संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
९०४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
सम्पूर्ण जगत् आनन्दमग्न हो रहा था। गन्धर्व गाते थे, अप्सराएँ नृत्य करती थीं, चारण स्तुति करते थे और देवता हर्ष मना रहे थे। सुगन्धित वायु चल रही थी और बादल फूलोंकी वर्षा करते थे। सब लोग मांगलिक वेष-भूषासे विभूषित थे, सभी मांगलिक वचन बोलते थे, स्थावर और जंगम सभी प्रकारके जीव आनन्दमें मग्न थे।
तदनन्तर ब्रह्माजीने महर्षियोंके साथ आकर पार्वतीके साथ शुभ सिंहासनपर बैठे हुए तथा कुमारवृन्दसे घिरे हुए देवाधिदेव महादेवजीका अभिषेक किया। देवताओं और बड़े-बड़े नागराजोंने असंख्य रत्नों, नाना प्रकारके दुकूलों तथा विचित्र-विचित्र सुगन्धित पुष्पहारोंसे महेश्वरका पूजन किया। मातृगणोंने आरती उतारी। तत्पश्चात् अखिल देववृन्दके द्वारा वन्दनीय भगवान् शिवने सबसे पहले मुनीश्वरोंको चिरवांछित मनोरथ देकर सन्तुष्ट किया। फिर ब्रह्माजीसे बातचीत करके भगवान् विष्णुसे कहा—‘देव! तुम यहाँ आकर बैठो, मेरी समस्त प्रभुताके एकमात्र हेतु तुम्हीं हो। तुम दूर रहकर भी मेरे निकट हो, तुमसे बढ़कर मेरा कार्य करनेवाला कोई नहीं है। तुम्हींने अपने सदुपदेशोंसे राजाओंमें श्रेष्ठ दिवोदासको ऐसी शिक्षा दी, जिससे वे परम सिद्धिको प्राप्त हुए और मेरा भी मनोवांछित कार्य सिद्ध हो गया। आज मुझको जो यह आनन्दवन प्राप्त हुआ है, इसमें तुम और गणेश ये ही दो कारण हैं। जहाँ मरे हुए जन्तुओंका फिर जन्म नहीं होता, वह ब्रह्मरसायनकी खान काशीपुरी मेरे लिये जैसी उत्तम सुखकी भूमि है, वैसी प्रिय तीनों लोकोंमें कोई भी वस्तु नहीं है।’
विष्णुजी बोले—पिनाकपाणे! मैं आपके चरणारविन्दोंसे दूर न होऊँ।
मधुसूदनका यह वचन सुनकर महादेवजी बहुत प्रसन्न और सन्तुष्ट होकर बोले—मुरारे! मोक्षलक्ष्मीके आश्रयभूत इस स्थानपर तुम सदा मेरे समीप रहो। भक्तियुक्त होकर भी जो पहले तुम्हारी आराधना किये बिना मेरी सेवा-पूजा करेगा, उसकी मनोवांछा कदापि सिद्ध न होगी। अच्युत! इस मुक्तिमण्डपमें रहकर जो मुझे सब ओरसे सुख प्राप्त होता है, वह अत्यन्त निर्मल कैलास पर्वतपर भी नहीं मिलता और निश्चल शोभावाले भक्त-हृदयमें भी वैसे सुखकी प्राप्ति नहीं होती। जिनकी चित्तवृत्तियाँ स्थिर हैं, जो मेरे अनन्य भक्त तथा दृढ़ हृदयवाले हैं, वे यदि इस दक्षिण मण्डपमें पलभर भी स्थित होते हैं तो उन्हें पुनः गर्भावस्थामें नहीं आना पड़ता।
वहाँ पूर्वाभिमुख बैठे हुए महेश्वरके दक्षिण भागमें ब्रह्माजी और वामपार्श्वमें विष्णु स्थित हुए। देवराज इन्द्र उन्हें चवँर डुलाते थे, ऋषि उनको सब ओरसे घेरकर खड़े थे, पार्षदगण भगवान्के पृष्ठ भागमें चुपचाप आदरपूर्वक खड़े हुए थे और बहुत सम्मानवाले तथा हाथोंमें आयुध उठाये रहनेवाले अनेक सेवक उनकी सेवामें उपस्थित थे। उस समय महादेवजीने अपना दाहिना हाथ उठाकर भगवान् ब्रह्मा और विष्णुको एक शिवलिंग दिखलाया और कहा—‘सब लोग देखो, यही परम ज्योति है, यही परात्पर ब्रह्म है और यही अत्यन्त सिद्धिदायक मेरा स्थावर रूप है। यहाँ जो ये मेरे भक्त रहते हैं, ये सिद्ध हैं, आबाल ब्रह्मचारी हैं, जितेन्द्रिय, तपस्वी, पंचाक्षर मन्त्रके ज्ञानसे निर्मल, भस्मसमूहपर शयन करनेवाले, इन्द्रियसंयमी, सुशील, ऊर्ध्वरेता, लिंगार्चनपरायण, मन और इन्द्रियोंको मेरे सिवा अन्यत्र न ले जानेवाले, जल और भस्मद्वारा स्नान करके अत्यन्त पवित्र, कन्द, मूल और फल भोजन करनेवाले, परम-तत्त्व सदाशिवकी ओर सदैव दृष्टि रखनेवाले, क्रोधको जीतनेवाले, मोहरहित, परिग्रहशून्य, निष्काम, निष्प्रपंच, निर्भय, नीरोग, धन-ऐश्वर्यसे रहित, निःसंग, निर्मल अन्तःकरणवाले, भयंकर संसारसागरके पार पहुँचे हुए, निर्विकल्प, निष्पाप, निर्द्वन्द्व, सिद्धान्तभूत अर्थको ग्रहण करनेवाले, अहंकारकी वृत्तियोंसे रहित, सदा ही मेरे परम प्रिय, मेरे पुत्रतुल्य तथा मेरे ही स्वरूप हैं। मेरी सेवामें संलग्न रहनेवाले मनुष्योंको चाहिये कि वे मेरे इन भक्तोंको सदा ही मेरा स्वरूप समझकर
- काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ९०५
इनका पूजन और नमस्कार करें। इनका पूजन करनेपर मैं बहुत प्रसन्न होऊँगा। मैं कभी किसीको प्रत्यक्ष दर्शन देता हूँ और कभी अदृश्य होता हूँ। देवताओ! सर्वदा सब भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये मैं इस आनन्दवनमें सदा स्वेच्छासे निवास करता हूँ और भक्तोंको मनोवांछित फल देनेवाला मैं यहाँ लिंगरूपसे सदैव निवास करता रहूँगा। इस तीर्थमें स्वयम्भू और अस्वयम्भू जितने भी लिंग हैं, वे सब सदा इस लिंगका दर्शन करनेके लिये आते हैं, इसमें सन्देह नहीं कि मैं सम्पूर्ण लिंगोंमें समान रूपसे स्थित हूँ तथापि यह तो लिंगस्वरूपा मेरी परा मूर्ति है। जिसने श्रद्धा और शुद्धदृष्टिसे मेरे इस लिंगका दर्शन किया है, उसने मानो मेरा प्रत्यक्ष दर्शन कर लिया है। ऋषियोंके साथ सम्पूर्ण देवता सुन लें—इस श्रेष्ठ लिंगका नाम श्रवण करनेसे भी जन्मभरका पातक क्षणभरमें नष्ट हो जाता है और इसके स्मरणसे दो जन्मोंका पाप दूर होता है। इस उत्तम लिंगके दर्शनके उद्देश्यसे अपने घरसे निकलते समय ही तीन जन्मोंका संचित किया हुआ महापाप भी लीन हो जाता है। देवताओ! मुझ विश्वेश्वरके इस स्वयम्भू लिंगका स्पर्श करनेमात्रसे सहस्रों राजसूय-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। इस लिंगराजकी भक्तिपूर्वक पूजामात्र करनेसे सहस्रों सुवर्णकमलोंद्वारा पूजन करनेका फल प्राप्त होता है। जो पंचामृत आदिके साथ इस शिवलिंगकी महापूजा करता है, उसे चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्ति होती है। देवताओ! वस्त्रसे छाने हुए जलके द्वारा इस लिंगको स्नान कराकर श्रेष्ठ पुरुष एक लाख अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। जो इस विश्वेश्वर लिंगका दर्शन करके अन्यत्र भी मृत्युको प्राप्त होता है, उसकी भी जन्मान्तरमें मुक्ति हो जाती है। जिसकी जिह्वाके अग्रभागमें 'विश्वनाथ' यह नाम विराज रहा है, कानोंमें विश्वनाथकी कथा सुनायी पड़ती है और चित्तमें भगवान् विश्वनाथका चिन्तन हो रहा है, उसका इस संसारमें जन्म कैसे हो सकता है। जो मुझ विश्वनाथके लिंगमय विग्रहका दर्शन करके मन-ही-मन प्रसन्न होता है, वह अपने महान् पुण्यके बलसे मेरे गणोंमें गिना जाता है। जो प्रतिदिन तीनों सन्ध्याओंके समय 'विश्वनाथ, विश्वनाथ, विश्वनाथ' का जप करता है, उस पुण्यात्माका नाम मैं भी निश्चय ही जपता रहता हूँ। देवताओ! यह महालिंग मेरे द्वारा भी सदैव पूजन करने योग्य है। इसलिये देवताओं, ऋषियों तथा मनुष्योंको तो सर्वथा प्रयत्न करके इसकी पूजा करनी चाहिये। जिन्होंने इस लिंगको प्रणाम किया है, वे देवताओं और दैत्योंसे भी वन्दित होते हैं। 'मैं अपनी भुजा उठाकर बारंबार इस बातको दोहराता हूँ कि इस त्रिगुणमय जगत्में तीन ही सार वस्तु हैं—विश्वनाथ लिंग, मणिकर्णिकाका जल और काशीपुरी।'
तदनन्तर महादेवजीने पार्वतीजीके साथ उठकर उस शुभ लिंगका स्वयं सुन्दर पूजन किया और फिर उसीमें लीन हो गये। तब उन देवताओंने जय-जयकारपूर्वक महेश्वरका स्तवन किया। अगस्त्य! इस प्रकार इस अविमुक्त क्षेत्रके प्रभावका एक अंशमात्र बताया गया, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। तुम थोड़े ही समयमें पुनः उत्तम काशीपुरीको प्राप्त होओगे। देखो, ये भगवान् सूर्य अस्ताचलके शिखरपर जा चुके हैं। इसलिये अब तुम्हारे और मेरे लिये भी मौन धारण करनेका समय आया है।
व्यासजी कहते हैं—सूत! इस प्रकार काशीकी महिमा सुनकर लोपामुद्रासहित मुनिवर अगस्त्य पार्वतीजीके पुत्र स्कन्दको बार-बार प्रणाम करके सन्ध्योपासनाके लिये चले गये। चन्द्रशेखर भगवान् शिवके क्षेत्र काशीधामका रहस्य जानकर अगस्त्यजी स्थिरचित्त हो शिवके ध्यानमें तत्पर हो गये। सूत! इस आनन्दवनकी बड़ी भारी महिमा है। कौन ऐसा मनुष्य है, जो सैकड़ों वर्षोंमें भी इसकी महिमाका वर्णन कर सकता है? परमात्मा शिवने पार्वतीजीसे काशीका जैसा माहात्म्य कहा था, वैसा ही स्कन्दने भी महर्षि अगस्त्यको सुनाया था। फिर उसी प्रसंगको मैंने तुम्हारे और शुकदेव आदिके आगे भलीभाँति कहा है।
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९०६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
पंचतीर्थी, चतुर्दश आयतन, अष्ट आयतन, शैलेशादि और एकादश आयतनोंकी यात्रा, गौरीयात्रा, गणेशयात्रा, अन्तर्गृहयात्रा तथा विश्वनाथयात्राका वर्णन
सूतजी बोले—सत्यवतीनन्दन ! सिद्धिकी इच्छा रखनेवाले मनुष्योंके हितके लिये आप काशी-यात्राके क्रमका वर्णन कीजिये।
व्यासजीने कहा—महाप्राज्ञ सूत ! ध्यान देकर सुनो। यात्रियोंको सबसे पहले (१) चक्रपुष्करिणी (मणिकर्णिका)-के जलमें वस्त्रसहित स्नान करना चाहिये। फिर देवताओं, ऋषियों, पितरों तथा ब्राह्मणों एवं याचकोंको तृप्त करके (२) आदित्य, द्रौपदी, विष्णु, दण्डपाणि और महेश्वरको नमस्कार करे। तत्पश्चात् (३) ढुण्ढिराज गणेशका दर्शन करनेके लिये जाय। (४) उसके बाद ज्ञानवापीमें आचमन करके नन्दिकेश्वरका पूजन करे, साथ ही तारकेश्वरकी पूजा करके महाकालेश्वरका भी पूजन करे। (५) तदनन्तर पुनः दण्डपाणिका दर्शन, पूजन करे। यह पंचतीर्थी यात्रा कहलाती है। महान् फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको प्रतिदिन यह यात्रा करनी चाहिये। इसके बाद विश्वनाथकी यात्रा करे, जो समस्त प्रयोजनोंकी सिद्धि करनेवाली है। कृष्णपक्षकी प्रतिपदासे लेकर चतुर्दशीपर्यन्त विधिपूर्वक चौदह आयतनोंकी भी प्रयत्नपूर्वक यात्रा करनी चाहिये। अथवा क्षेत्रसिद्धिकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको प्रत्येक चतुर्दशीमें यात्रा करनी चाहिये। भिन्न-भिन्न तीर्थोंमें स्नान और वहाँके शिवलिंगोंकी पूजा करके मौनपूर्वक यात्रा करनेवाला यात्री मनोवांछित फलको पाता है। पहले मत्स्योदरीमें स्नान और तर्पण आदि करके ॐकारेश्वरका दर्शन करे। तत्पश्चात् क्रमशः त्रिविष्टप, महादेव, कृत्तिवासा, रत्नेश्वर, चन्द्रेश्वर, केदार, धर्मेश्वर, वीरेश्वर, कामेश्वर, विश्वकर्मेश्वर, मणिकर्णीश्वर और अविमुक्तेश्वरका दर्शन करके अन्तमें विश्वनाथजीका दर्शन-पूजन करना चाहिये। काशीक्षेत्रमें निवास करनेवाले पुरुषको यह यात्रा प्रयत्नपूर्वक करनी चाहिये। जो काशी-क्षेत्रमें रहकर इस यात्राको नहीं करता, उसे उस क्षेत्रसे मनको उचाट देनेवाले विघ्न प्राप्त होते हैं। इन विघ्नोंकी शान्तिके लिये अन्य आठ स्थानोंकी यात्रा करनी चाहिये। जिनके नाम इस प्रकार हैं—दक्षेश्वर, पार्वतीश्वर, पशुपतीश्वर, गंगेश्वर, नर्मदेश्वर, गभस्तीश्वर, सतीश्वर और आठवें तारकेश्वर। प्रत्येक अष्टमीको विशेषरूपसे इन लिंगोंका दर्शन करना चाहिये। यह दर्शन बड़े-बड़े पापोंकी शान्ति करनेवाला होता है। एक दूसरी भी शुभ यात्रा है, जो सदा योग और क्षेमकी सिद्धि करनेवाली है। वह सम्पूर्ण विघ्नोंका निवारण करनेवाली भी है। काशीक्षेत्रके निवासियोंको वह यात्रा अवश्य करनी चाहिये। प्रथम वरणामें स्नान करके शैलेश्वरका दर्शन करे, फिर संगममें स्नान करके संगमेश्वरका दर्शन-पूजन करे। तत्पश्चात् स्वलीनतीर्थमें भलीभाँति स्नान करके स्वलीनेश्वरका दर्शन करे। उसके बाद मन्दाकिनी-तीर्थमें स्नान करके मध्यमेश्वरका दर्शन करे। हिरण्यगर्भ-तीर्थमें स्नान-तर्पणादि जलक्रिया करके हिरण्यगर्भेश्वरका दर्शन करे। तदनन्तर मणिकर्णिकामें स्नान करके ईशानेश्वरका, कूपमें स्पर्श एवं आचमन करके गोप्रेक्षेश्वरका, कापिलेय-कुण्डमें स्नान करके वृषभध्वजका, उपशान्तकूपमें जलक्रिया करके उपशान्त्येश्वरका तथा पंचचूडाकुण्डमें स्नान करके ज्येष्ठ स्थानका दर्शन एवं पूजन करे। फिर चतुःसमुद्रमें स्नान करके महादेवका पूजन करे, महादेवके आगे जो बावड़ी है, उसमें स्नान करके फिर शुक्रेश्वरका दर्शन करना चाहिये और वहीं कूपमें स्नान और तर्पण आदि कार्य भी पूरा करना चाहिये। तदनन्तर दण्डखात-तीर्थमें स्नान करके व्याघ्रेश्वरका पूजन करे। फिर शौनकेश्वर कुण्डमें स्नान करके जम्बुकेश्वर
- काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ९०७
महालिङ्गकी आराधना करे। इस यात्राको पूर्ण करके मनुष्य संसाररूपी दुःखसागरमें फिर कभी जन्म नहीं लेता। यह यात्रा कृष्णाप्रतिपदासे आरम्भ करके चतुर्दशीतक क्रमसे करनी चाहिये। इसे कर लेनेपर पुनः संसारमें जन्म नहीं होता।
इसके सिवा ग्यारह मन्दिरोंकी एक यात्रा और है, जो करने ही योग्य है। आग्नीध्रकुण्डमें भलीभाँति स्नान करके आग्नीध्रेश्वरका दर्शन करे। उसके बाद उर्वशीश्वरतीर्थमें जाय। फिर वहाँसे नकुलीश्वरका दर्शन करके आषाढीश्वरका दर्शन करे। तत्पश्चात् भारभूतेश्वर, लांगलीश्वर तथा त्रिपुरान्तकका दर्शन करके मनःप्रकामेश्वर और प्रीतिकेश्वर-तीर्थमें जाय। वहाँसे क्रमशः मदालसेश्वर तथा तिलपर्णेश्वरकी यात्रा करे। इस प्रकार इन ग्यारह लिंगोंकी प्रयत्नपूर्वक यात्रा करनी चाहिये। इस यात्राको करनेवाला पुरुष रुद्रत्वको प्राप्त होता है।
इसके बाद मैं परम उत्तम गौरीयात्राका वर्णन करता हूँ। शुक्लपक्षकी तृतीयाको की हुई यह यात्रा सब ओरसे समृद्धि देनेवाली होती है। गोप्रेक्षतीर्थमें स्नान करके मुखनिर्मालिका गौरीके समीप जाय। फिर ज्येष्ठवापीमें स्नान करके मनुष्य ज्येष्ठा गौरीकी आराधना करे। तत्पश्चात् ज्ञानवापीमें स्नान और तर्पण आदि करके सौभाग्यगौरीकी पूजा करे, फिर वहीं जलसम्बन्धी कार्य करके शृंगारगौरीकी अर्चना करे। उसके बाद विशालगंगामें स्नान करके विशालाक्षीदेवीका दर्शन करनेके लिये जाय। तदनन्तर ललितातीर्थमें भलीभाँति स्नान करके ललितादेवीकी पूजा करे। तत्पश्चात् भवानीतीर्थमें स्नान करके भवानीका पूजन करे। फिर विन्दु-तीर्थमें स्नान आदि करके मंगलागौरीकी पूजा करनी चाहिये। वहाँसे स्थिर लक्ष्मीकी वृद्धिके लिये महालक्ष्मीके समीप जाय। इस मुक्तिदायक क्षेत्रमें यह गौरीयात्रा करके मनुष्य इहलोक या परलोकमें कहीं भी दुःखोंसे पीड़ित नहीं होता।
काशीमें प्रत्येक चतुर्थीको विघ्नराज गणेशके समीप यात्रा करे और गणेशजीकी प्रीतिके उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको मोदक दान करे। मंगलवारको कालभैरवके दर्शनकी यात्रा करे। यह यात्रा सब पातकोंका नाश करनेवाली है। रविवारको अथवा रविवारयुक्त षष्ठी एवं सप्तमीको सूर्यदेवके दर्शनकी यात्रा करनी चाहिये। यह यात्रा सब विघ्नोंकी शान्ति करनेवाली है। नवमी अथवा अष्टमी तिथिको चण्डी देवीकी यात्रा शुभ मानी गयी है।
काशीके अन्तर्गृहकी यात्रा प्रतिदिन करनी चाहिये। पहले प्रातःकाल स्नान करके पाँचों विनायकोंको नमस्कार करे। फिर विश्वनाथजीको नमस्कार करके मुक्तिमण्डपमें स्थित हो 'मैं अपनी पापराशिके निवारणके लिये अन्तर्गृहकी यात्रा करूँगा'—इस प्रकार नियम लेकर पहले मणिकर्णिका तीर्थमें जाय। वहाँ स्नान करके मौनभावसे आकर मणिकर्णिकेश्वरकी पूजा करे। फिर कम्बल और अश्वतरको नमस्कार करके वासुकीश्वरको प्रणाम करे। तत्पश्चात् पर्वतेश्वरका दर्शन करके गंगाकेशवका दर्शन करे। फिर ललितादेवीका दर्शन करके जरासन्ध्येश्वरको नमस्कार करे। वहाँसे सोमनाथ और वाराहेश्वरका दर्शन करनेके लिये जाय। तत्पश्चात् क्रमशः ब्रह्मेश्वर, अगस्तीश्वर, कश्यपेश्वर और हरिकेशवको नमस्कार करके वैद्यनाथका दर्शन करे। तत्पश्चात् ध्रुवेश्वरका दर्शन करके गोकर्णेश्वरका पूजन करते हुए हाटकेश्वरके समीप जाय। वहाँसे अस्थिक्षेप तड़ागपर जाकर कीकशेश्वरका दर्शन करे। वहाँसे आगे जाकर क्रमशः भारभूतेश्वर, चित्रगुप्तश्वर, चित्रघण्टादेवी तथा पशुपतीश्वरको नमस्कार करके पितामहेश्वरके समीप जाय। तत्पश्चात् कलशेश्वरका दर्शन करके क्रमशः चन्द्रेश्वर, वीरेश्वर, विघ्नेश्वर, अग्नीश्वर, नागेश्वर, हरिश्चन्द्रेश्वर, चिन्तामणि विनायक और सब विघ्नोंको हरनेवाले सेनाविनायकका दर्शन करे। तदनन्तर वसिष्ठ और वामदेव दोनों मूर्तिमान् महर्षियोंका काशीमें यत्नपूर्वक दर्शन करना चाहिये। ये दोनों बड़े-बड़े विघ्नोंका नाश करनेवाले हैं। तदनन्तर सीमाविनायक, करुणेश्वर, त्रिसन्ध्येश्वर, विशालाक्षी, धर्मेश्वर, विश्वभुजा, आशाविनायक, वृद्धादित्य, चतुर्वक्त्रेश्वर, ब्राह्मीश्वर, मनःप्रकामेश्वर,
९०८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
ईशानेश्वर, चण्डी, चण्डीश्वर, भवानी, शंकर तथा ढुण्ढिराज गणेशका दर्शन एवं उन्हें प्रणाम करे। तदनन्तर राजराजेश्वरकी पूजा करे। उसके बाद लांगलीश्वर, नकुलीश्वर, पटान्नेश्वर, परद्रव्येश्वर, प्रतिग्रहेश्वर, निष्कलंककेश्वर और मार्कण्डेयेश्वरकी पूजा करके, अप्सरसेश्वर तथा गंगेश्वरका पूजन करे। तदनन्तर ज्ञानवापीमें स्नान करना चाहिये। स्नानके पश्चात् नन्दिकेश्वर, तारकेश्वर, महाकालेश्वर, दण्डपाणि, महेश्वर, मोक्षेश्वर, वीरभद्रेश्वर, अविमुक्तेश्वर तथा पाँचों विनायकोंको नमस्कार करके विश्वनाथजीका दर्शन करनेके लिये जाय। उसके बाद मौनव्रतका त्याग करके इस मन्त्रका उच्चारण करे—
अन्तर्गृहस्य यात्रेयं यथावद् या मया कृता।
न्यूनातिरिक्तया शम्भुः प्रीयतामनया विभुः ॥
'मैंने जो यह अन्तर्गृहकी यथावत् यात्रा की है, इसमें न्यूनातिरिक्तताका दोष आ गया हो तो भी इसके द्वारा भगवान् विश्वनाथजी प्रसन्न हों।'
इस मन्त्रका उच्चारण करके क्षणभर मुक्तिमण्डपमें विश्राम करे। तत्पश्चात् निष्पाप एवं पुण्यवान् हुआ मनुष्य अपने घरको जाय। एकादशी तिथि आनेपर महान् पुण्यकी वृद्धिके लिये प्रयत्नपूर्वक काशीके सभी वैष्णव तीर्थोंकी यात्रा करे। भाद्रपदकी पूर्णिमाको कुलस्तम्भका पूजन करना चाहिये। उसकी पूजासे दुःख एवं रुद्रपिशाचताकी प्राप्ति नहीं होती। काशीक्षेत्रमें निवास करनेवाले मनुष्योंको चाहिये कि वे श्रद्धापूर्वक इन सभी यात्राओंको करें। पर्वके दिन भी ये सभी यात्राएँ करनेयोग्य हैं। पुण्यात्मा एवं विद्वान् पुरुष यात्राके बिना कोई भी दिन व्यर्थ न बीतने दे। प्रतिदिन प्रयत्नपूर्वक दो यात्राएँ तो अवश्य करनी चाहिये। पहली गंगाकी, दूसरी विश्वनाथजीकी। काशीमें निवास करते हुए भी जिसका दिन यात्राके बिना व्यर्थ बीत जाता है, उसी दिन उसके पितर निराश हो जाते हैं। जिसने काशीमें रहकर भी जिस दिन विश्वनाथजीका दर्शन नहीं किया, उस दिन उस मनुष्यको मानो कालसर्पने डस लिया, मृत्युने देख लिया अथवा किसीने उसका सर्वस्व लूट लिया। जिसने मणिकर्णिकामें स्नान करके विश्वनाथजीका दर्शन कर लिया, उसने सब तीर्थोंमें नहा लिया और सब यात्राएँ पूरी कर लीं। यह सत्य है, सत्य है, सत्य है और बार-बार सत्य है। प्रतिदिन मणिकर्णिकामें स्नान और विश्वनाथजीका दर्शन अवश्य करना चाहिये।
व्यासजी कहते हैं—सूत! सहस्रों पाप किये होनेपर भी मनुष्य स्कन्दपुराणके इस उत्तम काशी-माहात्म्यका श्रवण करके नरकमें नहीं जाता। सब तीर्थोंमें स्नान करके मनुष्य जिस श्रेयका उपार्जन करता है, वह सब काशीखण्डके श्रवणसे अवश्य प्राप्त होता है। सम्पूर्ण काशीखण्डका श्रद्धापूर्वक पाठ अथवा श्रवण करे—यही सबसे बड़ी देवाराधना बतायी गयी है। जो काशीखण्डकी एक कथा भी सुन लेता है, उसने सम्पूर्ण धर्मशास्त्रोंका श्रवण कर लिया। इसमें संशय नहीं है। यह काशीखण्ड महान् धर्मका उत्पादक, महान् अर्थकी प्राप्ति करानेवाला तथा सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्तिका हेतु बताया गया है। इसके श्रवणसे मनुष्योंके लिये मोक्षकी प्राप्ति दूर नहीं रह जाती। इस उत्तम खण्डको सुनकर सब पितर तृप्त होते हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सब देवता प्रसन्न होते हैं, मुनि आनन्दमग्न होते हैं और सनकादि मुनीश्वर भी अत्यन्त सन्तुष्ट होते हैं। जो विद्वान् इस काशीखण्डको पूरा, आधा, एक चौथाई अथवा एक अष्टमांश भी सुनाता है, वह यत्नपूर्वक प्रणाम करनेयोग्य तथा इष्टदेवकी भाँति पूजनीय है। भगवान् विश्वनाथकी प्रीतिके लिये उसको सदा अन्न, धन आदिका दान करना चाहिये, क्योंकि वाचकके सन्तुष्ट होनेपर निःसन्देह भगवान् विश्वनाथ ही सन्तुष्ट होते हैं। जहाँ परमानन्दके आश्रयभूत इस काशीखण्डका पाठ किया जाता है, वहाँ कोई अमंगलजनक विघ्न अपना प्रभाव नहीं डालता है।
काशीखण्ड (उत्तरार्ध) समाप्त।
ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीउमामहेश्वराभ्यां नमः
संक्षिप्त श्रीस्कन्दमहापुराण
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आवन्त्यखण्ड
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अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य
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सनत्कुमारजीके द्वारा महाकालतीर्थकी श्रेष्ठताका निरूपण
स्रष्टारोऽपि प्रजानां प्रबलभवभयाद्यं नमस्यन्ति देवा यश्चित्ते सम्प्रविष्टोऽप्यवहितमनसां ध्यानयुक्तात्मनां च। लोकानामादिदेवः स जयतु भगवाञ्छ्रीमहाकालनामा विभ्राणः सोमलेखामहिवलययुतं व्यक्तलिङ्गं कपालम्॥
'प्रजाकी सृष्टि करनेवाले प्रजापति देव भी प्रबल संसार-भयसे मुक्त होनेके लिये जिन्हें नमस्कार करते हैं, जो सावधान चित्तवाले ध्यानपरायण महात्माओंके हृदय-मन्दिरमें सुखपूर्वक विराजमान होते हैं और चन्द्रमाकी कला, सर्पोंके कंकण तथा व्यक्त चिह्नवाले कपालको धारण करते हैं, सम्पूर्ण लोकोंके आदिदेव उन भगवान् श्रीमहाकालकी जय हो।'
पार्वतीजी बोलीं—भगवन्! पृथ्वीपर जो-जो पुण्यतीर्थ और पवित्र नदियाँ हैं, जिनमें श्राद्ध किया जाता है, उन सबका यत्नपूर्वक वर्णन कीजिये।
महादेवजीने कहा—देवि! त्रिपथगा गंगा सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात हैं। समस्त जगत्को पवित्र करनेवाली सूर्यपुत्री यमुना भी बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाली हैं। चन्द्रभागा (चनाब), वितस्ता (झेलम), नर्मदा, अमरकण्टक, कुरुक्षेत्र, गया, प्रभास क्षेत्र, नैमिषारण्य, केदार, पुष्कर, कायावरोहण तथा उत्तम महाकालवन अत्यन्त पवित्र तीर्थ हैं। पापोंको जलानेके लिये अग्निके समान श्रीमहाकाल यहाँ विराज रहे हैं, वह चार कोसतक फैला हुआ क्षेत्र ब्रह्महत्या आदि पातकोंका नाश करनेवाला है।
पार्वतीजी बोलीं—महेश्वर! आप इस महाकालक्षेत्रका माहात्म्य कहिये।
महादेवजीने कहा—देवि! महाकालक्षेत्र समस्त पातकोंका नाश करनेवाला आदिक्षेत्र है। श्रीमेरु पर्वतके समीप जो परमात्मा ब्रह्माजीका वैराज नामक भवन है, वहाँ कान्तिमती नामवाली सभा देवताओंको हर्ष प्रदान करनेवाली है। एक समय ब्रह्माजीके मानसपुत्र वागीश्वर सनत्कुमारजी उस सभामें बैठकर भगवान् शंकरकी आराधनामें लगे हुए थे। उसी समय पराशरनन्दन श्रीकृष्णद्वैपायन (व्यास) उन्हें प्रणाम करके उनसे महाकालका माहात्म्य पूछते हुए बोले—'भगवन्! महाकालवन सबसे श्रेष्ठ क्यों कहा जाता है और उसे गुह्यवन, पीठस्थान तथा ऊसर भूमि क्यों कहा गया है?'
सनत्कुमारजी बोले—यहाँ सब पातक क्षीण हो जाता है, इसलिये इसे क्षेत्र कहा जाता है। यह मातृकाओंका निवासस्थान होनेके कारण पीठ कहलाता है। इस भूमिमें मरे हुए जीव फिर जन्म नहीं लेते, इसीलिये इसे ऊसर नाम दिया गया है। अतः यह परमात्मा शंकरका गुह्य, प्रिय एवं नित्य क्षेत्र है और इसीलिये सम्पूर्ण भूतोंको बहुत प्रिय है। भगवान् शिवके इस अतिशय प्रिय क्षेत्रको श्मशान, महाकाल वन और विमुक्ति क्षेत्र भी कहते हैं। एकाग्रक, भद्रकाल, करवीर वन, कोलागिरि, काशी, प्रयाग, अमरेश्वर, भरत, केदार, दिव्यरुद्रमहालय—ये सब तीर्थ दिव्य श्मशान हैं, जो शिवजीको सदा ही अत्यन्त प्रिय हैं। इन सिद्ध क्षेत्रोंमें सर्वदा भगवान् शिव क्रीड़ा करते हैं। पृथ्वीपर नैमिषारण्य और पुष्करतीर्थ उत्तम हैं। कुरुक्षेत्र तीनों लोकोंमें उत्तम कहा जाता है। कुरुक्षेत्रसे दसगुनी पुण्यमयी काशीपुरी मानी गयी है और काशीसे भी दसगुना महाकाल वन है।
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९१० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
महाकाल वनमें भगवान् शिवका प्रवेश, कपाल-मोचन, देवताओंद्वारा स्तवन तथा महापाशुपत व्रतकी महिमा
सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यास! प्राचीन कालकी बात है। ब्रह्माजीने उत्तम कुशों और समिधाओंद्वारा अग्निहोत्र किया। अतः उस पुण्य स्थानका नाम ‘कुशस्थली’ हुआ। भगवान् विष्णुने नर-नारायण ऋषिके रूपसे बदरिकाश्रममें रहकर सम्पूर्ण जीवोंके लिये बड़ी भारी तपस्या की। (अतः उस पुण्यक्षेत्रको नर-नारायणाश्रम कहते हैं।) देवेश्वर भगवान् शिव हाथमें कपाल लेकर इस सम्पूर्ण पृथ्वीपर विचरण कर रहे थे। घूमते-घूमते वे कुशस्थलीमें जा पहुँचे और वहाँके उत्तम वनमें उन्होंने प्रवेश किया। वह वन अनेक प्रकारके वृक्षों और लताओंसे हरा-भरा और भाँति-भाँतिके पुष्पोंसे सुशोभित था। नाना भाँतिके पक्षी उसमें सब ओर कलरव करते थे तथा बहुत-से मृग वहाँ सब ओर फैले हुए थे। वह वन नन्दनकाननके समान मनोहर था। भगवान् शिवने उसकी ओर सौम्यदृष्टिसे देखा। भगवान् रुद्रको वहाँ पधारे हुए देख सब वृक्षोंने बड़ी भक्तिके साथ अपनी पुष्पसम्पदा उन्हें समर्पित करके उनके चरणोंमें फूलोंकी वर्षा की। वृक्षोंका वह पुष्पोपहार ग्रहण करके महेश्वरने उनसे कहा—‘तुम्हारा कल्याण हो, तुम सब मुझसे वर माँगो।’
भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर सब वृक्ष हाथ जोड़ उन्हें नमस्कार करके बोले—देवेश्वर! शरणागतवत्सल! आप यहीं इस वनमें सदा निवास करें।
महादेवजी बोले—बहुत अच्छा, इस उत्तम वनमें मेरा सदा मनसे निवास होगा। तुम्हें मैं दूसरा वरदान यह देता हूँ कि अग्नि, वायु, जल, सूर्य-किरणोंका ताप, बिजली, वज्रपात और सर्दी—इनमेंसे कुछ भी तुम्हारे लिये रोग नहीं उत्पन्न कर सकेगा।
इस प्रकार भगवान् शिवने वहाँके वृक्षोंको अनुगृहीत किया और एक वर्षतक वहीं रहकर कपालको पृथ्वीपर फेंक दिया। यह जानकर भगवान् ब्रह्माजी देवता और दैत्योंके साथ उस वनस्थलीको गये, जहाँ भगवान् वृषध्वज शिव विराजमान थे। उस वनकी अन्तिम सीमातक महादेवजीको ढूँढ़ते हुए देवताओंने कहीं भी उनको नहीं देखा। तब ब्रह्माजी देवताओंसे बोले—‘भगवान् शिवके दर्शनके लिये सदा तीन उपाय हैं—श्रद्धापूर्वक ज्ञान, तपस्या और योग। इन्हीं तीनोंसे उनकी प्राप्ति बतायी जाती है। योगी महादेवजीके कलासहित और कलारहित दोनों स्वरूपोंका दर्शन करते हैं। तपस्वी केवल कलायुक्त रूपका और ज्ञानी केवल निष्कल रूपका दर्शन पाते हैं। ज्ञान प्रकट होनेपर भी जिसकी श्रद्धा मन्द है, वह भगवान्का दर्शन नहीं पाता। पराभक्तिसे युक्त योगी पुरुष उन परमात्माका साक्षात्कार करते हैं। अतः मन, वाणी और क्रियाद्वारा भगवान् महेश्वरकी आराधनामें निरन्तर संलग्न हो तुम सब लोग तपस्या करो।’
देवता बोले—ब्रह्मन्! आप हम सब लोगोंको ऐसी दीक्षा दीजिये, जो भगवान् शिवको सन्तुष्ट करनेवाली हो।
ब्रह्माजीने कहा—देवताओ! तुम शिवयज्ञके लिये यहाँ पर्याप्त सामग्री ले आओ और इस स्थानपर यज्ञकी वेदी बनाओ। उसीपर अष्टमूर्ति शिवका यजन (पूजन) किया जायगा।
ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर देवताओंने सब कुछ उनके कथनानुसार किया। उन्होंने विनययुक्त वेषमें आकर ब्रह्माजीके चरणोंमें प्रणाम किया और वे निष्पाप देवता उनका अनुसरण—उनकी आज्ञाका पालन करने लगे। भगवान् शिवका प्रसाद प्राप्त करनेके लिये ब्रह्माजीने विधिपूर्वक चन्द्रार्धशेखर शिवका यजन किया। फिर अनुग्रहपूर्वक सम्पूर्ण देवताओंको व्रतोंमें श्रेष्ठ दिव्य पाशुपत व्रतका उपदेश किया। विरोधभावको भुला देनेवाले भगवान् ब्रह्माजीने स्वयं ही देवताओंको वह दीक्षा दी।
- आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९९१
महापाशुपत व्रतका वर्णन शिवशाखामें जैसा किया गया है, शास्त्रोंमें उसकी जैसी विधि बतायी गयी है और जैसे आचार-व्यवहारकी शिक्षा दी गयी है, उसके सहित वह शैव-व्रत देवताओंको बताया। वह व्रत पापों और दुःखोंका नाश करनेवाला, पुष्टि और बलको बढ़ानेवाला, सिद्धिदायक, सुयश बढ़ानेवाला, मनको प्रिय लगनेवाला तथा कलियुगके समस्त पापोंसे छुटकारा दिलानेवाला है। इस व्रतको धारण करनेवाले मनुष्योंको भस्म-स्नान करते हुए एकाग्रचित्त, जितेन्द्रिय, शान्त और दान्त (दमनशील) भावसे रहना चाहिये। तथा कमण्डलु धारण करना, रुद्राक्ष पहनना तथा अशुभदर्शन, असत् आलाप और आसक्ति आदिसे रहित होकर रहना चाहिये। ब्रह्माजीकी आज्ञासे सब देवताओंने इसी प्रकार व्रत धारण करके उस वनमें उमापति महादेवजीकी आराधना की। वे सभी पराभक्तिसे युक्त हो उत्तम विधिका पालन करते हुए दीर्घकालतक भगवान्का ध्यान करते रहे। रुद्रके ध्यानकी अग्निसे उनके समस्त पाप दग्ध हो गये और वे अपूर्व शोभा एवं दीप्तिसे सम्पन्न हो गये। तब भगवान् शंकरने देवताओंके पास जाकर उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। भगवान् सदाशिवको प्रत्यक्ष देखकर देवताओंने सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले उन महेश्वरका इस प्रकार स्तवन किया।
देवता बोले—गणों तथा नन्दीसहित शान्तस्वरूप भगवान् शिवको नमस्कार है। जो धर्मस्वरूप वृषकी पीठपर आरूढ़ होनेवाले, सौम्यस्वरूप तथा शक्ति एवं शूल धारण करनेवाले हैं, उन्हें नमस्कार है। दिशाएँ तथा व्याघ्रचर्म आदि ही जिनके वस्त्र हैं, जिनका चित्त परम विशुद्ध और तेज अत्यन्त दुःसह है, जो ब्रह्मस्वरूप हैं, ब्रह्मा जिनका शरीर हैं तथा जो ब्रह्माजीके द्वारा भक्तानुग्रहके कार्यमें लगाये जाते हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। अन्धकासुरका नाश करनेवाले रुद्रको नमस्कार है। सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी भगवान् शिवको बार-बार नमस्कार है। सब प्रकारके रोगोंका अपहरण करनेवाले पंचमुख रुद्रको नमस्कार है। कैलास पर्वतपर शयन करनेवाले देवताओंके स्वामी ईशानदेवको बारम्बार नमस्कार है। भीम, उग्रस्वरूप तथा विजयरूप शंकरको नमस्कार है, नमस्कार है। देवताओं, दैत्यों तथा यतियोंके भी अधिपति भगवान् शंकरको प्रणाम है। जो चण्ड (दैत्योंपर अत्यन्त क्रोध करनेवाले), चण्ड-दण्ड (भयंकर दण्ड देनेवाले) तथा श्रेष्ठ खट्वांग धारण करनेवाले हैं, उन रुद्रदेवको नमस्कार है। विरूपाक्ष (भयंकर नेत्रवाले), शुभाख्य (कल्याणकारी नामवाले) तथा विश्वरूपको बार-बार नमस्कार है। शान्त एवं ज्ञानस्वरूप त्रिनेत्रधारी शिवको बार-बार नमस्कार है। वेधा (ब्रह्मा), विश्वरूप (विष्णु) तथा विश्वसंहारकारी (रुद्र) को नमस्कार है। भक्तोंपर अत्यन्त कृपा करनेवाले तथा रुद्रज्ञानपरायण शिवको नमस्कार है। कुरूप, सुरूप तथा सैकड़ों रूप धारण करनेवाले भगवान् शंकरको नमस्कार है। पंचमुख, शुभमुख तथा चन्द्रमुख धारण करनेवाले शिवको नमस्कार है। वर देनेवाले, वरण करनेयोग्य तथा उत्तम कर्म करनेवाले शिवको नमस्कार है। त्रिपुरासुरका नाश करनेवाले त्रिलोचन! महेश्वर! हम मन, वाणी, शरीर और भावोंसे आपकी शरणमें आये हैं। आप हमारी रक्षा कीजिये।
सनत्कुमारजी कहते हैं—ब्रह्मा आदि देवताओंके द्वारा इस प्रकार स्तवन किये जानेपर महादेवजीने कहा—'महाभागगण! तुम सबने मेरे दर्शनकी इच्छासे बहुत ही श्रद्धापूर्वक मेरा आराधन किया है; अतः मैं तुम्हें उत्तम वरदान दूँगा। देवताओ! तुम्हारे हितके लिये उज्जयिनीपुरीमें आकर मैंने कपालको फेंक दिया है। अब तुम और क्या चाहते हो?'
देवताओंने पूछा—देव! आपने यहाँ कपाल फेंककर हमारा कौन-सा हित किया है, आपका यह कार्य निरर्थक नहीं हो सकता। अतः इस विषयमें जो यथार्थ कारण हो, उसे बताइये।
महादेवजीने कहा—तुमलोगोंके हितके लिये मैंने तुम्हारे ऊपर आनेवाले एक महान् भयको टाला है। हय नामक दैत्य, जो बहुत ही बलवान्,
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योगमायाका जाननेवाला तथा असुरोंका स्वामी था, बलके घमण्डमें आकर रसातल लोकको अपने वशमें करके वहीं रहता था। उस दैत्यके बलवान् सेवक तुम सब लोगोंको तपस्यामें स्थित जानकर यहाँ मारनेके लिये आये थे। उन्होंने मायासे अपने शरीरको छिपा रखा था। यहाँ कपालके गिरानेसे जो अत्यन्त भयानक शब्द हुआ है, उससे और पृथ्वी काँपनेसे उन सब दैत्योंके प्राण निकल गये हैं। उन दैत्योंने सम्पूर्ण लोकोंकी सत्ताका विनाश करनेके लिये उद्योग किया था। वे राज्य और ऐश्वर्यके दर्पसे उन्मत्त हो उठे थे। इसीलिये मैंने उनका वध किया है।
देवता बोले—प्रभो! आप देवताओंके ऊपर बड़ी भारी कृपा करनेवाले हैं।
महादेवजी बोले—देवताओ! तुम्हारे इस तपसे तथा दुःसह कष्टसे तुम्हारा तेज सब ओरसे बढ़े और अधिक उत्कर्षको प्राप्त हो।
देवाधिदेव महादेवजीके ऐसा कहनेपर ब्रह्मा आदि देवता पृथ्वीपर घुटने टेककर, ऊपरकी ओर मुँह करके बोले—देवेश्वर! आप हमारे प्राणदाता हैं, कारण हैं। देव! तपस्यासे ही आपका दर्शन होता है। आपके ध्यानमें लगे हुए हम भक्तोंकी रक्षा कीजिये।
महादेवजी बोले—देवताओ! मैंने यत्नपूर्वक तुम्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया है। अब तुम वर माँगो, मैं तुम्हें बहुतसे वर दूँगा।
भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर ब्रह्माजीने कहा—भगवन्! हमें उत्तम ऐश्वर्य और उन राक्षसोंको अक्षय धाम दीजिये।
भगवान् शिव बोले—देवताओ! इस लोकमें जो मेरे भक्त हैं अथवा जो मेरे हाथसे मारे गये हैं, वे दुर्गति को नहीं प्राप्त होते। उन्हें परम उत्तम गतिकी प्राप्ति होती है। वे देवद्रोही असुर जटाजूटधारी एवं शूलपाणि होकर मेरे वाम पार्श्वमें विराजमान होते हैं। इन दैत्योंके निग्रह और आप लोगोंके बोधके लिये मैंने इस भूतलपर कपालको फेंका है। मेरी भक्तिकी इच्छा रखनेवाले भक्तोंपर इस प्रकार मैंने अनुग्रह किया है। वृक्षोंके प्रार्थना करनेपर मैंने इस वनमें नित्य निवास स्वीकार किया है। देवताओ! इस वनमें आये हुए मेरे और यहाँ तपस्या करनेवाले तुम्हारे सामीप्यसे यह महाकाल वन दो नामोंसे लोकमें विख्यात होगा—गुह्य वन और श्मशान। यह तीर्थ सब क्षेत्रोंमें श्रेष्ठ एवं महान् है।
मैंने कपाल-व्रतचर्याका वर्णन इस प्रकार किया है—कपालपात्रमें भोजन करे, कपाल-व्रतको ही आभूषणकी भाँति धारण करे, हाथमें कपाल लिये रहे, सदा सन्तोषपूर्वक रहे और नियमपूर्वक भिक्षान्नका आहार करे। श्मशानमें निवास करे, समस्त प्राणियोंके प्रति प्रसन्न रहे, प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिमें समभाव रखे, सब अंगोंको भस्मसे विभूषित करे, विशेषतः ज्ञानवान् और जितेन्द्रिय हो, सब प्रकारकी आसक्तियोंको त्याग दे, मिट्टी, भस्म और जलमात्रका संग्रह करे, सदा योगयुक्त रहे, नित्य-निरन्तर जप करे। श्रेष्ठ आसनको जीते, पवित्र तीर्थमें आश्रम बनाकर रहे, धीरे-धीरे इष्टदेवमें चित्तको एकाग्र करे। यही लोकातीत उत्तम ज्ञान एवं महापाशुपत-व्रत है। पूर्वकालमें कपाल-व्रतका आश्रय लेकर मैंने स्वयं इसका पालन किया है। कपाल-व्रत परम गोपनीय, पवित्र एवं पापनाशक है। कपाल-व्रत कठिनतासे धारण करनेयोग्य और परम अद्भुत है। महापाशुपत-व्रत धारण करनेवाले एक महात्माको जो श्रद्धापूर्वक भोजन कराता है, उसे करोड़ों वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको भोजन करानेका फल प्राप्त होता है। जो यतियोंको कपालपूरणी (नारियलके खप्परको भरकर) भिक्षा देता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर कभी दुर्गति को नहीं प्राप्त होता है। यह लोक और वेदमें वन्दित तथा देवताओं और दानवोंद्वारा पूजित व्रत है। सम्पूर्ण भूतोंको मोहनेवाले इस कपाल-व्रतको जो धारण करते हैं, वे मेरे समान होकर इस पृथ्वीपर विचरते हैं तथा इस दीक्षा और योगसे समस्त प्राणियोंको तारते हैं। पितामह! जैसे मैं सम्पूर्ण देवताओंका पूजनीय हूँ, उसी प्रकार यह महाव्रत सम्पूर्ण योगोंसे
- आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * १९३
पूजनीय है। संसारके बन्धनसे छुटकारा दिलानेके लिये यह कल्याणमय व्रत परम पवित्र है, क्योंकि यह सम्पूर्ण धर्मके द्वारा मोक्षका कारण है। जो अजितेन्द्रिय पुरुष इस कपालव्रत (संन्यास)-को ग्रहण करके फिर छोड़ देता है, वह यमदूतोंद्वारा शीघ्र ही रौरव नरकमें डाला जाता है। जो भावसे इस व्रतकी बात तो करता है, किंतु तदनुकूल कर्म नहीं करता है, वह रागयुक्त चित्तवाला शृंगारी (शृंगाररसमें डूबा हुआ) पुरुष धर्मका प्रिय नहीं है। जो इस व्रतको लेकर भी किसी एक स्थानपर ही भोजन करता है, मिठाइयाँ उड़ाता है, निष्कपट बातें जिसे अच्छी नहीं लगतीं, जो बुरे गाँव और नगरोंमें रहता है, खेती और वाणिज्य-व्यवसायका सेवन करता है—इत्यादि दोषोंसे दूषित उस मिथ्याचारीके साथ वार्तालाप करनेसे भी मनुष्य नरकगामी होता है, क्योंकि वह मेरे व्रतको कलंकित करनेवाला है।
सनत्कुमारजी कहते हैं—ऐसा कहकर भगवान् सदाशिवने ब्रह्मा आदि देवताओंके साथ उस क्षेत्रको बसाया। श्रेष्ठ मुनिगण इस आदिक्षेत्रको श्मशान कहते हैं। जहाँ भगवान् शिवका निवास है, वह स्थान महाकाल वन कहलाता है। वह भूभाग भगवान् शंकरके अनुग्रहका घर है, इसमें संशय नहीं है। मरणशील प्राणियोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही इस क्षेत्रका प्रादुर्भाव हुआ है। वहाँ सुवर्ण और मणिसे निर्मित वेदिका बनायी गयी, जो सब ओरसे परम सुन्दर थी। चौंतीस सुन्दर कलश स्थापित किये गये, जो भरे हुए थे। वहाँ वेदीके चारों ओर चार दरवाजे थे, जो होमाग्निसे तप रहे थे। उस स्थानपर रखे हुए घट नवोदित सूर्यकी भाँति दिखायी देते थे। ऐसे उत्तम महाकाल वनमें भगवान् शिव क्रीड़ा करते हैं। यह सब कुछ सत्ययुगमें सबको प्रत्यक्ष दिखायी देता है, त्रेतामें धर्मपरायण तपस्वी ब्रह्मचारी ही भगवान्को प्रत्यक्ष देखते हैं, द्वापरमें धर्मात्मा और वैदिक ज्ञानसे सम्पन्न पुरुष ही उन्हें देख पाते हैं, परंतु कलियुगमें विशुद्ध विज्ञानसे सुशोभित अधिक तपस्यावाले पुरुष ही महाकाल वनमें शूलपट्टिशधारी उन देवाधिदेव भगवान् महेश्वरका दर्शन करते हैं, जो सम्पूर्ण लोकोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं। व्यास ! मैंने तुम्हें यह सब यथार्थ वृत्तान्त बतलाया है। भगवान् शिवका यह स्थान विश्वविख्यात गुणगणोंसे पूजित है और सब दोषोंका नाश करनेवाला है। जो कल्याणमयी बुद्धिसे युक्त मानव इहलोकमें एकाग्रचित्त होकर इस स्थानके माहात्म्यको पढ़ता अथवा सुनता है, वह देवताओंसे अभिषिक्त एवं पूजित होकर भगवान् शंकरके धामको जाता है।
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रुद्रभक्तिका निरूपण तथा महाकाल क्षेत्रमें निवास करनेवाले मनुष्योंके नियम
व्यासजीने पूछा— भगवन् ! महाकाल वनमें रुद्रलोककी इच्छा रखनेवाले उस क्षेत्रके निवासियोंको किस विधिसे रहना चाहिये ?
सनत्कुमारजीने कहा— व्यास ! भगवान् शंकरकी भक्ति तीन प्रकारकी बतायी गयी है—मानसिक, वाचिक और कायिक। लौकिकी, वैदिकी और आध्यात्मिकी—ये तीन भेद और भी हैं। ध्यान, धारणा एवं बुद्धिके द्वारा जो भगवान् रुद्रके स्वरूपोंका स्मरण किया जाता है, वह रुद्रके प्रति भक्ति-भावको बढ़ानेवाली मानसी भक्ति कहलाती है। स्तुति और कीर्तन आदि वाचिकी भक्तिके अन्तर्गत हैं। इन्द्रियोंको रोककर संयममें रखनेवाले पुरुषोंद्वारा जो व्रत, उपवास और नियम आदिका पालन किया जाता है—ज्ञान और ध्यानमें स्थित धर्मात्मा पुरुषोंकी वह भक्ति कायिक कही गयी है। गोघृत, गोदुग्ध, गोदधि, चन्दन, कुंकुम, कुशोदक, गन्ध,
९१४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
विविध माल्य, अनेक प्रकारके धातु, घी, गुग्गुल, धूप, कालागुरु, सुगन्धित पदार्थ, सुवर्ण और रत्नोंके आभूषण, विचित्र माला, वस्त्र, स्तोत्र, पताका, व्यजन, नृत्य, वाद्य, गीत, सब प्रकारके उपहार, भक्ष्य, भोज्य, अनुपान तथा अक्षतोंके द्वारा जो पूजा की जाती है, वह लौकिकी भक्ति मानी गयी है। वेदमन्त्रोंके द्वारा हविष्यकी आहुति आदिके योगसे जो यजनक्रिया की जाती है, वह वैदिकी भक्ति कहलाती है। मुने! आध्यात्मिकी शिव-भक्ति दो प्रकारकी है—एक सांख्या भक्ति और दूसरी यौगिकी भक्ति। अब इनका विभागपूर्वक वर्णन सुनो। संख्यासे प्रधान (प्रकृति) आदि तत्त्व चौबीस* हैं। वे सभी अचेतन तथा चेतनके उपयोगमें आने योग्य भोग्य हैं। इनसे भिन्न पुरुष पचीसवाँ तत्त्व है, वह चेतन एवं भोक्ता है। भगवान् रुद्र छब्बीसवें तत्त्व हैं। वे कर्ता, सर्वज्ञ, चेतन और सबके स्वामी हैं। अव्यक्त प्रकृति नित्य (अनादि) एवं अजन्मा है तथा पुरुष उसका अधिष्ठाता और प्रेरक है। वह व्यक्त और नित्य है। महेश्वर इन सबके कारण हैं। पहले चौबीस तत्त्वोंकी सृष्टि हुई; फिर उन्हीं तत्त्वोंसे पंचभूतोंकी सृष्टि हुई है। प्रधान या प्रकृति त्रिगुणात्मक है। भगवान् रुद्रका पुरुषके साथ साधर्म्य है—चैतन्यरूप धर्म दोनोंमें समान रूपसे है; परंतु प्रधान तत्त्व जड होनेके कारण उनसे विपरीत धर्मवाला है। वह रुद्रकी इच्छा (संकल्पशक्ति)-के अनुसार भौतिक जगत्का कारण होता है। सर्वत्र रुद्रमें ही कर्तृत्व है, पुरुषमें कर्तृत्वका अभाव है और प्रधान (प्रकृति)-में अचेतनता है। इन तीनोंका विवेक तत्त्वज्ञान कहा गया है। कार्य और कारण दोनों तत्त्वान्तरसे मुक्त होते हैं। प्रेरक-तत्त्वमें जो विलक्षणता है, उसको जानकर रुद्रतत्त्वार्थका विचार करनेवाले पुरुष तत्त्वोंकी संख्या निश्चित करते हैं। इस प्रकार रुद्रके यथार्थस्वरूपका विवेचन तथा तत्त्वोंकी तात्त्विक संख्या बतायी गयी है। सांख्यमतमें रुद्रके स्वरूपका यह चिन्तन ही विद्वानोंद्वारा आध्यात्मिक सांख्या भक्ति बतायी गयी है।
ब्रह्मन्! अब मुझसे यौगिकी भक्तिका वर्णन सुनो। जो पुरुष अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखकर सदा प्राणायाम-परायण होकर ध्यान करता है, अथवा जो हृदयमें धारणाको स्थिर करके महेश्वरका इस प्रकार ध्यान करता है कि 'हृदयकमलकी कर्णिकाके आसनपर भगवान् शिव विराजमान हैं, उनके पाँच मुख हैं, प्रत्येक मुखमें तीन नेत्र हैं, चन्द्रमाकी कलासे उनकी जटा जगमगा रही है और कटिभागमें सर्पकी करधनी शोभा पाती है। उनका श्रीअंग श्वेत है, वे दस भुजाओंसे सुशोभित हैं, उनका स्वरूप सबके लिये मंगलमय है, उनके हाथोंमें वरद और अभयकी मुद्रा है।' उस योगीके द्वारा किये जानेवाले इस ध्यानको भगवान् रुद्रकी 'पराभक्ति' कहते हैं। जो इस प्रकार भगवान् शिवके प्रति भक्ति रखता है, वह रुद्रभक्त कहलाता है।
व्यास! अब महाकाल क्षेत्रमें निवास करनेवाले मनुष्योंके लिये जो विधि बतायी गयी है, उसको सुनो। जो ब्राह्मण ममता, अहंकार, आसक्ति तथा परिग्रहसे रहित हैं, बन्धुजनोंके प्रति अनासक्त रहकर मिट्टी, पत्थर और सुवर्णको समान समझते हुए महाकाल वनमें निवास करते हैं, मन, वाणी और शरीरद्वारा किये जानेवाले त्रिविध कर्मोंद्वारा सदा सब प्राणियोंको अभय दान देते हैं, सांख्य और योगकी विधिको जानते हैं, धर्मके स्वरूपको समझते हैं और संशयरहित हो नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा भगवान् शंकरका यजन करते हैं, वहाँ मृत्यु होनेके पश्चात् वे सभी अत्यन्त दुर्लभ एवं अक्षय ब्रह्म-सायुज्यको प्राप्त होते हैं। इस संसारमें पुनर्जन्म न पाकर अक्षय मुक्ति लाभ करते हैं। क्षेत्रनिवासी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र सबको अपने-अपने धर्ममें तत्पर होना तथा अपनी ही वृत्ति एवं आचार-व्यवहारसे जीवन
* प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, शब्दतन्मात्रा, स्पर्शतन्मात्रा, रूपतन्मात्रा, रसतन्मात्रा, गन्धतन्मात्रा, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, मन और पंचमहाभूत—ये चौबीस तत्त्व हैं।
* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९१५
| निर्वाह करना चाहिये। भगवान् शिवके भक्त सर्वतोभावसे जीवोंपर अनुग्रह करनेवाले होते हैं। जो मुमुक्षु मानव महाकाल वन नामक क्षेत्रमें निवास करते हैं, वे मृत्युके पश्चात् सुन्दर विमानोंद्वारा रुद्रलोकमें जाते हैं। अथवा जो | उपलब्ध हुई ज्ञानाग्निमें अपने शरीर आदि अनात्मपदार्थोंका हवन करता है, नित्य रुद्राध्यायका पाठ करता है और महान् सत्त्व (सत्त्वगुण एवं धैर्य) से सम्पन्न है, वह भगवान् शंकरके धाममें निवास करता है। |
$\sim\sim\circ\sim\sim$
हालाहल दैत्यका वध, रुद्रसरोवरकी महिमा तथा कुशस्थलीमें चार समुद्रोंका आगमन और उसका माहात्म्य
| व्यासजी बोले—भगवन्! आचार सब धर्मोंमें मुख्य है। वही सब धर्मोंका आश्रय है। जो स्वधर्ममें तत्पर, क्रोधको जीतनेवाले तथा इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले हैं, वे तो भगवान् शिवके लोकमें जाते ही हैं, उनके लिये मेरे मनमें कोई चिन्ता नहीं है। वैसे लोग तो किसी उत्तम क्षेत्रमें निवास किये बिना भी पूर्वोक्त नियमोंके पालनसे ही चन्द्रमाके समान कान्तिमान् विमानोंद्वारा निश्चय ही रुद्रलोकमें चले जाते हैं। परंतु जो स्त्रियाँ, शूद्र, म्लेच्छ, पशु-पक्षी, मृग, मूक, जड़, अन्ध और बधिर हैं, जिनमें तप और नियमका अभाव है, वे यदि महाकालक्षेत्रमें मृत्युको प्राप्त हों, तो उनकी क्या गति होती है? | महादैत्यको शिवगणोंने त्रिशूलसमूहों, तलवारों, मूसलों तथा बाणसमुदायसे मूर्च्छित करके पृथ्वीपर मार गिराया। उसके मारे जानेपर महादेवजीने कहा—'अहो! इस मूढ़को बड़ा घमण्ड हो गया था, उसीसे यह मृत्युको प्राप्त हुआ है।' इसी समय पूर्वोक्त कपालसे बड़ी भयानक और प्रज्वलित मुखवाली प्रचण्ड मातृकाएँ प्रकट हुईं, जो बड़ी बलवती और भयानक अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित थीं। वे उस स्थानपर दौड़ी हुई आयीं और महादेवजीको निवेदन करके उस महाबली दैत्यको काट-काटकर खाने लगीं। इससे वे इस क्षेत्रमें कपालमातृकाके नामसे विख्यात हुईं। |
| सनत्कुमारजीने कहा—ब्रह्मन्! यदि स्त्री, म्लेच्छ, शूद्र, पशु-पक्षी और मृग भी अपनी स्वाभाविक वृत्तिसे ही उस क्षेत्रमें मरें तो वे दिव्य शरीर धारण करके रुद्रलोकमें जाते हैं और वहाँ सब प्रकारके सुखभोगसे सम्पन्न होते हैं। | पूर्वकालमें वहाँ स्थापित हुए कपालको भेदकर एक कुण्ड प्रकट हुआ, जो शिवतड़ागके नामसे प्रसिद्ध है। वह सब पापोंका नाश करनेवाला है। आज भी वह महादिव्य रुद्रसरोवर वहाँ प्रकाशित होता है। गन्धर्वगण उसका सेवन करते हैं। रुद्रसरोवरका जल किसी पात्रमें रखा हो अथवा हाथमें निकाला गया हो, ठंडा हो, गरम हो या उसका क्वाथ बनाया गया हो, किसी प्रकार भी उपयोगमें लाये जानेपर वह अश्वमेध-यज्ञके अवभृथ-स्नानकी भाँति पवित्र करता है। सैकड़ों देवताओंसे घिरे हुए ब्रह्माजी भी उस रुद्रसरोवरपर गये हैं तथा उन्होंने उसे स्वर्गलोककी सीढ़ी कहा है। जो यहाँ प्राण त्याग करते हैं, वे रुद्रलोकमें जाते हैं। व्यासजी! जो लोग महाकाल वनमें निवास करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं। जो रुद्रसरोवरमें स्नान करते अथवा उसका जल पीते हैं, वे स्वधर्म तथा |
| एक समय देवताओंके लिये कण्टकरूप हालाहल नामक दानव महाकाल वनकी ओर दौड़ा हुआ आया। वह दुरात्मा क्रोधसे जल रहा था। ब्रह्माजीका वरदान पाकर देवताओंके लिये दुर्जय हो गया था। उसने भैंसेका स्वरूप धारण कर रखा था। उस देवशत्रुको आते देख पिनाकधारी भगवान् शिव अपने गणोंसे बोले—'पार्षदो! यह मायावी दैत्य तीनों लोकोंके लिये कण्टक है और बड़े वेगसे इधर आ रहा है, अतः तुम सब लोग मिलकर इसे मारो।' तब वहाँ आते हुए उस |
९१६ संक्षिप्त स्कन्दपुराण
सदाचारमें तत्पर रहनेवाले पुरुष सबके स्वामी महादेवजीका प्रत्यक्ष दर्शन करते हैं।
**सनत्कुमारजी कहते हैं—**प्राचीनकालमें सुद्युम्न नामक एक धर्मात्मा राजा थे। उनकी पत्नीका नाम सुदर्शना था। उसने दाल्भ्य मुनिका दर्शन करके पुत्रकी कामनासे पूछा—'भगवन्! किस दान, स्नान और विधिसे मुझे समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न पुत्र प्राप्त हो सकता है?'
**दाल्भ्यजी बोले—**बेटी! लोकस्रष्टा ब्रह्माजीने तुम्हारे लिये पहलेसे ही श्रेष्ठ पुत्र रच रखा है। तुम्हारे पतिदेव भगवान् शंकरकी आराधना करके उनके प्रसादसे अवन्तीपुरीमें जब चारों समुद्रोंको स्वरूपतः ले आवेंगे, तब उनमें राजाके स्नान करनेपर तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा। अतः तुम अपने पतिको शंकरकी आराधनाके लिये प्रेरित करो।
दाल्भ्यके वचनसे रानी सुदर्शनाने अपने पतिको भगवान् शंकरकी आराधनाके लिये भेजा। उन्होंने गन्धमादन पर्वतपर जाकर आराधनाद्वारा भगवान् शिवको सन्तुष्ट किया। सन्तुष्ट होनेपर शंकरजी बोले—'राजेन्द्र! तुम अवन्तीपुरीको जाओ। वहाँ तुम्हें सुन्दर पुत्रकी प्राप्ति होगी। मेरे आदेशसे बादल उस मरुप्राय प्रदेशमें कुशस्थलीके निकट जायँगे और वहीं तुम्हें चारों समुद्र एकत्र दिखायी देंगे। नरश्रेष्ठ! तुम्हारे प्रार्थना करनेपर वे सभी समुद्र अंशकलाद्वारा वहाँ सदा निवास करेंगे।' ऐसा कहकर महादेवजी अन्तर्धान हो गये। तब राजा सुद्युम्न अपनी पत्नीके साथ कुशस्थलीमें गये और वहाँ उन्होंने राजस्थलके समीप चारों समुद्रोंको आया हुआ देखा। देखकर उन सबको नमस्कार किया। सुद्युम्नको नमस्कार करते देख वे समुद्र बोले—'सुव्रत! कोई उत्तम वरदान माँगो।' तब उन्होंने समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त पुत्र माँगा और इस प्रकार कहा—'जबतक यह पृथ्वी स्थित है, तबतक इस राजस्थलके समीप आप सब लोग निवास करें।'
**समुद्रोंने कहा—**राजन्! जबतक इस कल्पका अन्त न हो जायगा, तबतक हम सब लोग यहीं स्थित रहेंगे और हमारे जलमें स्नान करनेमात्रसे तुम्हें समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त पुत्रकी प्राप्ति होगी। इसलिये यहाँ स्नान करो।
व्यासजी! इस प्रकार राजा सुद्युम्नने अवन्तीपुरीमें चारो समुद्रोंको उतारा है। जो वहाँकी यात्रा करता है, उसके पुण्यफलका वर्णन सुनो। मनुष्यको चाहिये कि वह महापुण्यमय क्षार-समुद्रमें स्नान करके भक्तिपूर्वक पितरोंका श्राद्ध करे। फिर स्थलभागमें विद्यमान पार्वतीवल्लभ महादेवजीकी पूजा करे। तत्पश्चात् ताँबेका एक पात्र लेकर उसे नमकसे भर दे और उसमें कुछ सुवर्ण रखकर वेदवेत्ता ब्राह्मणको दान कर दे। उसके बाद सप्तधान्यसे युक्त और वस्त्रसे वेष्टित बाँसके पात्रमें फल और दक्षिणा रखकर यत्नपूर्वक अर्घ्य प्रदान करे। तदनन्तर क्षीरसागरमें जाकर पूर्ववत् स्नान करे और ताम्रके पात्रमें दूध भरकर दान करे। फिर दधिसमुद्रमें स्नान करके शुभ दही-भात दान करे। पुनः इक्षुसमुद्रमें स्नान करके ब्राह्मणको गुड़ समर्पित करे। इस प्रकार यात्रा करके दूध देनेवाली गौका दान करे। जो इस विधिसे राजस्थलके समीप यात्रा करता है, वह कल्याणमयी लक्ष्मी और सुन्दर पुत्र पाता है तथा मरनेपर स्वर्गलोकमें जाता है।
शंकरवापी, शंकरादित्य, गन्धवती नदी, हरसिद्धि देवी, वटयक्षिणी, पिशाचतीर्थ, शिप्रागुप्तेश्वर आदि तथा हनुमत्केश्वरकी महिमा
**सनत्कुमारजी कहते हैं—**व्यासजी! क्रीड़ा करते हुए भगवान् शंकरने 'शंकरवापी' नामक एक शुभ महातीर्थका निर्माण किया है। जो मनुष्य रविवारयुक्त अष्टमीको उक्त शंकरवापीमें पूर्व आदि दिशाओंके क्रमसे सभी दिशाओं और कोणोंमें एवं वापीके मध्यभागमें भी स्नान करके ब्राह्मणोंको
- आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९१७
हविष्यान्नयुक्त नूतन कमण्डलु देता है और उन्हें शाक एवं मूल-फल अर्पण करता है, वह इहलोक और परलोकमें जो सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न स्थान है, वहाँ जाता और उत्तम ऐश्वर्य भोगता है।
तदनन्तर देवदेवेश्वर पिनाकपाणि भगवान् शिवने पवित्र भावसे देवाधिदेव दिवाकरका स्तवन किया। इससे सन्तुष्ट होकर दिवानाथ सूर्य वहाँ आये और इस प्रकार बोले—'भूतनाथ ! आप मुझसे वर माँगिये।' भगवान् शिव बोले—'देव ! आप समस्त देहधारियोंके हितके लिये यहाँ एक अंशसे स्थित होइये।' भगवान् शंकरका यह वचन सुनकर सूर्यदेवने वहाँ अवतार लिया। सम्पूर्ण लोकोंको शान्ति प्रदान करनेवाले देवेश्वर सूर्य वहाँ शंकरादित्यके नामसे प्रसिद्ध हैं। उस समय देवगण विस्मित होकर कहने लगे—'अहो ! यह स्थान धन्य है, जहाँ साक्षात् भगवान् शिव विराजमान हैं और सूर्यदेव भी इस तीर्थका माहात्म्य बढ़ानेके लिये यहीं आकर बस गये हैं।' तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवता शंकरादित्यकी स्थापना और पूजा आदि करके बोले—'प्रभो ! जो मनुष्य आपकी स्तुति करेंगे, उन्हें जरा और मृत्युका कष्ट नहीं भोगना पड़ेगा। शंकरादित्यके दर्शन करनेवालेको कभी आधि-व्याधि और दारिद्र्य, रोग और बन्धु-वियोग आदि नहीं होते।'
सनत्कुमारजी कहते हैं—एक समय भगवान् महेश्वरने कपाल धोनेके लिये शुद्ध जल लेकर उससे कपालको अच्छी तरह धोकर उस जलको पृथ्वीपर फेंक दिया। वहीं त्रिभुवन-विख्यात गन्धवती नामवाली पुण्य नदी प्रकट हुई। उसमें स्नान करना सदा ही उत्तम है, ऐसा साक्षात् महादेवजीने कहा है। वहाँ किया हुआ श्राद्ध और तर्पण सब अक्षय होता है। जो मनुष्य वहाँ चन्द्रग्रहणमें स्नान करके पिण्डदान देता है, उसके पितर बारह वर्षोंतक तृप्त रहते हैं। काशी और गया आदि तीर्थोंमें जो एक मासमें तृप्ति होती है, वह यहाँ तत्काल हो जायगी और सन्तुष्ट हुए पितर उन मनुष्योंको मनोवांछित सिद्धिका वरदान देंगे। वहाँ दशाश्वमेध तीर्थमें स्नान करके शिवजीका दर्शन करनेपर मनुष्य दस अश्वमेध-यज्ञोंका फल पाता है।
अब मैं हरसिद्धि देवीका माहात्म्य बतलाऊँगा, जो उत्तम सिद्धि देनेवाली हैं। पूर्वकालमें चण्ड और प्रचण्ड नामवाले दो महाबली दानव स्वर्गलोकको उजाड़कर कैलास पर्वतपर आये। वहाँ उन्होंने दाहिने हाथमें पिनाक और खट्वांग लिये हुए और दूसरे हाथमें 'पाँसा' उठाये हुए भगवान् सदाशिवको देखा। तब वे दैत्य शिवजीके पार्षदोंको पीड़ा देने लगे। यह देख नन्दीने उन्हें रोका। उनके मना करनेपर उन दानवोंने अपने-अपने त्रिशूलोंसे एक ही साथ नन्दीके दायें और बायें पार्श्वमें आघात किया। नन्दी दोनों ओरसे विदीर्ण हो गये और उनके अंगोंसे रक्तकी बड़ी भारी धारा बह चली। उन्हें घायल हुआ देख भगवान् शिवने देवीसे कहा—'इन दोनों महादैत्योंको मार डालना चाहिये।' देवीने कहा—'अभी मारती हूँ।' इतना कहते-कहते वे दोनों बलाभिमानी दानव देवीके हाथसे मरे हुए दिखायी दिये। तब भगवान् हरने कहा—'चण्डि ! तुमने दोनों दुष्ट दानवोंका तत्काल संहार किया है, इसलिये लोकमें तुम 'हरसिद्धि' के नामसे विख्यात होओगी। जो मनुष्य हरसिद्धि देवीका परम भक्तिपूर्वक दर्शन करता है, वह अक्षय भोग पाता और मृत्युके पश्चात् शिवधामको जाता है।'
जो मनुष्य भक्तिपूर्वक एक महीनेतक प्रतिदिन भगवती वटयक्षिणीका दर्शन करता है और धतूरके फूलोंसे उनकी पूजा करता है, उसकी सिद्धि कभी क्षीण नहीं होती।
जो मनुष्य पिशाचतीर्थमें विशेषतः चतुर्दशीको स्नान करके भक्तिपूर्वक तिलदान देता है, वह कभी पिशाच नहीं होता। इतना ही नहीं, उसका कुल भी पिशाचतासे मुक्त हो जाता है। जिसका नाम लेकर मनुष्य वहाँ स्नान करता है, वह भी पिशाचतासे छुटकारा पा जाता है। शिवभक्त एवं जितेन्द्रिय मनुष्य 'शिप्रागुप्तेश्वर' का दर्शन करके सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य
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स्नान करके भक्तिपूर्वक अगस्त्येश्वरका दर्शन करता है, वह यमराजके घरमें न जाकर रुद्रलोकको जाता है। जो मनुष्य शिप्रा में स्नान करके दुण्ढेश्वर शिवका दर्शन करता है, वह अश्वमेध-यज्ञका फल पाता है। पूर्वकालमें महादेवजीने यहाँ डमरू बजाया था, इसलिये वे डमरुकेश्वरके नामसे प्रसिद्ध हुए। जो भक्तिपूर्वक डमरुकेश्वर महादेवका दर्शन करता है, उसे रोगका भय नहीं होता और वह मरनेपर शिवलोकको जाता है। जो मानव भक्तिके साथ अनादिकल्पेश्वरका दर्शन करता है, वह स्वर्गलोकका राज्य पाता है। जो सिद्धेश्वर, वीरभद्र और चण्डिकाका दर्शन करता है, वह सिद्धि और सर्वत्र विजय पाता है। त्रिविष्टपतीर्थमें स्नान करके स्वर्णजालेश्वरका दर्शन करनेके पश्चात् जो स्वर्ण (धतूर) से उनका पूजन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो स्नानके पश्चात् भक्तिपूर्वक कर्कटेश्वर शिवका दर्शन करता है, उसे कभी सर्पसे भय और दरिद्रता नहीं होती। जो पराभक्तिपूर्वक सनातनी महामायाका दर्शन करता है, वह विष्णुमायासे मुक्त होकर परम पदको प्राप्त होता है। स्वर्गद्वारमें स्नान करके भैरव-देवका दर्शन करनेसे मनुष्य सौ यज्ञोंका फल पाता है।
जो शिव-सरोवरमें स्नान करके हनुमत्केश्वरका दर्शन करता है, वह कोटि सहस्र कल्पोंतक वायुलोकमें आनन्द भोगता है।
व्यासजी बोले— भगवन् ! आपने जिस हनुमत्-केश्वरकी चर्चा की है, उनकी सनातन कथा कहिये।
सनत्कुमारजीने कहा— ब्रह्मन् ! पूर्वकालमें रावण नामक सुप्रसिद्ध राक्षस हो चुका है, जो तीनों लोकोंके लिये कण्टक था। भगवान् विष्णुने श्रीरामचन्द्रजीका अवतार धारण करके उसे लंकामें मार गिराया। दुष्ट रावणका वध करके जनकनन्दिनी सीताको साथ ले वे वानर और भालुओंसहित अपनी नगरी अयोध्याको लौटे। वहाँ राज्य पाकर श्रीरामचन्द्रजी ऋषियोंसे घिरे हुए बैठते और कथा सुनते थे। एक दिन कथाके अन्तमें श्रीरामने मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यसे पूछा—'मुने! भगवान् शंकर और हनुमान्जीमें कौन अधिक बलवान् है?' तब मुनिवर अगस्त्यने दशरथनन्दन श्रीरामसे कहा—'प्रभो! युद्ध और शौर्यमें जैसे भगवान् महेश्वरकी कहीं उपमा नहीं है, उसी प्रकार वायुनन्दन हनुमान्जीको भी समझना चाहिये।'
यह सुनकर हनुमान्जीने मन-ही-मन सोचा—'मुनिवर अगस्त्यजीने श्रीरघुनाथजीके सामने मेरी उपमा शिवजीके साथ दी है, अतः अब मैं लंकापुरीमें राक्षसराज विभीषणसे एक शिवलिंग माँग लानेके लिये जाऊँगा।' इस निश्चयके अनुसार वे लंकामें जाकर विभीषणसे बोले—'महाभाग! तुम मुझे एक उत्तम शिवलिंग प्रदान करो।' राक्षसराज विभीषण बोले—'सुव्रत! रावणके द्वारा स्थापित किये हुए ये छः लिंग हैं। इनमेंसे जो तुम्हें प्रिय हो उसे बताओ, वही मैं तुम्हें दे दूँगा।'
तदनन्तर हनुमान्जीने मोतीके समान स्वच्छ एक शिवलिंगका हाथसे स्पर्श किया। विभीषण बोले—'महावीर! तुमने जिस शिवलिंगको ग्रहण किया है, वह मैंने तुम्हें दे दिया।' तत्पश्चात् उस महालिंगको लेकर हनुमान्जी निर्मल आकाशमार्गसे चले और सातवें दिन अवन्तीपुरीमें आ पहुँचे। वहाँ रुद्रसरोवरके तटपर उसे स्थापित करके उन्होंने सरोवरमें स्नान किया और महाकालजीकी पूजाके लिये जानेका विचार किया। उस समय हनुमान्जीने उस लिंगको उठा लेनेकी चेष्टा की, किंतु उठानेमें समर्थ न हुए। तब वहाँ स्थित हुए महादेवजीने प्रत्यक्ष दर्शन दे वायुनन्दन हनुमान्से कहा—'हनुमन्! तुम इस क्षेत्रमें अपने नामसे मेरी स्थापना करके पूजन करो। यह शिवलिंग संसारमें हनुमत्केश्वरके नामसे प्रसिद्ध होगा।' तब हनुमान्जीने पर्वतके समान ऊँचे उस शिवलिंगको वहीं स्थापित कर दिया। जो मनुष्य शनिवारको हनुमत्केश्वर शिवका दर्शन करता है, उसे शत्रु का भय नहीं होता और वह संग्राममें विजय पाता है।
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- आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * १९९
महाकालकी परिक्रमा, यात्रा और विभिन्न देवताओंके दर्शनका माहात्म्य
सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी ! जो मनुष्य यमेश्वरका दर्शन करता और तिलमिश्रित जलसे उन्हें स्नान कराकर कुंकुमका अनुलेप दे कमल-पुष्पोंसे उनकी पूजा करता है, उसकी जहाँ कहीं भी मृत्यु क्यों न हुई हो, यमराज उसके लिये पिताके समान बर्ताव करनेवाले हो जाते हैं।
रुद्रसरोवर नामक तीर्थ तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। जो उस तीर्थमें स्नान करके कोटीश्वर शिवका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और भगवान् शिवके लोकमें जाता है। कोटि तीर्थमें पितरोंके उद्देश्यसे जो कुछ दिया जाता है, वह सब कोटिगुना होकर उन्हें मिलता है। कोटि तीर्थमें नहाकर जो अविनाशी परब्रह्मका चिन्तन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। कार्तिक अथवा वैशाखकी पूर्णिमाको सामयिक पुष्पों तथा सुन्दर वस्त्र एवं गन्ध आदिसे महादेवजीकी पूजा करे। कर्पूर, पुष्प, चन्दन तथा अगरु—इन सबको बराबर-बराबर लेकर सिलपर पीस ले और उसीका महाकालजीके श्रीअंगोंमें अनुलेपन करे। जो इस प्रकार उनकी आराधना करता है, वह उन्हींका पार्षद होता है।
रुद्रसरोवरमें स्नान करके कोटीश्वर शिवका दर्शन तथा वन्दन करनेके पश्चात् मनुष्य सनातन महाकालजीका दर्शन करनेके लिये जाय। गन्ध, पुष्प, नमस्कार आदि उपचारोंके द्वारा उन देवेश्वर शिवकी भलीभाँति आराधना करके प्रणाम करे। तत्पश्चात् कपालमोचन तीर्थको जाय। यह वही स्थान है, जहाँ देवेश्वर शिवने पृथ्वीपर कपाल रखा था। वहाँ कपाल रखते ही एक उत्तम शिवलिंग प्रकट हुआ, जो कपालमोचन कहलाया। वह सब पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ कृपणता छोड़कर सौ पल घीसे कपालमोचनको स्नान करावे। इतना सम्भव न हो तो पचास, पचीस अथवा साढ़े बारह पल घीसे भी स्नान करावे। जो ऐसा करता है, वह आयु पूर्ण होनेपर शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तत्पश्चात् नमस्कार करके उत्तम कपिलेश्वर तीर्थमें जाय। कपिलेश्वरजीके दर्शनसे ब्रह्महत्यारा भी मुक्त हो जाता है। वहाँसे हनुमत्केश्वर देवका दर्शन करनेके लिये एकाग्रचित्तसे जाय। व्यासजी ! हनुमत्केश्वरके दर्शनसे अतुल ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है। तदनन्तर सनातन पिप्पलाद महादेवजीके समीप जाय, जिनके दर्शनमात्रसे मुक्ति हो जाती है। तदनन्तर भक्ति और श्रद्धाके साथ स्वप्नेश्वरका दर्शन करनेके लिये जाय। स्वप्नेश्वरदेवके दर्शनसे दुःस्वप्नका नाश होता है। वहाँसे सब ओर मुखवाले विश्वतोमुख ईशान महादेवजीके पास जाय, जिनके दर्शनमात्रसे मनुष्य सम्पूर्ण विश्वका स्वामी होता है। तत्पश्चात् क्रोधको जीतकर इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए सोमेश्वरका दर्शन करनेके लिये जाय। उनके दर्शनसे मनुष्य कुष्ठ रोग आदि दोषोंसे मुक्त हो जाता है। व्यासजी ! वहाँसे एकाग्रचित्त होकर मनुष्य वैश्वानरेश्वरके समीप जाय। उनके दर्शनसे इहलोकमें मनुष्यका सदा अभ्युदय होता है। इसके बाद हाथमें बीजपूरक (बिजौरा नींबू) धारण करनेवाले लकुलीशके समीप जाय। उनके दर्शनसे रुद्रत्व प्राप्त होता है। तत्पश्चात् गणपेश्वर महादेवकी सेवामें जाय, जिनके दर्शनमात्रसे सब प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। वहाँसे वयोवृद्ध सनातन महाकालका दर्शन करनेके लिये जाय, जिनके दर्शनसे रोग, जरा और व्याधिका सर्वथा अभाव हो जाता है। तदनन्तर विघ्नोंका नाश करनेवाले प्राणीशदेवके समीप जाय और भक्तिपूर्वक एकाग्रचित्त हो सौ घड़ा जलसे उनको स्नान करावे। उनको स्नान करानेसे सब प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं और उनके दर्शनसे स्वर्ग मिलता है। तत्पश्चात् उसी मार्गमें प्राप्त होनेवाले दण्डपाणिजीके समीप जाय, जिनके दर्शनमात्रसे यमलोक नहीं देखना पड़ता। तदनन्तर भक्ति और
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श्रद्धाके साथ पुष्यदन्तका दर्शन करनेके लिये जाय। उनके दर्शनमात्रसे मनुष्य सब पातकोंसे छूट जाता है। तत्पश्चात् एकाग्रचित्त हो गुह्यमहाकालके समीप जाय, जिनके दर्शनमात्रसे मनुष्यको गुप्त पापोंसे छुटकारा मिल जाता है। वहाँसे उत्तम दुर्वासेश्वरके समीप जाय, जिनके दर्शनमात्रसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। दुर्वासेश्वरके समीप श्वास रोककर चले और महादुर्गा गौरीके पास जाकर श्वास छोड़े। इसके बाद एकाग्रचित्त होकर देवीकी पूजा करे। इसके अनन्तर कायेश्वर नामसे प्रसिद्ध देवाधिदेव महेश्वरके समीप जाय, जिनके दर्शनमात्रसे यमलोकको देखनेका अवसर नहीं आता। वहाँसे वधिरेश्वरका दर्शन करनेके लिये जाय, जिनके दर्शनमात्रसे बहरापन दूर हो जाता है। तत्पश्चात् यात्रेश्वरके समीप जाय, जो यात्राके पूर्ण फलको देनेवाले हैं। वहाँ अपने नाम, स्थान और गोत्रका उच्चारण करना चाहिये। यदि नामका उच्चारण न करे तो उसकी यात्रा निष्फल होती है। यात्रेश्वरदेवके आगे एकाग्रचित्त होकर बैठे और भक्तियुक्त होकर बार-बार नमस्कार करके स्तुति बोले। स्तुतिके पश्चात् इस प्रकार कहे—
मया समर्पिता यात्रा त्वत्प्रसादान्महेश्वर।
संसारसागराद् घोरान्मामुद्धर जगत्पते॥
'महेश्वर! मैंने आपकी ही कृपासे यह यात्रा पूरी करके आपके चरणोंमें समर्पित की है। जगत्पते! इस घोर संसार-सागरसे मेरा उद्धार कीजिये।'
जो इस विधिसे भगवान् महाकालकी प्रदक्षिणा करता है, उसके द्वारा सातों द्वीपोंसे युक्त समस्त पृथ्वीकी परिक्रमा हो जाती है। श्रेष्ठ ब्राह्मणको दो लाख गोदान करनेसे जो फल होता है, वही देवाधिदेव महाकालकी एक बार प्रदक्षिणा करनेसे मिल जाता है। महाकालकी प्रदक्षिणा बड़ी भक्तिके साथ करनी चाहिये। इससे पग-पगपर अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है। यह मुझसे साक्षात् भगवान् शंकरने कहा है। जो इस प्रकार भगवान् शिवका चिन्तन करते हुए यात्रा पूरी करता है और वस्त्रसहित दक्षिणा देता है, वह सात जन्मोंमें किये हुए समस्त पापोंसे छूट जाता है। इस तरह यात्रा समाप्त करके मनुष्य अपने घर जाय और यात्रामें जो मुख्य-मुख्य देवता आते हैं, उनकी संख्याके अनुसार छब्बीस श्रेष्ठ ब्राह्मणों तथा शिवध्यानपरायण शिवभक्तोंको भोजन करावे। फिर वस्त्रसहित दक्षिणा देकर उनसे आशीर्वाद ले उन्हें विदा करे। तदनन्तर सब भृत्यवर्गके साथ स्वयं भोजन करे। दीनों, अनाथों, दरिद्रों, अन्धों और अंगविकल मनुष्योंको भी भोजन करावे। यह सब करनेसे एकाग्रचित्तवाला मनुष्य माता-पिताकी सौ पीढ़ियोंका उद्धार करके शिवलोकमें आनन्दका अनुभव करता है।
वाल्मीकिकी तपस्या और वाल्मीकेश्वरकी महिमा
सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! जो मौन और ध्यानपरायण होकर भक्तिपूर्वक वाल्मीकेश्वर देवका पूजन करता है, वह उत्तम कवित्व-शक्तिको प्राप्त होता है।
व्यासजीने पूछा—भगवन्! भगवान् वाल्मीकेश्वर कौन हैं और वे यहाँ किस प्रकार प्रकट हुए हैं?
सनत्कुमारजीने कहा—विप्रवर! प्राचीन कालमें सुमति नामक एक भृगुवंशी ब्राह्मण थे। उनकी पत्नी कौशिकवंशकी कन्या थीं। सुमतिके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम अग्निशर्मा रखा गया। वह पिताके बार-बार कहनेपर भी वेदाभ्यासमें मन नहीं लगाता था। एक बार उसके देशमें बहुत दिनोंतक वर्षा नहीं हुई। उस समय बहुत लोग दक्षिण दिशामें चले गये। विप्रवर सुमति भी अपने पुत्र और स्त्रीके साथ विदिशाके वनमें चले गये और वहाँ आश्रम बनाकर रहने लगे। वहाँ अग्निशर्माका लुटेरोंसे साथ हो गया; अतः जो भी उस मार्गसे आता, उसे वह पापात्मा मारता और लूट लेता था। उसको अपने ब्राह्मणत्वकी स्मृति नहीं रही। वेदका अध्ययन जाता रहा, गोत्रका
- आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९२१
ध्यान चला गया और वेद-शास्त्रोंकी सुधि भी जाती रही। किसी समय तीर्थयात्राके प्रसंगसे उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सप्तर्षि उस मार्गपर आ निकले। अग्निशर्माने उन्हें देखकर मारनेकी इच्छासे कहा—'ये सब वस्त्र उतार दो, छाता और जूता भी रख दो।' उसकी यह बात सुनकर अत्रि बोले—'तुम्हारे हृदयमें हमें पीड़ा देनेका विचार कैसे उत्पन्न हो रहा है? हम तपस्वी हैं और तीर्थयात्राके लिये जा रहे हैं।'
अग्निशर्माने कहा—मेरे माता-पिता, पुत्र और पत्नी हैं। उन सबका पालन-पोषण मैं ही करता हूँ। इसलिये मेरे हृदयमें यह विचार प्रकट हुआ है।
अत्रि बोले—तुम अपने पितासे जाकर पूछो तो सही कि मैं आपलोगोंके लिये पाप करता हूँ, यह पाप किसको लगेगा। यदि वे यह पाप करनेकी आज्ञा न दें, तब तुम व्यर्थ प्राणियोंका वध न करो।
अग्निशर्मा बोला—अबतक तो कभी मैंने उन लोगोंसे ऐसी बात नहीं पूछी थी। आज आपलोगोंके कहनेसे मेरी समझमें यह बात आयी है। अब मैं उन सबसे जाकर पूछता हूँ। देखूँ किसका कैसा भाव है? जबतक मैं लौटकर नहीं आता, तबतक आपलोग यहीं रहें।
ऐसा कहकर अग्निशर्मा तुरंत अपने पिताके समीप गया और बोला—'पिताजी! धर्मका नाश करने और जीवोंको पीड़ा देनेसे बड़ा भारी पाप देखा जाता है (और मुझे जीविकाके लिये यही सब पाप करना पड़ता है)। बताइये, यह पाप किसको लगेगा?' पिता और माताने उत्तर दिया—'तुम्हारे पापसे हम दोनोंका कोई सम्बन्ध नहीं है। तुम करते हो, अतः तुम जानो। जो कुछ तुमने किया है, उसे फिर तुम्हें ही भोगना पड़ेगा।' उनका यह वचन सुनकर अग्निशर्माने अपनी पत्नीसे भी पूर्वोक्त बात पूछी। पत्नीने भी यही उत्तर दिया—'पापसे मेरा सम्बन्ध नहीं है, सब पाप तुम्हें ही लगेगा।' फिर उसने अपने पुत्रसे पूछा। पुत्र बोला—'मैं तो अभी बालक हूँ (मेरा आपके पापसे क्या सम्बन्ध?)।' उनकी बातचीत और व्यवहारको ठीक-ठीक समझकर अग्निशर्मा मन-ही-मन बोला—'हाय! मैं तो नष्ट हो गया। अब वे तपस्वी महात्मा ही मुझे शरण देनेवाले हैं।' फिर तो उसने उस डंडेको दूर फेंक दिया, जिससे कितने ही प्राणियोंका वध किया था और सिरके बाल बिखराये हुए वह तपस्वी महात्माओंके आगे जाकर खड़ा हुआ। वहाँ उनके चरणोंमें दण्डवत्-प्रणाम करके बोला—'तपोधनो! मेरे माता, पिता, पत्नी और पुत्र कोई नहीं हैं। सबने मुझे त्याग दिया है, अतः मैं आपलोगोंकी शरणमें आया हूँ। अब उत्तम उपदेश देकर आप नरकसे मेरा उद्धार करें।'
उसके इस प्रकार कहनेपर ऋषियोंने अत्रिजीसे कहा—मुने! आपके कथनसे ही इसको बोध प्राप्त हुआ है, अतः आप ही इसे अनुगृहीत करें। यह आपका शिष्य हो जाय। 'तथास्तु' कहकर अत्रिजी अग्निशर्मासे बोले—'तुम इस वृक्षके नीचे बैठकर इस प्रकार ध्यान करो। इस ध्यानयोगसे और महामन्त्र (रामनाम)-के जपसे तुम्हें परम सिद्धि प्राप्त होगी।' ऐसा कहकर वे सब ऋषि यथेष्ट स्थानको चले गये। अग्निशर्मा तेरह वर्षोंतक मुनिके बताये अनुसार ध्यानयोगमें संलग्न रहा। वह अविचल भावसे बैठा रहा और उसके ऊपर बाँबी जम गयी। तेरह वर्षोंके बाद जब वे सप्तर्षि पुनः उसी मार्गसे लौटे, तब उन्हें वल्मीकमेंसे उच्चारित होनेवाली रामनामकी ध्वनि सुनायी पड़ी। इससे उनको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने काठकी कीलोंसे वह बाँबी खोदकर अग्निशर्माको देखा और उसे उठाया। उठकर उसने उन सभी श्रेष्ठ मुनियोंको, जो तपस्याके तेजसे उद्भासित हो रहे थे, प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'मुनिवरो! आपके ही प्रसादसे आज मैंने शुभ ज्ञान प्राप्त किया है। मैं पाप-पंकमें डूब रहा था, आपने मुझ दीनका उद्धार कर दिया है।'
उसकी यह बात सुनकर परम धर्मात्मा सप्तर्षि बोले—वत्स! तुम एकचित्त होकर दीर्घकालतक
९२२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
वल्मीक (बाँबी) में बैठे रहे हो, अतः इस पृथ्वीपर तुम्हारा नाम 'वाल्मीकि' होगा। यों कहकर वे तपस्वी मुनि अपनी गन्तव्य दिशाकी ओर चल दिये। उनके चले जानेपर तपस्वीजनोंमें श्रेष्ठ वाल्मीकिने कुशस्थलीमें आकर महादेवजीकी आराधना की और उनसे कवित्वशक्ति पाकर एक मनोरम काव्यकी रचना की, जिसे 'रामायण' कहते हैं और जो कथा-साहित्यमें सबसे प्रथम माना गया है।
व्यासजी! तभीसे अवन्तीमें वाल्मीकेश्वर शिवकी ख्याति हुई, जो मनुष्योंको कवित्वशक्ति देनेवाले हैं।
शुक्रेश्वर आदिके पूजनकी महिमा, पंचेशानी यात्राका माहात्म्य तथा पद्मावती आदिके दर्शनका फल
सनत्कुमारजी कहते हैं—श्वेत पुष्प और चन्दनसे शुक्रेश्वरकी पूजा करके उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणाम करनेसे मनुष्य रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। व्यासजी! भीमेश्वरका दर्शन और भक्तिसे उनका पूजन करके मनुष्य युद्धमें, रात्रिमें, जलमें और अग्निमें कहीं भी भयको प्राप्त नहीं होता। जो मनुष्य तिलके तेलसे गर्गेश्वरको स्नान कराकर बिल्वपत्रसे उनका पूजन करता है, उसके धर्मकी वृद्धि होती है। जो चतुर्दशीको उपवास करके एक प्रस्थ तिलके जलसे गर्गेश्वरको नहलाकर तिलोंसे ही उनकी पूजा करता है, वह सदा सौख्यका भागी होता है। कामेश्वरका कुंकुम, चन्दन आदिसे भलीभाँति पूजन करके मनुष्य इच्छानुसार चलनेवाले विमानके द्वारा निःसन्देह स्वर्गलोकको जाता है। कार्तिक शुक्लपक्षकी नवमी तिथिमें चूडामणि देवको नमस्कार करके मनुष्य कभी विपरीत योनिमें नहीं जाता और उसकी बुद्धि सदा धर्ममें लगी रहती है। कृष्णपक्षकी अष्टमीको उपवास करके जो मनुष्य चण्डेश्वरजीकी पूजा करता है, वह निर्माल्य-लंघनजनित पाप-तापसे कभी लिप्त नहीं होता। महादेवजीके इन सब पवित्र तीर्थोंकी यात्रा करके विशुद्ध चित्तवाला मनुष्य सदाशिवके मनोहर धामको प्राप्त होता है।
जो मानव इस महाकाल-क्षेत्रमें निवास करते हैं, वे मृत्युके पश्चात् समस्त कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले विमानोंद्वारा रुद्रलोकको जाते हैं। कृष्णपक्षकी चतुर्दशी अथवा अमावास्याको एक दिन उपवास करके जो मनुष्य महेश्वरके ध्यानपूर्वक प्रतिलोम और अनुलोम-क्रमसे पंचेशानी यात्रा करते हुए पाँचों ईशान-विग्रहोंको नमस्कार करता है, वह बहुत जन्मोंके किये हुए समस्त पापोंसे छुटकारा पा जाता है और वह इसी शरीरसे रुद्रलोकको जाता है।
पंचेशानी यात्रा इस प्रकार की जाती है—एकादशीको प्रातःकाल एकाग्रचित्त हो रुद्रसरोवरमें स्नान करे। तत्पश्चात् श्राद्ध करके महाकालेश्वरको प्रणाम करे। फिर पिंगलेश्वरके समीप जाकर वहाँ स्नान और श्राद्ध करे। तदनन्तर पिंगलेश्वर गणेशजीके समीप जाकर गन्ध, पुष्प और धूप आदिसे उनका पूजन करे। वहाँसे लौटकर फिर महाकालेश्वरके समीप आकर स्नान करे। स्नानके पश्चात् जितेन्द्रिय पुरुष स्वयं प्रकट हुए सनातन देवदेवेश्वर महाकालका पूजन करे। वहीं ईशानके समीप रात्रिमें भोजन करके महेश्वरका ध्यान करते हुए भूमिपर शयन करे। इस प्रकार रात्रि बितानेके अनन्तर द्वादशीको प्रातःकाल उठकर स्नानके पश्चात् पूर्ववत् सब कुछ करे। कायावरोहणतीर्थमें जाकर पिंगलेश्वरकी ही भाँति पूजा करे। इसी प्रकार त्रयोदशीको भी यात्रा करके पश्चिममें बिल्वेश्वरका पूजन करे। चतुर्दशीको उत्तर दिशामें उत्तरेश्वरका पूजन करे। फिर अमावास्यामें स्नान करके पवित्र हो महाकालेश्वरके समीप जाकर गन्ध, पुष्प, धूप और भाँति-भाँतिके नैवेद्योंद्वारा उनका पूजन करे। गीत, नृत्य
* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * १२३
आदि एवं प्रणाम करके उनसे क्षमा-प्रार्थना करे। | फूलोंसे अमरावती देवीका पूजन करता है, वह इस प्रकार यात्रा करके अपने घर जाय और | स्वर्गमें देवताओंके साथ सदा आनन्द भोगता वहाँ शिवभक्तिपरायण पाँच ब्राह्मणोंको भोजन | है। जो एकाग्रचित्त हो भक्तिपूर्वक उज्जयिनी करावे। व्यासजी! जो मनुष्य ऐसा करता है, | देवीका दर्शन करता है, वह रुद्रलोकमें सम्पूर्ण वह स्वर्गलोकमें आनन्दका भागी होता है। | ऐश्वर्योंसे सम्पन्न हो प्रतिष्ठित होता है। जो जो नियमपूर्वक कुशस्थलीकी परिक्रमा करता | भगवान् शिवमें भक्ति रखते हुए विशाला देवीका है, उसके द्वारा सात द्वीपोंवाली वसुन्धराकी | दर्शन करता है, वह कायिक, वाचिक और परिक्रमा हो जाती है। जो मनुष्य पद्मावतीजीका | मानसिक त्रिविध पापोंसे मुक्त हो जाता है। दर्शन और कमलके पुष्पोंद्वारा उनका पूजन करता | कृष्ण पक्षकी अष्टमी तिथिको उपवास करके तथा धूप और नैवेद्य चढ़ाता है, वह मृत्युके | जितेन्द्रिय, पवित्र एवं जितात्मा होकर किसीके पश्चात् ब्रह्मलोकमें जाता है। जो सुवर्णके समान | साथ भी वार्तालाप न करे—मौन रहे। इस प्रकार पीले रंगवाले पुष्पोंसे महाभक्तिपूर्वक स्वर्णशृंगाटिका | रहकर जो अक्रूरेश्वर देवका दर्शन और पूजन देवीकी पूजा करता है, वह शिवलोकको जाता | करता है, वह रुद्रलोकको प्राप्त होता है। जो है। जो त्रिभुवन-विख्यात अवन्ती देवीका दर्शन | स्नान करके पवित्र हो, इन्द्रियोंको वशमें रखते करता है, वह इच्छानुसार चलनेवाले विमानद्वारा | हुए ब्रह्माजीका दर्शन करता है, वह घोर पातकसे इन्द्रलोकको जाता है। जो भक्तिपूर्वक कमलके | मुक्त हो ब्रह्मलोकको जाता है।
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अंकपादतीर्थकी महिमा, श्रीकृष्णके द्वारा मरे हुए गुरुपुत्रके लाये जानेकी कथा
सनत्कुमारजी कहते हैं—जहाँ भगवान् | प्रकट हुए थे। उन दोनोंका रूप दिव्य था। दोनों महाकाल हैं, शिप्रा नदी है, अत्यन्त निर्मल गति | ही बड़े तेजस्वी पुरुष थे। यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णने प्राप्त होती है और जिस उज्जयिनीमें विशालाक्षी | कंस और चाणूरको मारकर उग्रसेनको यदुकुलके देवीका दर्शन प्राप्त होता है, वहाँका निवास किसको | राजपर अभिषिक्त किया और पूछा—'राजन्! अब नहीं भाता है। जो मनुष्य महानदी शिप्रा में स्नान | मेरे लिये क्या आज्ञा है?' उनके ऐसा कहनेपर करके भगवान् महाकालको नमस्कार करता है, वह | राजा उग्रसेन बोले—'कृष्ण! मेरा सब कार्य सिद्ध मृत्युका शोक नहीं करता। महाकाल क्षेत्रमें मरा | है, तुम्हारे रहते मेरे लिये कोई भी वस्तु दुर्लभ हुआ कीट और पतंग भी भगवान् शिवका सेवक | नहीं है। अब तुम दोनों उज्जयिनी पुरीमें जाकर होता है। अवन्तीमें अंकपाद नामक तीर्थके भीतर | विद्या पढ़ो।' राजाका यह आदेश पाकर बलराम श्रीबलराम और श्रीकृष्णका दर्शन करे। उन दोनोंके | और श्रीकृष्ण आचार्य सान्दीपनि मुनिके घर गये। दर्शनमात्रसे मनुष्य यमलोकको नहीं देखता। | वहाँ जाकर उन्होंने चारों वेदोंको कण्ठस्थ किया, व्यासजीने पूछा—महामुने! वे दोनों बलराम | सम्पूर्ण आचार-विचारका ज्ञान प्राप्त किया और और श्रीकृष्ण अंकपाद नामक तीर्थमें कैसे गये? | रहस्य तथा संहारसहित धनुर्वेदकी शिक्षा प्राप्त सनत्कुमारजीने कहा—मुने! बलराम और | की। यह सारा ज्ञान उन्होंने चौंसठ दिन-रातमें ही श्रीकृष्ण—ये दोनों भाई भगवान्के अवतार थे | प्राप्त कर लिया। सान्दीपनि मुनिने उन दोनोंका और इस पृथ्वीका भार उतारनेके लिये यदुकुलमें | यह असम्भव एवं अलौकिक कर्म देखकर सोचा,