संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * | ९६५ ---|---:
मनोवांछित फल प्रदान करते हैं। ज्येष्ठमासके शुक्ल पक्षमें दशमीको बुधवार और हस्त नक्षत्रका योग होनेपर गंगाजीके जलका परम पवित्र पर्व दशहरा होता है*। उस दिन गंगाजी (शिप्रा) में स्नान करके मनुष्य सब तीर्थोंका फल पा लेता है।
ब्रह्माजी मार्कण्डेयजीसे कहते हैं—वत्स ! भूतलपर जो अनुपम शिप्रा नदी है, उसके तटपर कर्कराज नामक विख्यात श्रेष्ठ तीर्थ है, जिसके दर्शनमात्रसे बड़े-बड़े पापोंका क्षय हो जाता है और मनके सब विकार दूर होते हैं। कर्कके स्थानमें जब सूर्य आते हैं, तबसे तीन ऋतुतक उनकी गति दक्षिणायनकी ओर रहती है। वह धूम्रमार्ग कहलाता है। ऐसे समयमें मृत्यु होनेपर योगी भी इस संसारमें लौट आते हैं (उनकी मुक्ति नहीं होती)। परंतु जो लोग चातुर्मास्य अथवा दक्षिणायनमें मृत्युको प्राप्त होते हैं, उनके उद्धार एवं सद्गतिके लिये यह कर्कराजतीर्थ निर्मित हुआ है। सब लोकोंमें इसकी महिमाका गान किया जाता है। भगवान् विष्णु सबको मुक्ति देनेवाले हैं। उनके स्मरणमात्रसे सब पापोंका क्षय हो जाता है। संसारमें मनुष्य-जन्म दुर्लभ है, उसमें भी उत्तम कुलमें जन्म पाना और भी दुर्लभ है, वहाँ भी संयमका होना अत्यन्त दुर्लभ है। संयम होनेपर भी सदा कल्याणमय सत्संग प्राप्त होता रहे यह तो नितान्त दुर्लभ है। जहाँ सत्संग नहीं मिलता, भगवान् विष्णुकी भक्ति और वैष्णव-व्रतके पालनका अवसर नहीं प्राप्त होता, ऐसे स्थानोंमें विशेषतः चातुर्मास्यके समय भगवान् विष्णुके व्रतका पालन करनेवाला पुरुष उत्तम होता है। चातुर्मास्य आनेपर भगवान् विष्णु सदैव कर्कराजतीर्थमें स्थित होते हैं। हृष्ट-पुष्ट शरीरसे युक्त होकर जीवित रहना उसीके लिये शुभ होता है, जिसने चातुर्मास्य आनेपर श्रीहरिका निरन्तर पूजन किया है। भगवान् विष्णुकी भक्ति दुर्लभ है। द्विजश्रेष्ठ ! चौमासेमें कर्कराजतीर्थमें स्नान करके मनुष्य सब यज्ञोंका फल पाते और स्वर्गलोकमें देवताओंकी भाँति सुख भोगते हैं।
भगवान् विष्णुके चरणके अंगुष्ठसे प्रवाहित होनेवाली गंगाजी भी सदा सब पापोंका नाश करनेवाली बतायी गयी हैं। विशेषतः चातुर्मास्यमें उनकी यह शक्ति और भी बढ़ जाती है। चौमासेमें भगवान् नारायण जलमें शयन करते हैं, इसलिये जलमात्र उस समय भगवान् विष्णुके तेजके अंशसे व्याप्त रहता है। अतः चौमासेमें जलका स्नान सब तीर्थोंसे अधिक महत्त्व रखता है। भगवान् विष्णुके शयन करनेपर उनके नामोंका कीर्तन करते हुए दस प्रकारका स्नान करना चाहिये, जो महान् फल देनेवाला है। ऐसा करनेवाला मनुष्य देवत्वको प्राप्त होता है। स्नानसे मनुष्य सत्यको और सत्यसे सनातन धर्मको पाता है। फिर धर्मसे मोक्षको पाकर वह कभी दुःख नहीं भोगता। भगवान् विष्णु स्नान किये हुए मनुष्यके शरीरका आश्रय लेकर स्थित रहते हैं और समस्त कार्य-कलापोंमें पूर्ण फल देनेवाले होते हैं। सब कर्मोंमें सूर्यनारायणके दर्शनसे शुद्धिका विधान किया गया है परंतु चौमासेमें विशेषतः जलसे शुद्धि होती है। जो शरीरसे अशक्त है, वह भस्मद्वारा स्नान करनेसे शुद्ध हो जाता है। मन्त्र-स्नानसे अथवा भगवान् विष्णुके चरणोदकके स्पर्शरूप स्नानसे भी मनुष्यकी शुद्धि होती है। भगवान् विष्णुके आगे स्नान करना उत्तम है। समस्त क्षेत्रों, तीर्थों और नदियोंमें विशेषतः शिप्रा नदीके जलमें और वहाँ भी सर्वश्रेष्ठ कर्कराजतीर्थमें जो मनुष्य स्नान करता है, वह विष्णुधामको जाता है। चातुर्मास्यमें भगवान् विष्णुके शयन करनेपर जबतक हरिबोधिनी एकादशी नहीं आ जाती, तबतक कर्कराजतीर्थमें ही मुक्ति होती है। चौमासेमें भगवान् विष्णुके शयनकालमें भी यदि मनुष्य वहाँ शरीर छोड़ता है तो उसका यमलोकमें निवास नहीं होता।
* ज्येष्ठे मासे सिते पक्षे दशम्यां बुधहस्तयोः । दशहरा जायते व्यास गंगाजन्म परं शुचि ॥ (स्क० पु०, आव० अव० मा० ७८।७)