सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 111, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौन्दर्य लहरी ७१
है, और कोई कोई इतने तितिक्षु होते हैं कि महान कष्टों की भी परवाह नहीं करते, उनमें जडता कम समझनी चाहिये । शरीर के योग से ही आत्मा का स्वाभाविक आनन्द स्वरूप तिरोहित हो गया है । जितना मनुष्य देहवृत्ति का त्याग कर के आत्मस्थिति में ऊंचा उठ जाता है, उसे शारीरिक कष्ट उतना ही कम मन्ताप पहुंचाते हैं, और उसके आनन्दानुभव की वृद्धि होती है । कुण्डलिनी शक्ति जागकर पांचों तत्वों और मन का बेध कर के जड चेतन की ग्रंथियों को खोल देती है, तब साधक का देहाध्यास शिथिल हो जाने पर वह आत्मस्थिति की उच्च भूमिकाओं का अनुभव करने लगता है और आनन्द की लहरें उसकी प्रत्येक नाडी में प्रवाहित होने लगती हैं ।
चैतन्यस्तबक मकरन्दस्रुतिझरी का संकेत मधुप्रतीका भूमिका के लिये भी हो सकता है, जो ऋतंभरा प्रज्ञा के उदय होने पर आती है । चैतन्य का अर्थ मंत्र-चैतन्य भी ग्रहण किया जा सकता है, उस पक्ष में श्री विद्या के मंत्र को स्तबक और मंत्र के अनुष्ठान द्वारा कुण्डलिनी शक्ति के जागरण से प्राप्त होने वाले दिव्यानन्दाबेश का प्रवाह मकरन्द के स्रोत की झरी से उपमित किया जा सकता है । मंत्र चैतन्य का लक्षण योगशिखोपनिषद् में इस प्रकार कहा गया है ।
यदानुध्यायते मंत्रं गात्रकंपोऽथ जायते । ७० ।
अर्थात् जब मंत्र का ध्यान किया जाता है, तब गात्रों में कंप का अनुभव होना चाहिये । कंप शक्ति के सक्रिय होने पर हुआ करते हैं, और उस कंप में दिव्यानन्द की लहरें प्रवाहित होती हुई