संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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नाप लिया। पर्वत, वन और काननोंसहित यह पृथ्वी तथा अन्य लोक सब भगवान्के ढाई पगमें ही आ गये। उस समय शेष आधे पगकी पूर्तिके लिये बलिने अपना शरीर भी भगवान्को समर्पित कर दिया।
इस प्रकार समस्त असुरोंको जीतकर और इन्द्रको राज्य देकर वामनजी कुमुद्वतीपुरीमें गये। वहाँ ऋद्धि-सिद्धि देनेवाले पुण्यमय प्रदेशमें अपने लिये एक तीर्थका निर्माण करके उन्होंने वहीं निवास किया। वामनजीने जो तीर्थ निर्माण किया, उसे वामनकुण्ड कहते हैं। भाद्रपद शुक्ल पक्षमें श्रवण नक्षत्रयुक्त द्वादशी तिथि वामनद्वादशी कहलाती है। वह करोड़ों हत्याओंका पाप नष्ट करनेवाली है। जो मनुष्य एकादशी तिथिको यहाँ उपवास करके रात्रिमें जागरण करते और द्वादशीको बड़े-बड़े दान देते हैं, वे ब्रह्मभावको प्राप्त होते हैं। उनके लिये तीनों लोकोंमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है।
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भैरवतीर्थ और नागतीर्थकी महिमा
**सनत्कुमारजी कहते हैं—**मुनिवर! पूर्वकालमें कालचक्रके द्वारा कुछ कृत्याएँ प्रकट की गयी थीं, जो योगिनीगणके नामसे प्रसिद्ध थीं। उन्हीं योगिनियोंमें काली नामसे प्रसिद्ध एक योगिनी थी, जो बहुत उत्तम स्वभावकी थी। उसने भैरवजीको सदा अपने पुत्रकी भाँति पाला था। भैरवने उस क्षेत्रके समस्त दोष और उत्पात नष्ट कर दिये थे। महामारी, पूतना, कृत्या, शकुनि, रेवती, खला, कोटरी, तामसी और माया—ये नौ मातृकाएँ मानी गयी हैं। ये सब-की-सब दुष्ट दोषकी प्राप्ति करानेवाली दुष्ट स्वभावकी तथा समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर हैं। समस्त कामनाओं तथा वरोंको देनेवाले धर्मात्मा भैरवने इन सबको वशमें किया। वे भैरवजी शिप्रा नदीके उत्तर तटपर सदा स्थित रहते हैं। आषाढ़मासके शुक्ल पक्षमें रविवारके दिन अष्टमी, नवमी अथवा विशेषतः चतुर्दशी तिथिका योग पाकर जो मनुष्य एकाग्र एवं स्थिरचित्त होकर उनकी पूजा करते हैं, वे परम कल्याणके भागी होते हैं। जिनके नेत्र निर्मल कमलके समान सुन्दर हैं, जिन्होंने मस्तकपर चन्द्रमाका मनोहर मुकुट धारण कर रखा है, जो सब गुणोंसे श्रेष्ठ हैं, सबके सन्तापका निवारण करते हैं तथा डाकिनियोंके नाशके हेतु हैं, हे मन! मनुष्योंके लिये कल्याणस्वरूप उन भगवान् भूतनाथ भैरवका भजन कर। जो संसारभयका निवारण करनेवाले, दुष्ट योगिनियोंके लिये भयंकर और समस्त देवताओंके स्वामी हैं, सुन्दर चन्द्रमा और सूर्य जिनके नेत्र हैं, जिन्होंने अपने मस्तकपर मुकुट और गलेमें मोतियोंकी माला धारण कर रखी है तथा जो मनुष्यमात्रके लिये कल्याणस्वरूप हैं, उन विशालकाय भगवान् भूतनाथ भैरवका हे मन! तू भजन कर। जो देखनेमें सुन्दर, बोलनेमें मनोहर, प्रियजनोंमें सर्वाधिक सुन्दर और यश, कीर्ति तथा तपस्याके द्वारा भी अत्यन्त मनोहर हैं, उन भगवान् भूतनाथ भैरवकी मैं शरण लेता हूँ। जो आदिदेव सनातन ब्रह्म पवित्रतामें तत्पर सिद्धिदाता मनोरथपूरक भक्तिसे सेवन करनेयोग्य, देवताओंमें श्रेष्ठ, भक्तियुक्त, सर्वथा योग्य, योग-विचारमें तत्पर, युगको धारण करनेवाले, दर्शनयोग्य मुखवाले, योगी, कलायुक्त, कलंकरहित तथा सत्पुरुषोंद्वारा सेवित हैं, उन भगवान् भैरवको मैं प्रणाम करता हूँ।
जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इस पवित्र भैरव-स्तोत्रका पाठ करता है, उसके दुःस्वप्नोंका नाश तथा मनोवांछित फलकी सिद्धि होती है। इस तीर्थमें मनुष्योंको स्नान-दानादि करने चाहिये। संसारके भयसे डरे हुए मानवोंको भगवान् भैरवका अवश्य पूजन करना चाहिये।
पूर्वकालमें नागगण अपनी माताके शापसे