सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 121, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी
फारसी का दाना ( बुद्धिमान ) शब्द दानव का ही अपभ्रंश दिख पडता है और फारसी में देव शब्द बुरे अर्थों में ग्रहण किया जाता हैं। फारसी में देव शब्द विशाल भयंकर व्यक्ति के लिये प्रयुक्त होता है, जिसे अंग्रेजी में जायंट giant कहते हैं। परन्तु योरोप की भाषाओं में देव शब्द ने अपना स्वरूप तद्रूप ही रखा है, जैसे डिवाइन, डियू ( divine, dieu )। और संस्कृत में दोनों शब्दों का विपरीत और विरोधी अर्थ दोनों की विपरीत और विरोधी मनोवृत्तियों और संस्कृतियों पर प्रकाश डालता है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से इस गाथा का महत्व समझने योग्य है, इसलिये उसे समझाना हम उचित समझते हैं। यह संसार एक महासागर है, जो अनेक रत्नों की खानि है। प्राकृतिक विज्ञान के विषय ही वे रत्न हैं, जिनको प्राप्त करने के लिये ध्यान रूपी मथनी से उसका मथन किया जाता है। मथनी को घुमाने के लिये उसपर एक रस्सी लपेटी जाती है, वहां वासुकी नाग से यह काम लिया गया था। मन ही वह वासुकी नाग है, जिसने सारे जगत को डस रखा है। उसका मुख बहिर्मुखी और पूंछ अन्तर्मुखी हैं। मुख की ओर असुर बाह्य विषयों की ओर खेंचते हैं, और पूंछ की ओर से देवगण अन्तरात्मा की ओर खेंचते हैं। वृत्तियां भी आसुरी और दैवी विख्यात हैं। तब उस मनरूपी रस्सी को तानकर खेंचने से ध्यानरूपी मथन आरम्भ होता है। आसुरी प्रवृत्ति वाले मनुष्य बहिर्विषयों पर ध्यान जमाकर भौतिक विज्ञान के रहस्यों का उद्घाटन करते हैं और देवता अन्तरात्मा की आध्यात्मिक खोज के लिये चिंतन करते हैं। आत्म ज्ञान अमृत है, ओर भौतिक विज्ञान में