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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 415 में से

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८० | सौंदर्य लहरी

लेकर उसके बांटने का काम करने लगे। देव और असुरों को अलग-अलग दो पंक्तियों में बिठा दिया गया। मोहिनी के नेत्रों के कटाक्षों और अंगों के हावभावों से सब असुर मोहित हो गये और सारा अमृत देवताओं को बांट दिया गया। वे अमृत पीकर अमर हो गये और असुर मर्त्य रह गये। अमृत के पूर्व जो हला-हल निकला था, उसके प्रभाव से जब सारा विश्व जलने लगा, तब देव और असुर दोनों ही घबरा गये, उस समय करुणा सागर शंकर भगवान ने उसे पान कर के सब की रक्षा की थी, इसके पश्चात् शंकर एकांत में जाकर समाधिस्थ होकर बैठ गये। उठने पर उन्होंने जब मोहिनी रूप द्वारा असुरों के ठगे जाने की बात सुनी, तब विष्णु भगवान से उस मोहिनी रूप को देखने की इच्छा प्रगट की। भगवान ने वह रूप फिर शंकर को भी दिखाया। उसे देखकर शंकर इतने मोहातुर हुए कि काम के क्षोभ से अपने को भूलकर मोहिनी के पीछे दौड़ने लगे।

पुरा काल में कश्यप नाम के एक प्रजापति थे, वे कश्यप सागर के तट पर रहा करते थे। शायद वह कश्यप सागर योरोप और एशिया के मध्यवर्ती मधुर जलयुक्त महान सरोवर आधुनिक कैस्पियन सी ही हो। इसलिये इस पौराणिक गाथा को उस युग का स्मारक कहा जा सकता है, जब आर्य जाति मध्य एशिया में निवास करती थी। कश्यप देव की दो स्त्रियां थीं—दिति और अदिति। दिति की सन्तान दैत्य अर्था असुर हुए और अदिति की देव। पश्चिम में रहने वाली अनार्य जातियां दैत्य कहलाती थीं, और आर्य जाति के लोग देव कहलाते थे। दैत्यों को संस्कृत में दानव भी कहते हैं।

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