संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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केदारेश्वर लिंगकी माहात्म्य-कथा
पार्वतीजी बोलीं—करुणानिधान ! अब अपने भक्तोंपर कृपा करके केदारका माहात्म्य कहिये।
श्रीमहादेवजीने कहा—पार्वती ! प्राचीन कालकी बात है। उज्जयिनीपुरीसे एक ब्राह्मण यहाँ आया था। पिताने उसका उपनयन-संस्कार कर दिया था और वह ब्रह्मचर्य व्रतका पालन करता था। काशीपुरीका सब ओरसे अवलोकन करके उसके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई और उसने हिरण्यगर्भ नामक आचार्यसे पाशुपत नामक उत्तम व्रतकी दीक्षा ली। उसका नाम वशिष्ठ था। हिरण्यगर्भका वह शिष्य सब पाशुपतोंमें श्रेष्ठ हुआ। प्रतिदिन हरपाप नामक कुण्डमें प्रातःकाल स्नान करके तीनों कालमें वह शिवलिंगकी पूजा करता और नित्यप्रति विभूतिसे स्नान करता (सर्वांगमें विभूति लगाता) था। वह शिवलिंग तथा गुरुमें भेद नहीं मानता था। वशिष्ठकी अवस्था बारह वर्षकी थी, उसी समय वह अपने गुरुके साथ केदारतीर्थकी यात्रा करनेके लिये हिमालय पर्वतको गया। असिधार पर्वतपर पहुँचकर तपस्वी वशिष्ठके गुरु हिरण्यगर्भकी मृत्यु हो गयी। उस समय भगवान् शंकरके पार्षद आये और अन्य तपस्वियोंके देखते-देखते हिरण्यगर्भको विमानपर बिठाकर प्रसन्नतापूर्वक कैलासधामको ले गये। यह देखकर तपस्वी वशिष्ठने सब लिंगोंमें केदारलिंगको ही श्रेष्ठ माना। तदनन्तर केदार क्षेत्रकी यात्रा पूरी करके वह काशीपुरीमें लौट आया। यहाँ आकर उसने यह प्रतिज्ञा की कि 'मैं जबतक जीवित रहूँगा, तबतक काशीपुरीमें निवास करता हुआ प्रत्येक चैत्र मासकी पूर्णिमाको भगवान् केदारका अवश्य दर्शन करूँगा।' इस निश्चयके अनुसार उसने बड़े आनन्दके साथ सदा ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक काशीमें निवास करते हुए हिमालयवर्ती केदार क्षेत्रकी इकसठ यात्राएँ पूरी कीं। तदनन्तर चैत्रमास निकट आनेपर उसने पुनः बड़े उत्साहके साथ यात्रा प्रारम्भ की। यद्यपि उसके सिरके बाल सफेद हो गये थे और शरीरपर वृद्धावस्थाका पूरा प्रभाव पड़ चुका था तथा उसके संगी-साथी तपस्वी जनोंने उसे करुणापूर्ण हृदयसे रोका भी, तो भी स्थिर चित्तवाले वशिष्ठका उत्साह भंग नहीं हुआ। उसने सोच लिया था कि 'यदि बीच रास्तेमें मृत्यु हो गयी तो गुरुजीकी तरह मेरी भी गति होगी।' देवि ! तपस्वी वशिष्ठके चित्तकी यह दृढ़ता देख मैं उसपर बहुत सन्तुष्ट हुआ और स्वप्नमें उसे दर्शन देकर कहा—'दृढ़व्रत ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, मुझको ही केदार समझो और मुझसे मनोवांछित वर माँगो। किसी प्रकारका अन्यथा विचार मनमें न लाओ।'
मेरे इस प्रकार कहनेपर वशिष्ठने कहा—देवेश्वर ! यदि आप प्रसन्न हैं तो यहाँ मेरे साथ रहनेवाले जितने लोग हैं इन सबपर अनुग्रह करें। उस परोपकारीका यह वचन सुनकर मेरी प्रसन्नता और भी बढ़ गयी और मैंने कहा 'तथास्तु' ऐसा ही होगा। फिर उसके परोपकारजनित पुण्यसे उसकी तपस्याको मैंने द्विगुणित कर दिया और पुनः उससे वर माँगनेके लिये कहा। तब वशिष्ठने यह प्रार्थना की कि 'आप हिमालयसे यहीं आकर रहें।' उसकी तपस्यासे आकृष्ट होकर मैं कलामात्रसे हिमालयपर रहकर सर्वतोभावेन यहाँ काशीमें आकर बस गया। वशिष्ठको उसके साथियोंसहित आगे करके मैं यहाँ आया और उसपर अनुग्रह करके हरपापकुण्ड-तीर्थके समीप स्थित हुआ। मेरे निवाससे सब लोग हरपापकुण्डमें स्नान, सन्ध्या, तर्पण आदि करके इसी शरीरसे सिद्धिको प्राप्त हो चुके हैं। तभीसे मैं साधकोंकी सिद्धिके लिये परम उत्तम अविमुक्त क्षेत्रमें इस केदार लिंगमें स्थित हुआ हूँ। हिमालयपर चढ़कर केदार-शिवका दर्शन करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वही काशीमें केदारका दर्शन करनेपर सातगुना होकर मिलता है। हरपापतीर्थ सात जन्मोंके पापोंका नाश करनेवाला