भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 989
९६०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

भक्ति, भागवत, भागी, विभक्त, भगवत्प्रिय, त्रिग्राम, निवारण्य, गुह्योपनिषदासन, शालग्राम-शिलायुक्त, विशाल, गण्डकाश्रय, श्रुतदेव, श्रुत, श्रावी, श्रुतबोध, श्रुतश्रवा।

कल्किः कालकलः कल्को दुष्टम्लेच्छविनाशकृत्।
कुङ्कुमी धवलो धीरः क्षमाकरो वृषाकपिः॥
किङ्करः किन्नरः कण्वः केकी किम्पुरुषाधिपः।
एकरोमा विरोमा च बहुरोमा बृहत्कविः॥
कल्कि, कालकल, कल्क, दुष्टम्लेच्छविनाशकृत्, कुंकुमी, धवल, धीर, क्षमाकर, वृषाकपि, किंकर, किन्नर, कण्व, केकी, किम्पुरुषाधिप, एकरोमा, विरोमा, बहुरोमा, बृहत्कवि।

वज्रप्रहरणो वज्री वृत्रघ्नो वासवानुजः।
बहुतीर्थकरस्तीर्थः सर्वतीर्थजनेश्वरः॥
व्यतीपातोपरागश्च दानवृद्धिकरः शुभः।
असंख्येयोऽप्रमेयश्च संख्याकारो विसंख्यकः॥
वज्रप्रहरण, वज्री, वृत्रघ्न, वासवानुज, बहुतीर्थकर, तीर्थ, सर्वतीर्थजनेश्वर, व्यतीपातोपराग, दानवृद्धिकर, शुभ, असंख्येय, अप्रमेय, संख्याकार, विसंख्यक।

मिहिकोत्तारकस्तारो बालचन्द्रः सुधाकरः।
किंवर्णः कीदृशः किञ्चित्किंस्वभावः किमाश्रयः॥
निर्लोकश्च निराकारी बह्वाकारैककारकः।
दौहित्रः पुत्रकः पौत्रो नप्ता वंशधरो धरः॥
मिहिकोत्तारक, तार, बालचन्द्र, सुधाकर, किंवर्ण, कीदृश, किंचित्, किंस्वभाव, किमाश्रय, निर्लोक, निराकारी, बह्वाकारैककारक, दौहित्र, पुत्रक, पौत्र, नप्ता, वंशधर, धर।

द्रवीभूतो दयालुश्च सर्वसिद्धिप्रदो मणिः।
आधारोऽपि विधारश्च धरासूनुः सुमंगलः॥
मंगलो मंगलाकारो माङ्गल्यः सर्वमंगलः॥
द्रवीभूत, दयालु, सर्वसिद्धिप्रद, मणि, आधार, विधार, धरासूनु, सुमंगल, मंगल, मंगलाकार, मांगल्य, सर्वमंगल।

नाम्नां सहस्रं नामेदं विष्णोरतुलतेजसः।
सर्वसिद्धिकरं काम्यं पुण्यं हरिहरात्मकम्॥
यः पठेत्प्रातरुत्थाय शुचिर्भूत्वा समाहितः।
यश्चेदं शृणुयान्नित्यं नरो निश्चलमानसः।
त्रिसन्ध्यं श्रद्धया युक्तः सर्वपापैः प्रमुच्यते॥

अतुल तेजस्वी भगवान् विष्णुका यह सहस्रनामस्तोत्र पुण्यमय तथा हरिहरस्वरूप है। यह सब सिद्धियोंका दाता तथा मनोवांछित कामनाकी पूर्ति करनेवाला है। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर एकाग्र एवं स्थिरचित्त हो इस स्तोत्रका पाठ करता है तथा जो तीनों समय श्रद्धापूर्वक इसका श्रवण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।

जो भक्तिमान् एवं जितेन्द्रिय पुरुष तुलसीके बगीचेमें या तुलसीवृक्षके समीप, सरोवरके तटपर, देवमन्दिरमें, बदरिकाश्रम तीर्थके शुभ प्रदेशमें, हरिद्वारमें, तपोवनमें, मधुवन, प्रयाग, द्वारका एवं महाकाल वनमें एकाग्रचित्त हो, नियमपूर्वक इस विष्णुसहस्रनामस्तोत्रका सौ बार पाठ करते हैं, वे समस्त कामनाओंके इच्छुक होकर भी सिद्धिलाभ करते हैं तथा लोकमें दूसरोंके लिये भी सिद्धिदायक बनकर सब ओर विचरते रहते हैं। परस्परकी फूटसे जो अलग-अलग हो गये हैं, उनमें मैत्री करानेका यह सर्वोत्तम साधन है। मोहनेवाली शक्तियोंको भी यह मोहनेवाला है। साथ ही परम पवित्र और समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। बालग्रहोंका विनाशक तथा शान्तिका उत्तम उपाय है। जो मनुष्य आहार, क्रोध और इन्द्रियोंको जीतकर पवित्र भावसे एकान्तमें बैठकर भगवान् विष्णुके समीप इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह पीताम्बरधारी चतुर्भुजरूप धारण करके गरुड़की पीठपर बैठकर भगवान् विष्णुके धाममें जाता है।

पाठके पश्चात् निम्नांकित श्लोक पढ़कर भगवान् विष्णुको प्रणाम करना चाहिये—

सहस्राक्षः सहस्राङ्घ्रिः सहस्रवदनोज्ज्वलः।
सहस्रनामानन्ताक्षः सहस्रभुज ते नमः॥

'हे सहस्रभुजाधारी नारायण! आपके सहस्रों नेत्र और सहस्रों चरण हैं। आप सहस्रों तेजस्वी