संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * — ९५९
| वेणुवादी च नादी च नृत्यगीतविशारदः।<br>गोपीमोहकरो गानी रासको रजनीचरः॥<br>धेनुकारि, महावीर, गोपकन्याविदूषक, काममानहर, कामी, गोपीवासोऽपतस्कर, वेणुवादी, नादी, नृत्यगीत-विशारद, गोपीमोहकर, गानी, रासक, रजनीचर। | सत्यवादी, शुचिव्रत। |
| दिव्यमाली विमाली च वनमालाविभूषितः।<br>कैटभारिश्च कंसारिर्मधुहा मधुसूदनः॥<br>चाणूरमर्दनो मल्लो मुष्टिमुष्टिकनाशकृत्।<br>मुरहा मोदको मोदी मदघ्नो नरकान्तकृत्॥<br>दिव्यमाली, विमाली, वनमालाविभूषित, कैटभारि, कंसारि, मधुहा, मधुसूदन, चाणूरमर्दन, मल्ल, मुष्टिमुष्टिकनाशकृत्, मुरहा, मोदक, मोदी, मदघ्न, नरकान्तकृत्। | नकुलः सहदेवश्च कर्णो दुर्योधनो घृणी।<br>गाङ्गेयोऽथ गदापाणिर्भीष्मो भागीरथीसुतः॥<br>प्रज्ञाचक्षुर्धृतराष्ट्रो भारद्वाजोऽथ गौतमः।<br>अश्वत्थामा विकर्णश्च जह्नुर्युद्धविशारदः॥<br>नकुल, सहदेव, कर्ण, दुर्योधन, घृणी, गांगेय, गदापाणि, भीष्म, भागीरथीसुत, प्रज्ञाचक्षु, धृतराष्ट्र, भारद्वाज, गौतम, अश्वत्थामा, विकर्ण, जह्नु, युद्धविशारद। |
| विद्याध्यायी भूमिशायी सुदाम्नश्च सखा सुखी।<br>सकलोऽविकलो वैद्यः कलितो वै कलानिधिः॥<br>विद्याशाली विशाली च पितृमातृविमोक्षकः।<br>रुक्मिणीरमणो रम्यः कालिन्दीपति शङ्खहा॥<br>विद्याध्यायी, भूमिशायी, सुदामसखा, सुखी, सकल, अविकल, वैद्य, कलित, कलानिधि, विद्याशाली, विशाली, पितृमातृविमोक्षक, रुक्मिणी-रमण, रम्य, कालिन्दीपति, शंखहा। | सीमन्तिको गदी गाल्वो विश्वामित्रो दुरासदः।<br>दुर्वासा दुर्विनीतश्च मार्कण्डेयो महामुनिः॥<br>लोमशो निर्मलोऽलोमी दीर्घायुश्च चिरोऽचिरी।<br>पुनर्जीव्यमृतो भावी भूतो भव्यो भविष्यकः॥<br>सीमन्तिक, गदी, गाल्व, विश्वामित्र, दुरासद, दुर्वासा, दुर्विनीत, महामुनि मार्कण्डेय, लोमश, निर्मल, अलोमी, दीर्घायु, चिर, अचिरी, पुनर्जीवी, अमृत, भावी, भूत, भव्य, भविष्यक। |
| पाञ्चजन्यो महापद्मो बहुनायकनायकः।<br>धुन्धुमारो निकुम्भघ्नः शम्बरान्तो रतिप्रियः॥<br>प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च सात्वतां पतिरर्जुनः।<br>फाल्गुनश्च गुडाकेशः सव्यसाची धनञ्जयः॥<br>पांचजन्य, महापद्म, बहुनायकनायक, धुन्धुमार, निकुम्भघ्न, शम्बरान्त, रतिप्रिय, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, सात्वतांपति, अर्जुन, फाल्गुन, गुडाकेश, सव्यसाची, धनंजय। | त्रिकालोऽथ त्रिलिंगश्च त्रिनेत्रस्त्रिपदीपतिः।<br>यादवो याज्ञवल्क्यश्च यदुवंशविवर्धनः॥<br>शल्यक्रीडी विक्रीडश्च यादवान्तकरः कलिः।<br>सदयो हृदयो दायो दायदो दायभाग् दयी॥<br>त्रिकाल, त्रिलिंग, त्रिनेत्र, त्रिपदीपति, यादव, याज्ञवल्क्य, यदुवंशविवर्धन, शल्यक्रीडी, विक्रीड, यादवान्तकर, कलि, सदयहृदय, दाय, दायद, दायभाक्, दयी। |
| किरीटी च धनुष्पाणिर्धनुर्वेदविशारदः।<br>शिखण्डी सात्यकिः शैव्यो भीमो भीमपराक्रमः॥<br>पाञ्चालश्चाभिमन्युश्च सौभद्रो द्रौपदीपतिः।<br>युधिष्ठिरो धर्मराजः सत्यवादी शुचिव्रतः॥<br>किरीटी, धनुष्पाणि, धनुर्वेदविशारद, शिखण्डी, सात्यकि, शैव्य, भीम, भीमपराक्रम, पांचाल, अभिमन्यु, सौभद्र, द्रौपदीपति, युधिष्ठिर, धर्मराज, | महोदधिर्महीपृष्ठो नीलपर्वतवासकृत्।<br>एकवर्णो विवर्णश्च सर्ववर्णबहिश्चरः॥<br>यज्ञनिन्दी वेदनिन्दी वेदबाह्यो बलो बलिः।<br>बौद्धारिर्बाधको बाधो जगन्नाथो जगत्पतिः॥<br>महोदधि, महीपृष्ठ, नीलपर्वतवासकृत्, एकवर्ण, विवर्ण, सर्ववर्णबहिश्चर, यज्ञनिन्दी, वेदनिन्दी, वेदबाह्य, बल, बलि, बौद्धारि, बाधक, बाध, जगन्नाथ, जगत्पति। |
| भक्तिर्भागवतो भागी विभक्तो भगवत्प्रियः।<br>त्रिग्रामोऽथ नवारण्यो गुह्योपनिषदासनः॥<br>शालग्रामशिलायुक्तो विशालो गण्डकाश्रयः।<br>श्रुतदेवः श्रुतः श्रावी श्रुतबोधः श्रुतश्रवाः॥ |
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