सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी ७५
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त्वदन्यः पाणिभ्यामभयवरदो दैवतगण—
स्त्वमेका नैवासि प्रकटितवराभीत्यभिनया ।
भयात्त्रातुं दातुं फलमपि च वांछासमधिकं
शरण्ये लोकानां तवहि चरणावेव निपुणौ ॥
अर्थः— तेरे सिवाय अन्य सब देवतागण दोनों हाथों के अभिनय से अभयदान और वरदान देते हैं । तू ही एक ऐसी है जो अभयदान अथवा वरदान देते समय हाथों का अभिनय नहीं करती । भय से त्राण करने में और वांछा के अनुकूल वर प्रदान करने में, हे लोकों की शरण्ये ! तेरे दोनों चरण ही निपुण हैं ।
सं० टि०— इस श्लोक में भगवती की उपासना के लिये ‘ऐं क्लीं सौः’ इस बाला मंत्र का संकेत है, जो भुक्ति मुक्ति दोनों देता है ।
वर अभिनय — देवता दो प्रकार से अनुग्रह करते हैं, १. अभयदान देकर और २. वरप्रदान करके । वरदान से मनोवाञ्छित् कामना की सिद्धि होती है । दोनों प्रकार के अनुग्रहों को हाथों के अभिनय से प्रकट किया जाता है । दक्षिण हाथ उठा कर अभयद अभिनय किया जाता है और बायें हाथ को जैसे सिर पर रखते हैं, नीचे झुकार कामना सिद्ध्यर्थ वरद अभिनय किया जाता है । सब देवता और सब गुरुजन इस प्रकार ही