संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अवन्तीक्षेत्रके महत्त्वपूर्ण तीर्थ, देवता, वहाँकी यात्राके क्रम एवं माहात्यका वर्णन
सनत्कुमारजी कहते हैं—एक समय पार्वतीजीने भगवान् शिवसे कहा—'महेश्वर ! इस क्षेत्रके प्रभावका वर्णन कीजिये।'
महादेवजी बोले—देवि! अवन्ती क्षेत्रमें परम पुण्यमयी शिप्रा नदी, दिव्य नवनदी, नीलगंगा तथा गन्धवती—ये चारों मेरी प्रिय नदियाँ हैं। यहाँ चौरासी लिंगोंके रूपमें उतने ही शिव निवास करते हैं; आठ भैरव रहते हैं; ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य और छः गणेश हैं तथा देवियोंकी संख्या चौबीस है। भद्रे! यहीं विष्णु और ब्रह्मा आदि सब देवता निवास करते हैं। यह एक योजनका क्षेत्र देव-मण्डलसे व्याप्त है। यहाँ दस विष्णु प्रसिद्ध हैं। उनके नाम सुनो—वासुदेव, अनन्त, बलराम, जनार्दन, नारायण, हृषीकेश, वाराह, धरणीधर, वामनरूपधारी विष्णु तथा लक्ष्मीजीके आश्रयभूत भगवान् शेषशायी। ये दस विष्णु सब पापोंका अपहरण करनेवाले बताये गये हैं। ऋद्धि-सिद्धिदाता, कामदाता, गणपति, विघ्ननाशक, प्रमोदी तथा चतुर्थी-व्रत-प्रिय—ये छः विनायक इस तीर्थमें निवास करनेवाले कहे गये हैं, जो समस्त विघ्नोंका नाश करनेवाले हैं। उमा, चण्डी, ईश्वरी, गौरी, ऋद्धिदा, सिद्धिदा, वरयक्षिणी और वीरभद्रा—ये आठ मातृकाएँ कही गयी हैं। महामाया सती, जो कपालमातृका नामसे विख्यात हैं, उनके साथ अम्बिका, शीतला, सिद्धिदायिनी, एकानंशा, ब्रह्माणी, पार्वती, योगशालिनी—योगिनी, भगवती कौमारी, षट्कृत्तिका, चर्पटमातृका, वरमातृका, सरस्वती, महालक्ष्मी, योगिनी मातृका, चतुष्षष्ठियोगिनी, कालिका, महाकाली, चामुण्डा, ब्रह्मचारिणी, वैष्णवी, वाराही, विन्ध्यवासिनी, अम्बा तथा अम्बालिका—ये चौबीस पराशक्तियाँ हैं। हनुमान्, ब्रह्मचारी, कुमारेश और महाबली—ये चार पवनपुत्र हनुमान्के स्वरूप बताये गये हैं। दण्डपाणि, विक्रान्त, महाभैरव, बटुक, बालक, बन्दी, षट्पंचाशतक तथा अपरकालभैरव—ये आठ भैरव महापापहारक हैं। कपर्दी, कपाली, कलानाथ, वृषासन, त्र्यम्बक, शूलपाणि, चीरवासा, दिगम्बर, गिरीश, कामचारी तथा सर्पांगभूषण शर्व—ये ग्यारह रुद्र बताये गये हैं, जो सब शत्रुओंका नाश करनेवाले हैं। अरुण, सूर्य, वेदांग, भानु, इन्द्र, रवि, अंशुमान्, सुवर्णरेता, अहःकर्ता, मित्र, विष्णु और सनातन—ये बारह आदित्य सब रोगोंका नाश करनेवाले हैं। इस पुरीके चार द्वारपाल हैं, जो महात्मा पुरुषोंको विदित हैं। पूर्व द्वारपर पिंगलेश्वर, दक्षिण द्वारपर कायावरोहणेश्वर, पश्चिम द्वारपर बिल्वकेश्वर तथा उत्तर द्वारपर उत्तरेश्वर विद्यमान हैं। इन सबके अतिरिक्त अन्यान्य बहुतसे शिवलिंग मनोहर महाकाल वनमें बताये गये हैं, जो सबको पवित्र करनेवाले कहे गये हैं। व्यास! यद्यपि महाकाल वनमें शिवलिंगोंकी कोई संख्या नहीं है—वहाँ असंख्य शिवलिंग हैं—तथापि मैंने यहाँ प्रधान-प्रधान लिंगोंका दिग्दर्शनमात्र कराया है। जिस देवताका जो तीर्थ है, वह उसीके नामसे प्रसिद्ध बताया गया है। उनमें स्नान और दान करके मनुष्य उस तीर्थके फलका भागी होता है। जो मनुष्य इन तीर्थोंमें स्नान करते हैं, उनके लिये तीनों लोकोंमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है। पुत्रहीनको पुत्र और निर्धनको धन प्राप्त होता है। ब्राह्मण विद्वान् और क्षत्रिय विजयी होता है। इतना ही नहीं, उसकी सन्तान-परम्परा कभी क्षीण नहीं होती और अन्तमें वह भगवान् शिवके लोकमें पूजित होता है।
व्यासजी बोले—भगवन्! मैं आपसे पुनः यह सुनना चाहता हूँ कि सुन्दर महाकाल वनमें अवन्ती क्षेत्रके भीतर कितने तीर्थ विद्यमान हैं?
सनत्कुमारजीने कहा—द्विजश्रेष्ठ! इस विषयमें