भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 992
* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य *९६३

परिभ्रष्ट होनेके कारण राजा जनमेजयके द्वारा अग्निकुण्डमें जलाये जा रहे थे। उस समय महात्मा आस्तीकने आकर उन सब नागोंको संकटसे मुक्त किया। तब नागोंने जरत्कारुपुत्र आस्तीकसे पूछा—'ब्रह्मन्! आपकी कृपासे हमलोग जनमेजयके यज्ञकी आगमें जलनेसे बचे हैं। अब आप हमें रहनेके लिये ऐसा कोई स्थान बतलाइये, जहाँ हमें किसी प्रकारका भय न हो।'

आस्तीकने कहा—श्रेष्ठ मातुलगण! मनोहर महाकाल वनमें जो कुशस्थली नामक पुरी है, उसके दक्षिण भागमें एक सनातनतीर्थ है। वहीं नागोंका स्थान बताया गया है। वहाँ भगवान् शंकरका नित्य निवास है। एक समय बकदाल्भ्य नामक ऋषिने उत्तम व्रतका पालन करते हुए वहाँ तपस्या की थी। महातेजस्वी लोमश मुनि भी वहीं रहते हैं। भगवान् कपिलदेव मुनि भी उसी श्रेष्ठ तीर्थमें सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। अतः आप सब लोग वहीं चलकर विश्राम करें।

आस्तीकका यह वचन सुनकर उस समय सब श्रेष्ठ नाग वहाँ निवास करनेके लिये आये। एलापत्र, कम्बल, कर्कोटक, धनंजय, वासुकि, तक्षक, नील, पद्म तथा अर्बुद नामवाले सभी प्रधान-प्रधान नागोंने वहाँ आकर अपने-अपने लिये स्थान बनाये। इन सबके नामपर वहाँ नौ परम सुन्दर कुण्ड निर्मित हुए, जो उत्तम तीर्थस्वरूप हैं। इन सब कुण्डोंको महान् पुण्यप्रद तथा बड़े-बड़े पापोंका नाशक बताया गया है। उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य परम कल्याणमय वैकुण्ठ-धामको जाता है और इस लोकमें सदा श्रीसम्पन्न रहता है। व्यासजी इस प्रकार वह नागतीर्थ सब पापोंको हरनेवाला उत्तम स्थान है। वहाँ राजा बलिकका अद्भुत आश्रम है, जहाँ भगवान् विष्णु सदा स्थित रहते हैं। वहाँ स्नान आदि अवश्य करना चाहिये। उसमें स्नान करनेसे मनुष्य तत्काल सब पापोंसे विशुद्धचित्त हो जाता है।

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नृसिंहतीर्थकी महिमा

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यास! अब नृसिंहतीर्थका माहात्म्य श्रवण करो। प्राचीन कालकी बात है। दैत्यराज हिरण्यकशिपुने इस सम्पूर्ण पृथ्वीपर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। उसके दुष्ट दैत्योंकी सेनासे सारी पृथ्वी छा गयी थी। अतः वह शोकसे पीड़ित हो गौका रूप धारणकर नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई ब्रह्माजीकी शरणमें गयी। वसुधाको भारसे पीड़ित देख लोकपितामह ब्रह्माजीने उसके कष्टका निवारण करते हुए स्नेहयुक्त वाणीमें कहा—'वसुधे! इस दैत्यने पूर्वकालमें ऐसी दुष्कर तपस्या की थी, जो दूसरे किसी प्राणीके द्वारा असम्भव थी। अतः मैंने प्रसन्न होकर इसे वरदान दिया। इस दैत्यने यह माँगा था कि 'न दिनमें, न रातमें, न आकाशमें, न पृथ्वीपर, न सूखेसे, न गीलेसे, न अस्त्र-शस्त्रोंके आघातसे, न मनुष्यसे और न पक्षियोंसे मेरी मृत्यु हो। जो केवल एक थप्पड़ मारकर मन्त्री, सेना और वाहनसमेत मुझे मार डालनेमें समर्थ हो, वही वीर मेरी मृत्युका कारण बने।'

तब मैं 'तथास्तु' कहकर वहाँसे अपने लोकको चला आया। तबसे वह अतुलित बलशाली दैत्य समस्त लोकोंका शासक हुआ है।' पृथ्वीसे ऐसा कहकर ब्रह्माजी सब देवताओंसे बोले—'देवगण! अब तुमलोग महाकाल वनमें जाओ। वहाँ सब तीर्थोंमें उत्तम एक महान् तीर्थ है, जो कर्केराजसे उत्तर और संगमेश्वरके दक्षिण भागमें स्थित है। वैकुण्ठतीर्थके समीप वहाँसे पूर्व भागमें शिप्राके मंगलमय तटपर वह उत्तम तीर्थ प्रतिष्ठित है। उसका नाम है नृसिंहतीर्थ। देवताओ! उसी तीर्थमें जाकर तुम स्नान-दानादि शुभ कर्मोंका अनुष्ठान