सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 113, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी ७३
है। हादि विद्या से ही चतुष्कूटी शांकरी विद्या का भी निर्माण होता है, और त्रैलोक्य मोहन कवच में उससे पाताल लोक से रक्षा होने का उल्लेख मिलता है, इसलिये यहां 'मुररिपुवराहस्यदंष्ट्रा' कहने से स्पष्ट हादि विद्या की ओर संकेत दिख पडता है।
भगवान ने मुर राक्षस का वध किया था, इसलिये उनका एक नाम मुरारि अथवा मुररिपु भी प्रसिद्ध है, इसलिये मुररिपुवराह का अर्थ वाराह अवतार है। भगवान ने वराह का रूप धारण कर के पाताल से दांतों पर भूमि को उठाकर ऊपर निकाला था और उसे उसके स्थान पर अपनी आधार शक्ति प्रदान कर के स्थापित किया था। उसी प्रकार कुण्डलिनी रूपी आधार शक्ति के जागने पर भगवती जन्म मरण रूपी संसार सागर में डूबे हुओं का उद्धार करती है। वाराह भगवान का बीज मंत्र 'हूं' है अर्थात् हूं बीज का प्रयोग करने से जो शक्ति उत्पन्न होती है, वह वाराह भगवान के दांत के सदृश जीवों को संसार सागर से बाहर निकाल लेती है।
मुरारि विष्णु भगवान ने वराह अवतार धारण कर के पाताल में
| मुररिपुवराहस्य दंष्ट्रा | धसती हुई पृथिवी को उभारा था। मूला-धार पृथिवी तत्व का स्थान है और चरण पाताल के स्थान माने जाते हैं। जीव ने पार्थिव शरीर |
में अध्यस्त होकर अपने को अन्धकार में डाल रखा है, जितना-जितना वह मूलाधार से ऊपर उठता जाता है, उसका अध्यास सूक्ष्म होता जाता है और सहस्रार में पहुंचकर सर्वथा मुक्त हो जाता है। इसलिये जन्ममरण रूपी संसार की पाताल रूपी दल-दल से निकलने के लिये, उसे भगवती की वैष्णवी बाराही शक्ति का