाश्रृंगतीर्थमें स्नानसे पवित्र हो जितेन्द्रिय पुरुष यदि जटेश्वर शिवका दर्शन करे, तो वह सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है। इन्द्रतीर्थमें स्नान करके इन्द्रेश्वर शिवका दर्शन करनेवाला मनुष्य भी सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो शिवजीके ध्यानमें तत्पर हो कुण्डेश्वरका दर्शन करता है, वह शिवदीक्षाका शुभ फल प्राप्त करता है। गोपतीर्थमें स्नान करके गोपेश्वरका दर्शन करनेवाला मनुष्य शिवलोकको जाता है। चिपिटातीर्थमें स्नान करके जो भगवान् शिवको प्रणाम करता है, वह पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म नहीं लेता। विजयतीर्थमें नहाकर आनन्देश्वरकी पूजा करनेसे समस्त पापोंसे छूटा हुआ मानव स्वर्गलोकमें विजयी होता है।

* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९२९

पूर्वकालमें श्रीरामचन्द्रजी सीता और लक्ष्मणके साथ चित्रकूटसे इस उज्जयिनी पुरीमें आये। यहाँ मुनिश्रेष्ठ परशुरामजीसे मिलकर उन्होंने पूछा— 'महामुने! यहाँ कौन-कौनसे पुण्यतीर्थ हैं और कौन-सा क्षेत्र है?' श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर विप्रवर परशुरामजीने कहा— 'रघुवंशकी वृद्धि करनेवाले वीर श्रीराम! प्राचीन कालमें अवन्ति देशके अन्तर्गत जो कुशस्थली नामकी भूमि थी, वही इस समय उज्जयिनीके नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ जाकर तुम अपने पिता दशरथजीको पिण्डदानसे तृप्त करो। उस पुरीमें देवताओं और दानवोंके गुरु भगवान् महाकाल निवास करते हैं। वहाँ जो ब्राह्मण और महाबली क्षत्रिय जाते हैं, उन्हें उस परम पदकी प्राप्ति होती है, जहाँ साक्षात् भगवान् महेश्वर विराजमान हैं।'

यह सुनकर भगवान् श्रीरामचन्द्रजी, जहाँ पुण्यदायिनी शिप्रा नदी बहती है, उस अवन्ती पुरीमें आये। वहाँ स्नान करके उन्होंने अपने पितरोंका तर्पण किया। तत्पश्चात् वे महाकालजीका दर्शन करनेके लिये चले। इसी समय आकाशवाणीके द्वारा देवाधिदेव महादेवजीने कहा— 'रघुनन्दन! तुम्हारा कल्याण हो, तुम अपने नामसे यहाँ मेरी स्थापना करो।' यह आकाशवाणी सुनकर श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा— 'सुमित्रानन्दन! भगवान् शिवने मुझपर अनुग्रह किया है, अतः इस तीर्थमें तुम रामेश्वर नामक शुभ शिवलिंगकी प्रतिष्ठा करो।' यह आज्ञा पाकर लक्ष्मणने वहाँ भगवान् शंकरको स्थापित किया। फिर शिवजीका पूजन करके श्रीराम, लक्ष्मण तथा जानकीजीने वहाँसे यात्रा की। जो मनुष्य रामतीर्थमें स्नान करके रामेश्वर शिवका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकको जाता है।


सौभाग्य आदि तीर्थोंकी महिमा, अर्जुनको इन्द्रसे सूर्यप्रतिमाकी प्राप्ति तथा अवन्तीमें उसकी स्थापना और उनके दर्शनका माहात्म्य

सनत्कुमारजी बोले—सौभाग्यतीर्थमें स्नान करके सौभाग्येश्वरका दर्शन करनेपर मनुष्य सब पापोंसे छूटकर परम सौभाग्य पाता है। घृततीर्थमें स्नान करके भगवान् शिवको घृतसे नहलावे और अग्निमें घृतकी आहुति दे। ऐसा करनेवाला मनुष्य रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। देवताओं और दैत्योंसे वन्दित योगीश्वरी देवीका पूजन करके मनुष्य सब पापोंसे शुद्ध हो जाता है और परम उत्तम योगको प्राप्त होता है। शृंखावार्त तीर्थमें स्नान करके सब पापोंसे छूटा हुआ पुरुष धन-धान्यसे सम्पन्न हो निर्मल कुलमें जन्म लेता है। शुद्धोदकतीर्थमें चतुर्दशीको मुक्तिके लिये स्नान करनेवाला मनुष्य सुरेश्वर शिवका दर्शन करके मोक्ष प्राप्त कर लेता है। अवन्तीमें पत्तनेश्वर नामसे प्रसिद्ध भगवान् महेश्वर दर्शनीय हैं। जो मनुष्य गन्ध, पुष्प, धूप और दीप आदि मनोरम उपचारोंसे भाव-भक्तिके साथ उनकी विधिवत् पूजा करता है, उसके वंशका नाश नहीं होता है और अन्तमें वह शिवलोकको जाता है।

पूर्वकालमें भगवान् सूर्यदेवने शिप्रा नदीके तटपर दुर्धर्ष नामसे प्रसिद्ध तीर्थका निर्माण किया है। जो मनुष्य सप्तमी, अष्टमी, रविवार और संक्रान्तिके दिन उसमें स्नान करके पवित्र हो तीन रात वहाँ उपवास करता है और शिप्रा नदीके तटपर स्थित भगवान् शिवका दर्शन एवं भक्ति-भावसे पूजन करता है, वह पिता-माताके वंशका भलीभाँति उद्धार करके भगवान् शिवके समीप जाता है। गोपीन्द्र नामसे प्रसिद्ध जो तीर्थ है, उसमें स्नान करके मनुष्य इन्द्रके तुल्य पराक्रमी होता और स्वर्गलोक प्राप्त करता है। जो उस तीर्थमें मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे पुनः इस भूतलपर जन्म नहीं

९३० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

लेते। गंगातीर्थमें ज्येष्ठ शुक्ला दशमीको स्नान करनेका विशेष फल बताया जाता है। जो मनुष्य गंगातीर्थमें स्नान करके पुष्करण्डकका दर्शन करता है, वह स्वर्गलोकमें सुखी होता है। उत्तरेश्वरतीर्थमें स्नान करके मानव शीघ्र ही अपने पितरोंका नरकसे उद्धार कर देता है और स्वयं भी स्वर्गलोकमें जाता है। भूतेश्वरमें स्नान करके मनुष्य भूतेश्वरजीका गन्ध, पुष्प और नैवेद्य आदिसे पूजन करे। इससे मृत्युके पश्चात् वह स्वर्गलोकको जाता है। जो मनुष्य मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर एकाग्रचित्त हो अम्बालिका देवीका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो गन्ध और पुष्पद्वारा देवेश्वर शिवका अर्चन करता है, उसे शिवलोकमें निवास प्राप्त होता है। जो मनुष्य पवित्र हो भगवान् पुण्येश्वरका दर्शन करता है, वह गणपतिपदको प्राप्त होता है। जो लुम्पेश्वरतीर्थमें स्नान करके भगवान् महेश्वरकी भलीभाँति पूजा करता है, वह नरकमें नहीं जाता, स्वर्गलोकमें पूजित होता है। जो स्थविरविनायक तीर्थमें स्नान करके गन्ध, पुष्प, धूप और भक्ष्य, भोज्य आदि सामग्रियोंसे गणेशजीकी पूजा करता है, वह मृत्युके पश्चात् शिवलोकमें जाता है। जो विद्वान् मानव नवनदीके समीप गन्ध, पुष्प, धूप आदिके द्वारा पार्वतीजीका पूजन करता है, वह अनुपम सौभाग्यका भागी होता है। प्रयागतीर्थमें स्नान करके जो प्रयागेश्वरका दर्शन करता है, वह सब लोकोंको लाँघकर भगवान् शिवके लोकमें प्रतिष्ठित होता है।

पूर्वकालमें भगवान् नर और नारायणने इस पृथ्वीपर श्रीकृष्ण और अर्जुनके रूपमें अवतार लिया था। श्रीकृष्णके अवतारका उद्देश्य कुछ और था और अर्जुन किसी अन्य हेतुसे ही प्रकट हुए थे। श्रीकृष्णने कंस आदि समस्त दानवोंका युद्धमें संहार कर डाला। तदनन्तर कुन्तीपुत्र अर्जुन इन्द्रसे अस्त्रविद्याकी प्राप्तिके लिये स्वर्गलोकमें गये। वहाँ अस्त्रविद्या प्राप्त कर लेनेपर वीरवर अर्जुनने देवराज इन्द्रसे गुरुदक्षिणा माँगनेके लिये कहा। तब देवराज इन्द्रने कहा—‘अर्जुन! हिरण्यपुरमें निवास करनेवाले जो निवातकवच नामक उग्र दानव हैं, उनका शीघ्र वध करो, यही मेरे लिये गुरुदक्षिणा होगी।’ तब अर्जुनने उन दुष्ट दानवोंके वधकी प्रतिज्ञा की और एक भयंकर रथपर आरूढ़ हो धनुष-बाण लेकर युद्धके लिये प्रस्थान किया। उन समस्त दानवोंका संहार करके पार्थने अत्यन्त दुष्कर पराक्रम दिखाया और सम्पूर्ण देवताओंको प्रसन्न किया। उस समय कृतकार्य हुए अर्जुनसे इन्द्रने कहा—‘वीर! तुम कोई उत्तम वर माँगो।’ तब अर्जुनने उन दो प्रतिमाओंको माँगा, जिनकी पूजा साक्षात् ब्रह्माजीने की थी।

यह सुनकर इन्द्र बोले—अर्जुन! इन दोनों प्रतिमाओंका महात्मा शंकरने लाल कमलके फूलोंद्वारा ब्रह्माके एक दिनतक पूजन किया है। इसी प्रकार पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने तीनों लोकोंका पालन करनेके लिये सुगन्धित नीलकमलके फूलोंसे सहस्रों वर्षोंतक इनकी पूजा की है। प्रजापति ब्रह्माजीने भी सृष्टि-रचनाकी कामना लेकर एकाग्रचित्त हो लाल कमलके फूलोंसे इन युगल प्रतिमाओंका पूजन किया है। कुन्तीनन्दन! तुम इन्हें मृत्युलोकमें कैसे ले जाओगे। इन प्रतिमाओंके बिना तो यह स्वर्गलोक तिनकेके तुल्य हो जायगा।

अर्जुनने कहा—प्रभो! मैं तो इसी वरदानका अभिलाषी हूँ, मुझे दूसरी कोई वस्तु नहीं चाहिये।

तब इन्द्रने कहा—वीर! तुम इन प्रतिमाओंको लेकर कुशस्थली (उज्जयिनी पुरी)-में स्थापित करो। शिप्राके उत्तर तटपर भगवान् केशव समस्त पापोंका नाश करनेवाले केशवार्की स्थापना करेंगे। सदा आषाढ़ और कार्तिकमासमें वहाँकी यात्रा होगी, मैं भी उस समय दर्शन करनेके लिये आऊँगा। मेरे साथ पवन, मेघ और बिजलियाँ भी होंगी। इन्हीं लक्षणोंसे मनुष्य कहेंगे कि ‘देवराज इन्द्र आ गये।’ मैं ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा पूजित भगवान् सूर्यको नमस्कार करके पुनः लौट आऊँगा।

ऐसा कहकर इन्द्रने अर्जुनको वे दोनों प्रतिमाएँ

  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९३१

दे दीं और उन्हें अपने पुत्रके साथ मर्त्यलोकको भेज दिया। देवर्षि नारदजी भगवान् श्रीकृष्णको बुलानेके लिये द्वारकामें गये और वहाँ इन्द्रका रहस्ययुक्त वचन सुनाकर कहा—'श्रीकृष्ण! आप कुशस्थलीको चलिये और विश्वकर्माद्वारा बनायी हुई पारिजात-निर्मित युगल प्रतिमाओंका पूजन कीजिये। इन्द्रने वे दोनों प्रतिमाएँ आप तथा अर्जुनके लिये भेंट की हैं।'

नारदजीका यह वचन सुनकर श्रीकृष्ण उज्जयिनी पुरीको गये और वहाँ पाण्डुनन्दन अर्जुनको हृदयसे लगाकर वे बहुत प्रसन्न हुए। तत्पश्चात् उन्होंने अर्जुनसे कहा—'पार्थ! आज मुझे अनुपम प्रसन्नता प्राप्त हुई है, तुम पूर्व दिशाकी ओर जाकर एक प्रतिमाकी स्थापना करो। दिनके पूर्वाह्नकालमें ही अति मनोरम शुभलग्नका उदय होगा। तब मैं भी प्रतिमा-स्थापनके लिये नदीके उत्तर तटको जाऊँगा। जब मेरा शंख बजे, उसी समय तुम सूर्यदेवकी स्थापना करो।'

यह आदेश पाकर अर्जुनने पूर्वदिशाकी ओर जा प्रतिमा-स्थापनाके योग्य शुभ स्थानका निरीक्षण किया। वे मन-ही-मन यह विचार करने लगे कि 'इस देवप्रतिमाका स्थापन कहाँ करूँ।' इतनेमें ही उस प्रतिमाने स्वयं ही कारणसहित उत्तम स्थान बता दिया और अपने तेजसे वह स्थान पार्थको दिखला भी दिया।

अर्जुन बोले—देव! यहाँ अनेक स्थान हैं, बताइये, कौन आपको अधिक पसंद है। गोपते! आप प्रजाजनोंके लिये सौम्य रूप और उत्तम दर्शनीय हो जाइये।

तब सूर्यदेवने अर्जुनसे कहा—पार्थ! तुम मेरे दर्शनसे भय न करो। ऐसा कहकर दाहिने हाथसे अभय प्रदान करते हुए उन्होंने आश्वासन दिया और सौम्य रूप धारण कर लिया। भगवान् प्रभाकरने उस समय अर्जुनको अपने तेजोमय स्वरूपका दर्शन कराया और कहा—'यही मेरा अविचल स्थान है।' इतनेमें ही लग्न आ गया और भगवान् श्रीकृष्णने अपने महान् शंखको बजाया। वह शंखनाद सुनकर नरावतार अर्जुनने देववन्दित सूर्यविग्रहको स्थापित कर दिया और इस प्रकार स्तवन किया।

अर्जुन बोले—किरणोंकी मालासे मण्डित, अत्यन्त प्रकाशमान एवं सात घोड़ोंके रथपर चलनेवाले उन भगवान् सूर्यकी जय हो, जिनका तेज समस्त भुवनोंमें व्याप्त है, जो पूर्व दिशाके अट्टहासकी-सी छवि धारण करते हैं तथा जिनके नामोंका कीर्तन करनेमात्रसे प्रचुर पाप-तापमय दोषोंसे ग्रस्त हुए मनुष्योंके अंग निष्पाप हो जाते हैं। उत्तम बुद्धिवाले प्रभो! ब्रह्मा आदि देवता और मुनि जिनकी स्तुति करते हैं, उन्हीं भगवान् पतंग (सूर्य)-की मैं अपनी बुद्धिद्वारा भलीभाँति विचार करके स्पष्ट अर्थ एवं मधुर अक्षरोंके योगसे युक्त विचित्र पद्योंद्वारा स्तुति करूँगा। नाथ! लाल कमलके समान निर्मल मण्डलवाले आप जबतक अपनी किरणोंसे अन्धकारका नाश करते हुए उदय नहीं होते, तबतक सम्पूर्ण जगत् निश्चल-सा ही (जड़वत्) प्रतीत होता है तथा तबतक नाना प्रकारकी क्रियाएँ भी सिद्ध नहीं होतीं। भगवन्! जबतक आप अपनी परम उत्तम प्रभासे वृक्षोंके सोये हुए पुष्प-गुच्छोंको विकसित (जाग्रत्) नहीं कर देते, तबतक उनके नेत्र बंद होनेके कारण वृक्षोंकी शाखाएँ शोभा नहीं पातीं और न उनपर भ्रमर ही मड़राते हैं। जिस समय आप आकाशमें उदित होते हैं, उस समय समस्त देवताओं और सिद्धोंके समुदाय, ब्रह्मा आदि देवेश्वर, दैत्य, मुनि, किन्नर, नाग, यक्ष तथा ज्ञानी देवगण अपने झुके हुए मस्तकोंद्वारा तथा चमकती हुई मुकुटमणियोंकी उत्तम प्रभाओंसे आपकी अर्चना करते हैं। सदा सबको वर देनेवाले भगवन्! आपके अस्त होनेपर सम्पूर्ण जगत् सो जाता है और आपके तपनेपर पुनः जाग्रत् हो उठता है, इस प्रकार एकमात्र आप ही समस्त विश्वका हित करनेके लिये अन्धकारका नाश करनेवाले हैं। नाथ! उत्साह, शक्ति, नीति और शौर्य आदिसे सम्पन्न तथा सेवा-प्रयोग एवं निर्माणक्रियामें तत्पर पुरुषोंके

९३२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

भी कार्य जो फलद नहीं होते, उसमें निश्चय ही आपके प्रति उनकी भक्तिका न होना ही कारण है। शरणागतवत्सल! युद्धभूमिमें मनुष्य रथ, हाथी, भाला, शक्ति, नाराच, चक्र, बाण, तोमर तथा भयंकर खड्गोंद्वारा जो शीघ्र ही शत्रुओंको परास्त करके विजयी होकर लौटते हैं, वह सब आपकी ही दी हुई शक्तिका प्रभाव है। भयानक स्थानों, दुर्गम और ऊँची-नीची भूमियोंमें तथा रीछ, हाथी, सिंह, बहुत-से कण्टक तथा चोरोंके बीचमें पड़े हुए संकटग्रस्त एवं अतिशय शोकसे मोहित चित्तवाले मानव भी आपके नामोंका कीर्तन करनेमात्रसे मृत्युके भयसे छूट जाते हैं। तेजोराशे! सूर्य! इस संसारमें जो सब ओरसे दुःखी हैं, उन्हें आप ही शरण देनेवाले हैं। सम्पूर्ण जगत्में आपके समान दयालु दूसरा कोई नहीं है। एकमात्र आपमें ही की हुई भक्ति पूर्णतः सफल होती है। आपकी शरणमें आ जानेपर मनुष्योंको रोग, व्याधिका कष्ट कैसे हो सकता है? देव! आप देखा करते हैं कि कौन कुष्ठरोगसे पीड़ित है, किसे शत्रु और रोग आदि सता रहे हैं, कौन पंगु, अन्ध और जड़ है, किनके पैर गल गये हैं और कौन निर्धन तथा निष्क्रिय हो गया है। इस प्रकार निरीक्षण करके आप कृपापूर्वक प्राणियोंकी उन-उन दोषोंसे रक्षा करते हैं। आपकी जैसी परोपकारपूर्ण चेष्टा देखी जाती है, वैसी और किसमें है? धर्म सेवित होनेपर परलोकमें फल देनेके लिये उपस्थित होता है। देवता उपासना करनेपर कालान्तरमें वरदान देते हैं। परंतु प्रणतवत्सल! आप कल्याणकामी पुरुषोंद्वारा सेवित होनेपर तत्काल ही उन्हें अभीष्ट फल प्रदान करते हैं। यदि मनुष्योंने एक बार भी किसी प्रकार आपको मस्तक झुकाया है अथवा भुवनेश्वर! अन्तकालमें भी जिसने आपका चिन्तन किया है, वे संसारमें पापी होनेपर भी निष्पाप हो गये हैं और उन्होंने शुद्धचित्त होकर पुण्यात्माओंकी गति प्राप्त कर ली है। सुरश्रेष्ठ! जब आप उदय लेने लगते हैं, उस समय देवनदी गंगाके खिले हुए स्वर्णकमलोंसे निकले हुए झुंड-के-झुंड भ्रमर उनकी स्वर्णमयी धूलिसे अनुरंजित होकर उड़ते हैं। भगवन्! आप अपने किरणसमूहरूपी चरणोंके द्वारा समुद्रके मध्यमें स्थित होकर समस्त जीवोंके जीवनकी रक्षाके उद्देश्यसे तात्त्विक उपायका चिन्तन करनेके लिये मानो तपस्या करते हैं। तीनों लोकोंमें आपके समान दूसरा कौन है? सदा वेदके मार्गमें तत्पर रहनेवाले उदारबुद्धि ऋषि-मुनियोंद्वारा भी आपके गुणोंकी स्तुति नहीं की जा सकती। आप ही विष्णु हैं, आप ही चन्द्रमा हैं, आप ही दैत्योंका मान मर्दन करनेवाले स्वामिकार्तिकेय हैं। आप ही धनाध्यक्ष कुबेर हैं, आप ही काल हैं। आप ही ब्रह्मा हैं और आप ही पर्वत, मिट्टी, जलके आश्रय तथा अग्नि हैं। आप ही ब्राह्मणोंके जपनेयोग्य ॐकार हैं। आप ही वहाँ समुद्र हैं। आप ही यम, रुद्र, इन्द्र और मेघ हैं। आप ही व्रत, यम तथा नियम हैं और आप ही यह सम्पूर्ण जगत् हैं। त्रिपुरमथन! गोपते! सुराधीश! भगवन्! आपका मुख कमलके समान सुन्दर है। आप सम्पूर्ण देवताओंके गुरु हैं, तीनों लोकोंमें आपके समान गुणवान् कौन है? आदित्य! भास्कर! दिवाकर! सप्ताश्ववाहन! मार्तण्ड! सूर्य! हरिदश्व! पतंग! भानो! अश्रान्तवाहन! आकाशस्वरूप! अंशुमालिन्! लोकनाथ! यह दास आपकी शरणमें आया है। जगत्प्रदीप! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। ब्रह्मण्य! सत्य! शुभ! मंगल! लोकनाथ! आकाशकमल! ईश! मुनिसंस्तुत! विश्वमूर्ते! आर्तजनोंका शोक नाश करनेवाले! सेवकोंका पालन करनेवाले! भगवन्! आप अपनी शरणमें आये हुए मुझपर प्रसन्न होइये। देव! आज मैंने मस्तकपर अंजलि बाँधे हुए दोनों हाथोंसे नमस्कारपूर्वक बड़े भक्ति-भावसे आपका स्तवन किया है, इसलिये प्रभो! आप मेरे ऊपर सौम्य रूप हो जाइये और मेरी बुद्धिको धर्ममें लगाइये। जो सम्पूर्ण जगत्के एकमात्र नेत्र हैं, वेदत्रयीमय हैं अथवा त्रिभुवनस्वरूप हैं, त्रिगुणात्मक शरीर धारण करनेवाले हैं और समस्त विश्वकी उत्पत्ति, पालन तथा संहारके