भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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९६४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करो। इससे तुम्हें शीघ्र ही पुनः अपने लोकोंकी प्राप्ति होगी।'

ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर इन्द्र आदि देवता महाकाल वनमें, जहाँ शिप्रा नदी बहती है, गये। वहाँ उन्होंने नृसिंहतीर्थके समीपवर्ती तटपर दीर्घकालतक निवास किया और स्नान-दान आदि करके भगवान् नृसिंहकी आराधना की। इस प्रकार विधिवत् धर्मानुष्ठान करके सब देवता परम सिद्धिको प्राप्त हुए। दुष्टोंका संहार करनेवाले श्रीहरिने नृसिंहरूप धारण करके उसके सभामण्डपमें प्रकट होकर हाथके एक ही तमाचेसे हिरण्यकशिपुका काम तमाम कर दिया। तदनन्तर सब देवताओंने अपना-अपना अधिकार प्राप्त किया। तबसे लेकर प्रतिदिन सब देवता जहाँ भगवान् नृसिंह विराजमान हैं, उस उत्तम तीर्थमें मध्याह्नकालिक उपासना किया करते हैं। जो पवित्रात्मा पुरुष उस तीर्थमें स्नान-दानादि शुभकर्म करते हैं, वे परम गतिको प्राप्त होते हैं। वह श्रेष्ठ तीर्थ सदा पुण्यदायक माना गया है। जो कभी नृसिंह चतुर्दशीका शुभ पर्व प्राप्त करके उस तीर्थमें स्नान करनेके अनन्तर देवेश्वर नृसिंहजीका एकाग्रचित्तसे दर्शन और पूजन करता है, लक्ष्मी उसके हाथमें आ जाती है।

उसी तीर्थमें पवनकुमार हनुमान्‌जी परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। वे साधकोंके सब अर्थकी सिद्धि करनेके लिये नित्य वहाँ निवास करते हैं। पूर्वकालमें जहाँ अगस्त्यजीने बड़ी कठोर तपस्या की थी, वह वटवृक्ष न्यग्रोधके नामसे विख्यात है। जो स्त्री या पुरुष वहाँ सावित्री व्रतका आचरण करते हैं, वे परम सौभाग्यको प्राप्त होते हैं। सावित्री व्रतका पालन करनेवाली स्त्री अपने पतिको बहुत प्रिय होती है। वह पतिव्रता और परम सौभाग्यवती होकर कभी वैधव्यका दुःख नहीं भोगती।


कुटुम्बेश्वर, देवप्रयाग तथा कर्करराजतीर्थकी महिमा

सनत्कुमारजी कहते हैं— व्यास ! प्राचीन कालकी बात है। नारदजीने प्रजापति दक्षके साठ पुत्रोंको वैराग्यका उपदेश देकर गृहत्यागी बना दिया, तब दक्ष प्रजापतिने इस उज्जयिनीपुरीमें आकर कुटुम्बवृद्धिके लिये तपस्या की थी। तभीसे वह तीर्थ कुटुम्बेश्वरके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उस तीर्थमें स्नान करके पवित्र हो सनातन ब्रह्माका जप और ध्यान करते हुए प्रजापति दक्षने दस हजार वर्षोंतक बड़ी कठोर तपस्या की। उस तीर्थके प्रसादसे उन्होंने बहुत-सी सन्तानें प्राप्त कीं। उन प्रजाओंको पाकर ही प्रतापी दक्ष प्रजापतिके नामसे विख्यात हुए। ब्रह्माजीने भी वहाँ दुष्कर तपस्या की है। आज भी वहाँ चतुर्मुख शिवलिंगका दर्शन होता है। वहीं भद्रपीठपर विराजमान एक देवी हैं, जो भद्रकालीके नामसे विख्यात हैं। वे सदा वहीं क्रीड़ा करती और नियमपूर्वक रहती हैं। उन्हींके द्वारपर क्षेत्रपाल भैरवकी स्थिति है। वे भद्रकाली देवीके द्वारा पुत्रवत् पालित होकर सदा चौतरेपर स्थित रहते हैं। जो मनुष्य सदाचारका पालन करते हुए इस तीर्थमें स्नान करते हैं, उन्हें जन्मभर कोई वस्तु दुर्लभ नहीं होती।

फाल्गुन कृष्ण पक्षमें जो त्रयोदशीयुक्त चतुर्दशी होती है, उसे 'शिवरात्रि' कहते हैं। उस दिन मनुष्य स्नान करके रातभर जागरण करे। साथ ही बिल्वपत्र, जल, उत्तम गन्ध, बहुत-से पुष्प, फल, धूप, दीप, नैवेद्य, वस्त्र तथा आभूषण आदिके द्वारा गणोंसहित नित्य अविनाशी शिवकी पूजा करे। जो ऐसा करता है, उसका सब पाप नष्ट हो जाता है और वह मनुष्य भगवान् शिवके लोकमें प्रतिष्ठित होता है।

व्यासजी ! 'देवप्रयाग' नामक तीर्थ सब पापोंका नाश करनेवाला है, वह शिप्रा नदीके पूर्वभागमें प्रतिष्ठित है। उस तीर्थमें स्नान करके जो सुरेश्वर देवमाधवका दर्शन करता है, उसे देवमाधवजी