सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 112, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ें७२ सौंदर्य लहरी
अनुभव में आती हैं, जिससे सिर में आत्मानन्द की मस्ती प्रदान करने वाला नशा सा चढ जाता है । मंत्र चैतन्य का अर्थ मंत्रयोग द्वारा शक्ति का जागरण ही समझना चाहिये । कुण्डलिनी शक्ति के जागने पर शरीर की जडता, आलस्य, भारीपन इत्यादि दोष तत्क्षण दूर हो जाते हैं। श्री विद्या के अक्षरों की चिन्तामणियों से और मंत्र की चिन्तामणियों की माला से भी उपमा दी जा सकती है । भगवती का अनुग्रह मुमुक्षुओं को मोक्ष देता है और सकाम उपासना करने वालों की अभीप्सित् कामनाओं को पूर्ण करता है, इसलिये कहा है कि भगवती दरिद्रियों के लिये चिन्तामणियों की माला के सदृश है । एक चिन्तामणि इन्द्र लोक में है जो कल्प वृक्ष के सदृश सब ही कामनाओं को पूर्ण करती है, परन्तु पंचदशी मंत्र में १५ और षोडशी में १६ अक्षर उतनी ही चिन्तामणियों के तुल्य हैं, जो उपासकों की सब ही कामनाए पूर्ण करते हैं ।
इस श्लोक से हादिविद्या का प्रथम कूट इस प्रकार उद्धृत किया जा सकता है । मिहिर से हकार, मकरंद की सोमसदृश उपमा से सकार, चिन्तामणि से सब कामनाओं को पूर्ण करने वाला ककार और वराहावतार के महीउद्धार सदृश पृथिवी बीज का लकार और 'भगवती' पद से भगवती का साक्षात् हृल्लेखा अक्षर समझना चाहिये, एक कूट सिद्ध होने से पूरा मंत्र ग्रहण किया जा सकता है क्योंकि इस विद्या के तीनों कूट इन ही अक्षरों से बनते हैं । आगे चल कर श्लोक ३२ के नीचे यह दिखायेंगे कि शंकर भगवत्पाद् की इष्ट विद्या हादि विद्या ही थी । इसलिये इस श्लोक में भगवती के गुणानुवाद के साथ-साथ उस विद्या का रूप भी बता दिया गया