सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४ सौन्दर्य लहरी
आश्रय लेना चाहियें। वाराही शक्ति अथवा वाराही विद्या का वर्णन वाराहोपनिषत् में मिलता है, वहां ब्रह्म विद्या को ही वाराही विद्या कहा है। देखें वाराहोपनिषत् (अतस्त्वद्रूपप्रतिपादितां ब्रह्मविद्यां ब्रूहीति हो वाच) (१,१) अर्थात् ऋभु ऋषि वाराह भगवान से प्रार्थना करते हैं कि आप अपने रूप से प्रतिपादित ब्रह्म विद्या कहिये। भावनोपनिषत् में वाराही शक्ति को पिता समान दिखाया है, देखें परिशिष्ठ (१)। मूलाधार से भी नीचे अधिक अन्धकार के स्थान हैं। मूलाधार और स्वाधिष्ठान को अन्धकारमय आग्नेय मंडल माना जाता है। यदि शरीराध्यास की वृद्धि होती जाय तो जीव अधिकाधिक जडता में उतरता जाता है। पातालादि निम्न लोको को घनांधकारमय माना जाता है। ईशावास्योपनिषत् में यह बात यजुर्वेदीय निम्नोध्दृत मंत्र द्वारा इन शब्दों में कही गई है।
असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसा वृताः।
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥ ३ ॥
अर्थ:— अन्धकार से आवृत्त जो आसुरी लोक हैं, उनको आत्म हनन करने वाला मनुष्य मरकर जाता है।
जड पार्थिव शरीर में आत्म भावना के दृढ अध्यास को ही यहां आत्म हनन कहा गया है। आत्म स्वरूप को जानने के लिये इस अध्यास से उभरना अनिवार्य है और वाराही शक्ति का आश्रय लेकर उससे ऊपर उठा जा सकता है, यह भाव इस श्लोक की अन्तिम पङ्क्ति में दिखाया गया है।