भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 996, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 996
  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९६७

परम बुद्धिमान् नारदजी तथा भगवान् उमा-महेश्वरका जो संवाद हुआ है, उसे सुनाता हूँ। नारदजीने भगवान् शंकरजीसे पूछा—'प्रभो! महाकाल वनमें कौन-कौन तीर्थ हैं?'<br><br>तब उमासहित महादेवजी बोले—मुनिश्रेष्ठ! उत्तम महाकाल वनमें जो तीर्थ हैं, उनका वर्णन करता हूँ, सुनो। भूतलपर पुष्करादि जो कोई भी तीर्थ हैं, वे सब उत्तम महाकाल वनमें वर्तमान हैं। केवल रुद्रसरोवरमें असंख्य सहस्र कोटि-कोटि तीर्थ आकर स्नान करते हैं, इसलिये उसका नाम कोटितीर्थ है। हेमन्त ऋतुमें जब हिमालयगिरि हिमकी वर्षा करने लगता है, उस समय किन्नरगण पिशाचमोचन तीर्थमें दृष्टिगोचर होते हैं। मुनिवर! मैं तीर्थोंकी नियत संख्याको तो नहीं जानता कि कितने तीर्थ और कितने लिंग हैं तथापि जो प्रधान-प्रधान तीर्थ हैं, उनकी चर्चा करूँगा। द्विजश्रेष्ठ! एक वर्षमें जितने दिन होते हैं, उतने दिनतक प्रतिदिन यहाँ मनुष्य नये-नये प्रसिद्ध तीर्थोंका स्नान प्राप्त करता है। एक वर्ष पूरा होनेपर अवन्तीपुरीकी यात्रा सम्पन्न होती है। जो विधिपूर्वक अवन्ती-यात्रा पूर्ण कर लेता है, वह देवताओंमें श्रेष्ठ होता है। इसलिये मोक्ष चाहनेवाले पुरुषको बड़े यत्नसे अवन्तीपुरीकी यात्रा करनी चाहिये। विशेषतः वैशाख मासमें अवन्तीपुरीमें स्नान करना चाहिये। जो वैशाख मास आनेपर अवन्तीपुरीमें जाता और एक वर्षतक वहाँ रहकर प्रतिदिन विधिपूर्वक एक-एक तीर्थमें स्नान करता है और सब प्रकारकी वस्तुएँ दान देता है, वह तीर्थसेवनके पूर्ण फलको पाता है। इहलोकमें अतिशय सुखका उपभोग करके अन्तमें शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है।<br><br>सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! इस प्रकार पूर्वकालमें भगवान् शंकरने परम बुद्धिमान् नारदजीसे अवन्तीपुरीके माहात्म्यका वर्णन किया था।व्यासजी बोले—ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ सनत्कुमारजी! अब आप मुझे ऐसा कोई उपाय बताइये, जिससे मनुष्य थोड़े ही समयमें अवन्तीतीर्थके सेवनका पूरा फल प्राप्त कर ले तथा सिद्ध होकर शिवलोकको जाय।<br><br>सनत्कुमारजीने कहा—अनघ! मनुष्य एकाग्रचित्त होकर महाकाल वनमें जाय और कोटितीर्थमें स्नान करे। ऐसा करनेवाले मनुष्यका फिर इस संसारमें जन्म नहीं होता। वत्स! इस भूतलपर शिप्राके समान दूसरी कोई नदी नहीं है, जिसके दर्शनमात्रसे मुक्ति हो जाती है। जो वैशाख मासमें भगवान् पुरुषोत्तमका प्रतिदिन पूजन करता है, वह मोचनतीर्थमें एक बार तर्पण करनेमात्रसे मुक्त हो जाता है। जो अवन्तीपुरीमें अंगपात नामक भगवान् विष्णुका दर्शन करते हैं, उनका इस संसारमें पुनरागमन नहीं होता।<br><br>जो सम्पूर्ण तीर्थोंके फलकी इच्छा रखनेवाला हो, वह पवित्र होकर मन-इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए तीर्थ-स्नानका व्रत ग्रहण करे और अट्ठाईस तीर्थोंमें गोता लगावे। कार्तिक, माघ, आषाढ़ और विशेषतः वैशाख मासमें जब कभी भी इस पुरीमें आकर तीर्थ-स्नान करना चाहिये। ऐसा करनेवाला मनुष्य सब तीर्थोंका फल पाकर शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है।<br><br>शिप्रा नदीके तटपर जो प्रधान-प्रधान पुण्य तीर्थ हैं, उनका वर्णन करता हूँ, सुनो—पापपीड़ित मनुष्य 'विष्णु-विष्णु' का स्मरण करता हुआ स्नातक ब्रह्मचारियोंके पालन करनेयोग्य सभी नियमोंको ग्रहण करे। फिर रुद्र-सरोवरमें स्नान करके श्राद्ध-तर्पण आदि करे। तदनन्तर कर्कराज नामक तीर्थस्वरूप तडागको जाय और उसमें स्नान आदि करके घृत-पात्र दान करे। उसके बाद जो परम उत्तम नृसिंहतीर्थ है, उसमें स्नान करे और काला मृगचर्म दान दे। वहाँसे शिप्रा