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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

८० | सौंदर्य लहरी

लेकर उसके बांटने का काम करने लगे। देव और असुरों को अलग-अलग दो पंक्तियों में बिठा दिया गया। मोहिनी के नेत्रों के कटाक्षों और अंगों के हावभावों से सब असुर मोहित हो गये और सारा अमृत देवताओं को बांट दिया गया। वे अमृत पीकर अमर हो गये और असुर मर्त्य रह गये। अमृत के पूर्व जो हला-हल निकला था, उसके प्रभाव से जब सारा विश्व जलने लगा, तब देव और असुर दोनों ही घबरा गये, उस समय करुणा सागर शंकर भगवान ने उसे पान कर के सब की रक्षा की थी, इसके पश्चात् शंकर एकांत में जाकर समाधिस्थ होकर बैठ गये। उठने पर उन्होंने जब मोहिनी रूप द्वारा असुरों के ठगे जाने की बात सुनी, तब विष्णु भगवान से उस मोहिनी रूप को देखने की इच्छा प्रगट की। भगवान ने वह रूप फिर शंकर को भी दिखाया। उसे देखकर शंकर इतने मोहातुर हुए कि काम के क्षोभ से अपने को भूलकर मोहिनी के पीछे दौड़ने लगे।

पुरा काल में कश्यप नाम के एक प्रजापति थे, वे कश्यप सागर के तट पर रहा करते थे। शायद वह कश्यप सागर योरोप और एशिया के मध्यवर्ती मधुर जलयुक्त महान सरोवर आधुनिक कैस्पियन सी ही हो। इसलिये इस पौराणिक गाथा को उस युग का स्मारक कहा जा सकता है, जब आर्य जाति मध्य एशिया में निवास करती थी। कश्यप देव की दो स्त्रियां थीं—दिति और अदिति। दिति की सन्तान दैत्य अर्था असुर हुए और अदिति की देव। पश्चिम में रहने वाली अनार्य जातियां दैत्य कहलाती थीं, और आर्य जाति के लोग देव कहलाते थे। दैत्यों को संस्कृत में दानव भी कहते हैं।

सौंदर्य लहरी

फारसी का दाना ( बुद्धिमान ) शब्द दानव का ही अपभ्रंश दिख पडता है और फारसी में देव शब्द बुरे अर्थों में ग्रहण किया जाता हैं। फारसी में देव शब्द विशाल भयंकर व्यक्ति के लिये प्रयुक्त होता है, जिसे अंग्रेजी में जायंट giant कहते हैं। परन्तु योरोप की भाषाओं में देव शब्द ने अपना स्वरूप तद्रूप ही रखा है, जैसे डिवाइन, डियू ( divine, dieu )। और संस्कृत में दोनों शब्दों का विपरीत और विरोधी अर्थ दोनों की विपरीत और विरोधी मनोवृत्तियों और संस्कृतियों पर प्रकाश डालता है।

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से इस गाथा का महत्व समझने योग्य है, इसलिये उसे समझाना हम उचित समझते हैं। यह संसार एक महासागर है, जो अनेक रत्नों की खानि है। प्राकृतिक विज्ञान के विषय ही वे रत्न हैं, जिनको प्राप्त करने के लिये ध्यान रूपी मथनी से उसका मथन किया जाता है। मथनी को घुमाने के लिये उसपर एक रस्सी लपेटी जाती है, वहां वासुकी नाग से यह काम लिया गया था। मन ही वह वासुकी नाग है, जिसने सारे जगत को डस रखा है। उसका मुख बहिर्मुखी और पूंछ अन्तर्मुखी हैं। मुख की ओर असुर बाह्य विषयों की ओर खेंचते हैं, और पूंछ की ओर से देवगण अन्तरात्मा की ओर खेंचते हैं। वृत्तियां भी आसुरी और दैवी विख्यात हैं। तब उस मनरूपी रस्सी को तानकर खेंचने से ध्यानरूपी मथन आरम्भ होता है। आसुरी प्रवृत्ति वाले मनुष्य बहिर्विषयों पर ध्यान जमाकर भौतिक विज्ञान के रहस्यों का उद्घाटन करते हैं और देवता अन्तरात्मा की आध्यात्मिक खोज के लिये चिंतन करते हैं। आत्म ज्ञान अमृत है, ओर भौतिक विज्ञान में

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विष रहता है। आधुनिक वैज्ञानिक रहस्योद्घाटन का फल नश्वर है और उनका प्रयोग जगत के विनाश के लिये ही अधिक किया जाता है। जहां तक उनका संबंध संसारिक वैभव से है, वह भी मानव जाति के यद्यपि सुख की मात्रा बढ़ाने की इच्छा से किया जाता है, परन्तु सुख की वृद्धि के साथ दुःखों की भी वृद्धि करता है। सुख दुःख दोनों बराबरी के साथी हैं, दोनो एक ही सिक्के (मुद्रा) के दो पार्श्व हैं, और दोनों का मूल्य उस सिक्के के बराबर है। अन्तरात्मा में प्रविष्ठ होकर दोनों से मुक्ति पाना ही अध्यात्म मार्ग का ध्येय है। भगवान की मोहिनी माया बहिर्मुखी वृत्ति वालों को सदा अमृत पान से वंचित करती रहती है; यहां तक कि शंकर भगवान की भी समाधि कभी-कभी भंग हो जाती है। शंकर भगवान ने अमृत पान की इच्छा नहीं की, वे तो पूर्व से ही अमर थे, और विष को पीकर भी नहीं मरे, तो भी मोहिनी शक्ति की भ्रांति में कुछ समय के लिये वे भी आ ही तो गये, यह मोहिनी माया इतनी प्रबल है।

इसलिये मुमुक्षुओं को संसार सागर के रत्नों की प्रेयासक्ति छोडकर, तितिक्षा सहित दुःखों को सहन करते रहना चाहिये। आत्मा अमर है, उसे कोई हलाहल मार नहीं सकता।

दुःखों से उद्विग्न न होना और सुखों की स्पृहा का त्याग करना ही स्थितप्रज्ञता का लक्षण है।

भगवान का भगवती की आराधना कर के मोहिनी रूप से भगवती के नारी सौन्दर्य का आश्रय लेना ही उसकी आराधना है।

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हादि विद्या मोक्ष देती है, उसका प्रथम अक्षर ह कार शिव वाचक है। वैष्णवी विद्या में छः कूट होते हैं, प्रथम तीन कूटों में हादि विद्या ज्यों की त्यों है, और अन्य तीन कूटों के प्रथम दो कूटों में ह स के स्थान पर स ह और अन्तिम कूट में स ह पूर्व में जोड़कर षडाक्षरी कूट मंत्र बनाया गया है। इस प्रकार आधा मंत्र शिव प्रधान है और आधा शक्ति प्रधान कर दिया गया है।

भगवान का एक नाम हरि है। ह्+अ+र्+इ इनमें हकार शिव वाचक है, अकार भी ब्रह्मपद वाचक है— अक्षराणामकारोऽस्मि (गीता)। अकार को हटाकर, र में जो ह्रस्व इकार है उसे दीर्घ कर देने से ह्रीं पद बनता है। र कार अग्नि का अक्षर होने से शक्ति वाचक है और दीर्घ ईकार भी, इस प्रकार ह्रीं (लज्जा) पद बनता है। उस पर अनुस्वार रूपी प्राण प्रतिष्ठा करने से मोहिनी माया का रूप बन जाता है। इस प्रक्रिया में पुरुष वाचक अकार को हटाकर और इकार को दीर्घ कर के स्त्रीलिंग बनाया गया है। ह्रीं का अर्थ लज्जा होने के कारण ह्रीं को मोहिनी रूप कहना यथार्थ ही है।

या देवी सर्व भूतेषुविष्णुमायेति शब्दिता नमस्तस्यैः ३ नमो नमः॥

काम देव ने कादि विद्या मूल मंत्र की ही उपासना की थी।

साध्य सिद्ध विद्याकाम देव प्रजनन शक्ति का देवता है, और ईश्वर की सृष्टि करने की इच्छा से ही उसका उदय होता है। भगवान ने भी कहा है कि

धर्म के अविरुद्ध काम मेरा ही रूप है। परन्तु रजोगुण से उत्पन्न होने

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के कारण सत्वगुण का वह बाधक भी है । रति उसकी पत्नि है । दोनों का रूप अति सुन्दर है, परन्तु काम देव का शरीर तो इतना सुन्दर है कि रति भी उसके रूप का अपने नेत्रों से सदा चुम्बन किया करती है, अथवा दृष्टि रूपी जिव्हा से उसके रूप का रसास्वाद लिया करती है । कामदेव का सामर्थ्य भी इतना अधिक है कि बड़े-बड़े मुनियों के चित्त को भी क्षुब्ध कर देता है । यह सब भगवती की उपासना का ही फल है, क्योंकि कादि विद्या की उपासना से रूप लावण्य सहित सब ही सिद्धियों की प्राप्ति होती है । ब्लैं रति का मंत्र है व् और ल् उसके नेत्र हैं और ए शक्ति रूप है । उपरोक्त श्लोकोक्त वपुषा पद से व्. 'लेह्येत' पद से ले और 'महतां मुनिनाम्' पद से अनुस्वार लेकर उक्त बीज का उद्धरण किया जाता है, माया बीज और काम बीज के योग से अच्युतानन्द स्वामी ने इस श्लोक से 'ह्रीं क्लीं ब्लैं' इस साध्य-सिद्ध मंत्र का उद्धार किया है । इस मंत्र से हृदय चक्र और महानाद् के ऊपर शक्ति का न्यास किया जाता है । इसका फल सर्व सौभाग्य की प्राप्ति है जैसा कि 'प्रणत जन सौभाग्य जननीं पद से स्पष्ट है ।

अगले श्लोक में कामदेव के सामर्थ्य का वर्णन है ।

( ६ )

धनुः पौष्पं मौर्वी मधुकर मयी पंचविशिखा वसंतः सामन्तो मलयमरुदायोधनरथः ।

## सौंदर्य लहरी

तथाप्येकः सर्वं हिमगिरिसुते ! कामपि कृपा—  
मपाङ्गात्ते लब्ध्वा जगदिदमसंगो विजयते ॥

**क्लिष्ट शब्दार्थः—** विशिख = बाण, मौर्वी = रस्सी, अपांग = कटाक्ष ।

**अर्थः—** धनुष्य पुष्पों का बना है, उसकी रस्सी (ज्या) भौरों की बनी है, शब्द स्पर्श रूप रस गंध पांच विषय उसके बाण हैं, वसन्त ऋतु उसका योद्धा सामन्त है, मलयागिरि का शीतल मंद सुगंधित पवन उसका युद्ध में बैठने का रथ है और वह स्वयं अनंग (शरीर रहित) है, ऐसा कामदेव ऐसे शस्त्रों को लेकर सारे जगत को अकेला जीत लेता है । हे हिमगिरि सुते ! यह सामर्थ्य केवल तेरे कटाक्ष से कुछ थोडी सी ही कृपा प्राप्त करने का फल है ।

**सं. टिः—** इस श्लोक से काम बीज क्लीं का उद्धरण किया जाता है, काम से क कार, मलय से ल कार, मौर्वी से ई और पौष्पं से अनुस्वार लेना चाहिये ।

काम देव अनंग है, शंकर ने उसका देह भस्म कर दिया था ।

| काम दहन आख्यान | दक्ष प्रजापति के यज्ञ में अपने पति का अपमान न सहन करने के कारण सती ने अपना देह योगाग्नि से भस्म कर दिया था । ठीक ही तो |
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है, शिव द्रोही,

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अपने ईश्वर का निरादर कैसे सहन कर सकती है। प्रजापति से यहां हमारा अभिप्राय राजे महाराजाओं से नहीं है, हमारे विचार से तो प्रत्येक गृहस्थ जो बच्चे पैदा करने में ही कुशल है अपनी प्रजा का छोटा-मोटा प्रजापति ही है। अस्तु। दक्ष प्रजापति के यज्ञ में सती के देह त्याग के पश्चात शंकर दीर्घकालीन समाधि लगाकर बैठ गये, और सती ने पर्वतराज हिमालय के घर जन्म ग्रहण किया। पार्वती ने शिवजी के साथ विवाह करने का हठ किया और उग्रतप करने लगी। तब देवाताओं ने काम देव को शिवजी की समाधि खोलने के लिये भेजा। कामदेव उपरोक्त सेना लेकर सशस्त्र शिवजी के स्थान पर पहुंचा, वहां वसंत ऋतु का प्रादुर्भाव हुआ, मलयागिरि की शीतल मंद सुगंधित वायु चलने लगी, पुष्प खिल गये जिन पर भौंरे गूंजने लगे और काम देव ने अपने पांचों बाणो का शिवजी पर प्रहार किया, बस शिवजी की समाधि खुल गई। उन्होंने सामने कामदेव को एक झाड के पीछे खड़ा देखा। उसको अपनी समाधि में विघ्नरूप देखकर शिवजी ने तीसरा ज्ञान नेत्र खोला और ज्ञानाग्नि से उसे भस्म कर दिया, तब से काम अनंग हो गया है। उसकी पत्नि रति ने पार्वती से अपना शोक सुनाया, भवानी ने कृपा कर के उसे फिर जीवित कर दिया। अब वह अनंग होने पर भी कामियों को अपने प्रभाव से पराजित कर के सारे जगत का विजेता कहलाता है। प्रभव के लिये मैथुनिक सृष्टि की आवश्यकता है, और काम के बिना सृष्टि प्रभव संभव नहीं। भगवान ने भी कहा है।

धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ।

सौंदर्य लहरी ८७


परन्तु वह समाधि के लिये बहुत बड़ा विघ्न है, बड़े-बड़े योगियों को भी पथ भ्रष्ट कर देता है। जो शंकर की भी समाधि खोल सकता है, उसकी दुर्जेयता प्रत्यक्ष ही है। काम वासना का क्षय ज्ञान के उदय होने पर ही होता है, इससे पूर्व नहीं। यह ही इस आख्यायिका का अभिप्राय है। श्लोक में काम को सारे जगत का विजेता कहने से, साधकों का लक्ष्य काम वासना के प्रभाव की ओर आकर्षित करना है, जो भगीरथ प्रयत्नों से भी शमन किया जान कठिन है। परन्तु कामदेव का सारा सामर्थ्य भगवती के अति स्वल्प कृपा कटाक्ष का ही तो फल है, इसलिये मुमुक्षु साधकों को इस दुर्जय शत्रु से बचने के लिये भगवती की ही शरण में जाना चाहिये। भगवती के ध्यान मात्र से रक्षा हो सकती है।

इसलिये अगले श्लोक में भगवती का ध्यान बताया जाता है:—

[ ७ ]

क्वणत्कांचीदामा करिकलभ कुंभस्तन नता
परिक्षीणा मध्ये परिणतशरच्चन्द्र वदना ।
धनुर्बाणान् पाशं सृणिमपि दधानाकरतलैः
पुरस्तादास्तां नः पुरमथितुराहो पुरुषिका ॥

कठिन शब्दों का अर्थ:— कांची=मेखला जो स्त्रियां कटि पर पहनती हैं। दाम=बंधनी, तगड़ी, कलभ=बच्चा, सृणि=अंकुश

६६सौंदर्य लहरी

अर्थः— कटि पर क्कण क्कण शब्द करने वाले घूंघुरुओं युक्त मेखला बांधे हुए, हाथी के बच्चे के मस्तक पर निकले हुए कुंभ सदृश स्तनों के भार से झुकी हुई, मध्य भाग में पतली, शरद ऋतु की पूर्णिमा के चन्द्रमा जैसे मुख वाली, चारों हाथों में धनुष, ५ बाण, पाश, और अंकुश धारण किये पुरारि की आहो पुरुषिका हमारे सामने (ध्यान में) रहें ।

सं० टि० आहो पुरुषिका= पुरमथितुः शिवस्य अहंकार रूपा । त्रिपुरारि अर्थात् जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तीनों से अतीत ब्रह्म स्वरूप में अहम् विमर्ष का व्युत्थान होना यहां अभिप्रेत है । इस श्लोक से ब्लूँ बीज ग्रहण किया जाता है, बाण से ब्, करतल से लू, मथितुः से उ और आस्तां से अनुस्वार ।

देवताओं का ध्यान खडी हुई स्थिति में किया जाता है, इसलिये सनातन धर्मावलंबियों के मंदिरों में खडी मूर्तियां प्रतिष्ठित की जाती हैं । इसका अर्थ यह है कि खडी स्थिति में उपासक की दृष्टि चरणों पर पडती है और बैठी हुई मूर्ति के मुख पर । ध्यान चरणों का ही अभीष्ट है, पूजन भी चरणों का ही करना चाहिये ।

पुरारि या त्रिपुरारि शंकर को कहते हैं । जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति तीन पुर हैं, शंकर तीनों अवस्थाओं के बैरी है, क्योंकि वे सदा समाधिस्थ रहते हैं। मोक्ष ब्रह्म लीनता का नाम है, ब्राह्मी अवस्था में समस्त तीनों लोकों का एवं जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का लय हो जाता है । कहा है:—

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न यत्र वाचो न मनो न सत्त्वं तमो रजो नो महदादयोऽमी
न प्राणबुद्धीन्द्रिय देवतावा न सन्निवेशः खलुलोक कल्पः ।
न स्वप्न जागर्र्न हितत्सुषुप्तं नखंजलंभूरनिलोऽग्निरर्कः
संमुप्त वच्छून्य वदप्रतर्क्यं तन्मूलभूतं पदमामनन्ति ॥
श्रीमद्भागवत ।

अर्थः— जहां न वाक शक्ति है, न मन, न सत्व, तमोगु रजोगु न ये महदादि हैं। न कर्मेन्द्रियों अथवा ज्ञानेन्द्रियों के देवता हैं और निश्चय ही न लोकों की कल्पना रूपी प्रतीति । न वह स्वप्न है न जाग्रत और सुषुप्ति, न वहां आकाश, जल, पृथिवी, वायु, अग्नि या सूर्य है । सुषुप्तिवत् शून्यवत् अप्रतर्क्य ही व मूल-भूतपद है ।

आहोपुरुषिका पद भगवती के लिये प्रयुक्त किया गया है।

माया का<br>बन्धनआहो आश्चर्य सूचक पद है, और पुरुषिका पुरुष का स्त्रीलिंग भाव वाचक पद है । अर्थात भगवती का रूप आश्चर्यमय है। आत्मा प्रकृति से असंग

है, असंगोऽयमात्मा यह सांख्य वेदान्त का मूल सिद्धान्त है। परन्तु उपाधि से उस ही में संसारी जीवात्मशक्ति का भी भाव है। भगवान् ने उसे परा प्रकृति इसी नाते कहा है।

अपरेयमितस्त्वन्यां विद्धि मे प्रकृतिं परां ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ गीता (७,५)

जैसे स्फटिक के ऊपर सन्निधि में आये हुए पदार्थों के रंग की छाया पडकर उसे अपने रंग से रंजित कर देती है, वैसे ही

३० सौंदर्य लहरी


आत्मा भी प्रकृति के संसर्ग से संसारी पुरुष दिखने लगता है । पुरुषिका पद में यह ही भाव निहित है । माया कला के स्तर पर काल, कला, नियति, विद्या और राग इन पांच कंचुकों के आवरणों से स्फटिक सदृश आत्मतत्त्व सोपाधिक होने पर प्रकृति के रंग में रंगा हुआ दिखने लगता है, और भगवती महामाया मनरूपी इक्षु धनुष पर, जिस पर संकल्प रूपी भौरों की प्रत्यंचा चढी है, शब्द-स्पर्श रूपरस गंधात्मक पांच विषय रूपी बाणों को चढाकर पुरुष का आखेट करती है, राग रूपी पाश से बांधती है और क्रोध रूपी अंकुश से ताडन करती है । परन्तु उसका अंकुश भी मां का क्रोध होने के कारण खांड का बना हुआ है । इस प्रकार वह पुरुष को अपरा प्रकृति के स्तर पर बांध देती है । इक्षु मधुर रस से भरा रहता है, इसलिये आनन्द रस के भोगी मन को इक्षु धनुष से उपमित किया गया है, मन में सदा संकल्प विकल्प रूपी भौंरे उडते रहते हैं, उनको धनुष की प्रत्यंचा से उपमा दी गई है । जैसे वे पुष्पों के मकरन्द की कामना से आकाश में गुंजारते रहते हैं, वैसे ही मन की संकल्पात्मिका वृत्तियां विषयों की वासना से चित्ताकाश को प्रतिध्वनित करती हुई उडती रहती हैं । पांचों ज्ञानेन्द्रियों से संबंधित ५ प्रकार के विषय शब्द स्पर्श रूप रस गंधात्मक पांच पुष्प बाण हैं । राग अर्थात् आसक्ति रूपी ही वह पाश है जिससे सारा जगत् बंधा पडा है, क्रोध अथवा द्वेष प्रकृति का अंकुश है, जिससे विद्ध कर मनुष्य कौनसा पाप-कर्म करने को बाध्य नहीं हो जाता । इस प्रकार पुरुष को पशु के सदृश वश में रखकर उससे प्रकृति अपने सृष्टि क्रम का कार्य कराती है । भौरों

सौंदर्य लहरी ९१

की प्रत्यंचा पर चढ़े हुए उपरोक्त पांच पुष्प बाण वाला इक्षु धनुष कामदेव का भी अस्त्र है, और कामिनी स्त्री स्वयं शक्ति का ही रूप है। इसलिये कामी मनुष्यों को भोगासक्ति में फंसाने के लिये मानो महामाया ने अपना ही धनुष कामदेव को दे दिया है, क्योंकि बिना ऐसे अस्त्र के भगवान् का सनातन अंश बंधन में नहीं आ सकता था।

भगवान् की लीला विचित्र है, अपनी ही शक्ति से वह स्वयं ही बंध जाता है। पारमार्थिक दृष्टि से वह स्वयं स्त्री है और स्वयं पुमान्, आत्म तत्त्व में लिंग भेद का भाव नहीं। वह स्वयं माया है और स्वयं मायावी, स्वयं नट है और स्वयं दर्शक, स्वयं ईश्वर है और स्वयं दास। कृष्ण राधा है और राधा कृष्ण, राम सीता है और सीता राम, शिव शक्ति है और शक्ति स्वयं शिव। इसी प्रकार आप ही रति है और आप ही काम।

सब प्राणि मात्र का अन्तरात्मा एक ईश्वर स्वयं ही है, जो एक रूप से अनेक हो रहा है, जैसा कि उसका आदि संकल्प था, एकोऽहम् बहुस्यां प्रजायेयेति ।

इस लिये साधक जनों को महामाया के आखेट से बचने के लिये कामिनी के काम बाणों से बचना चाहिये और भगवती के चरणों का हृदय में ध्यान करना चाहिये। और

पर तिय ककार तजहु गुसाईं। ज्यों चौथ चन्दा की नाईं ॥ तुलसीदास

क्योंकि, विद्या समस्तास्तव देवि भेदाः, स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु।

९२ सौंदर्य लहरी

भगवती के नीचे के वाम हस्त में पाश, और ऊपर के वाम हाथ में धनुष, दक्षिण हाथों में नीचे अंकुश और ऊपर ५ बाण हैं।

अगले श्लोक में भगवती के ध्यान के लिये पीठ का वर्णन किया गया है।

[ ८ ]

सुधासिन्धोर्मध्ये सुरविटपिवाटीपरिवृते
मणिद्वीपे नीपोपवनवति चिन्तामणिगृहे।
शिवाऽऽकारे मंचे परमशिवपर्यङ्कनिलयां
भजन्ति त्वां धन्याः कतिचन चिदानन्दलहरीम् ॥

**कठिन शब्दोंका अर्थ:—**शिवाकारे=त्रिकोणाकृति, निलय=आलय

अर्थ:— सुधा के समुद्र के मध्य, कल्प वृक्षों की वाटिका से घिरे हुए मणि द्वीप में, नीप वृक्षों के उपवन के बीच चिन्ता-मणियाँ के बने घर में, त्रिकोणाकृति मंच पर, परम शिव के पलंग पर विराजमान चिदानन्द लहरी स्वरूप तेरा, कोई बिरले मनुष्य भजन करते हैं, वे धन्य हैं।

सं० टि० शिवाकारे=शिव+आकारे अथवा शिवा+आकारे । यहां हृदय में आनन्दावेष की अनुभूति की ओर लक्ष्य कराया गया है। ॐ कार में अ+उ+म्+नाद+बिन्दु+शान्ति ( कला )+शान्त्यातीता सात मात्रा मानी जाती हैं। अ ब्रह्मा, उ विष्णु, म् रुद्र, नाद ईश्वर,

सौन्दर्य लहरी ९३


बिन्दु सदाशिव, शान्ति शक्ति और शान्त्यातीत शिव हैं । प्रथम चार मंच के चार पाये, बिन्दु चद्दर, और शिवाकार मंच पर विराजने वाली चिदानन्द लहरी, अथवा परम शिव पर्यंकनिलया चिदानन्द लहरी है ।

भगवती के भजन से प्राप्त चिदानन्द के आवेशों का अनुभव करने वाले साधक थोडे ही होते हैं। वे वास्तव में धन्य हैं जिन पर भगवती की ऐसी कृपा होती है भगवती का ध्यान परम शिव के साथ करना चाहिये, यह बात पूर्व श्लोकोक्त पुरमथितुराहो-पुरुषिका पद से भी प्रगट होती है । सत्य बात तो यह ही है कि सच्चिदानन्द के आनन्दावेशों की अनुभूति में स्वयं भगवती की ही कृपा की अनुभूति है, अर्थात् परम ब्रह्म के शून्य अव्यक्त सत्स्वरूप आकाश में शून्य रूपी पलंग पर चिदानन्द की लहरी विराजती है । पलंग एक त्रिकोण मंच पर बिछा हुआ है, मंच चिन्तामणियों के बने हुए घर में स्थित है, घर के चारों ओर नीप वृक्षों का उपवन है, वह उपवन एक मणियों के द्वीप पर लगाया गया है । द्वीप के चारों किनारों पर कल्पवृक्षों का घेरा है, और वह द्वीप अमृत के समुद्र में स्थित है । ऐसा भगवती के रहने का स्थान है ।

निःस्पन्द परम शिव आनन्द ब्रह्म परं पद सुधासिंधु है, और चिदानन्द लहरी स्वयं चिति शक्ति है । जिसका स्थान सहस्रार पद्म में हैं। सहस्रार ही वह मणि जटित द्वीप है, जिसके चारों ओर कल्प वृक्षों का घेरा है और मध्य में नीप वृक्षों का उपवन है, जिसमें चिन्तामणियों से घर बनाया गया है, उसमें ▽ त्रिकोणाकृति

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  • सौन्दर्य लहरी

अकथ अथवा गुरु चक्र रूपी मंच पर बिन्दु रूपी पलंग बिछा हुआ है। वहां सच्चिदानन्द की प्रथम स्पन्द स्वरूपा चिदानन्द लहरी शिव के साथ विहार करती है। जिसका उल्लेख अगले श्लोक में आयगा। अकथ त्रिकोण चक्र की तीनों भुजाओं के बाहर क्रमशः १६ स्वर, क से त तक १६ व्यंजन, और थ से स तक १६ अक्षर विराजते हैं, और तीनों कोगों में ह क्ष ळ तीन अक्षर हैं। अ, क, थ से युक्त अन्य १५ अक्षरों के कारण, तीनों भुजाएं इन अक्षरों से नामांकित की जाती हैं और चक्र का नाम अकथ कहा जाता है। अकथ का अर्थ अकथनीय अथवा अनिर्वचनीय होता है। सब वर्ण चिन्तामणियों के सदृश हैं जिनसे यह घर बना है। इसके चारों ओर सहस्र अरे (radii) नीप वृक्ष हैं और उनसे उदय होने वाले संकल्प कल्प वृक्ष हैं। भगवती के पलंग का वर्णन ९२ वें श्लोक में देखें। वहां हरि, रुद्र, ब्रह्मा और महेश्वर को पलंग के चार पाये बताया गया है और सदाशिव को पलंग पर बिछाने की चद्दर से उपमा दी गई है। अथवा ॐ पलंग है और अ, उ, म् और अनुस्वार उसके चार पाये हैं। अथवा मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर और अनाहत् चक्र चार पाये हैं और विशुद्ध चक्र उस पर बिछी चादर है। और देह श्री चक्र है। श्री चक्र भगवती का निवास स्थान माना जाता है, देखें श्लोक ११। श्री चक्र में बिन्दु को पलंग का स्थान, त्रिकोण को अकथ चक्र, ४३ त्रिकोणों को नीप वृक्ष और ४ श्री कंठ और ५ शिवयुवतियों को कल्प वृक्ष समझना चाहिये।

इस श्लोकोक्त 'चिदानन्द लहरी' पद के कारण प्रथम ४१ श्लोकों के पूर्व ग्रंथ को आनंद लहरी कहते हैं। आनन्द से 'क,'

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सहस्रार
गुह्चक्र
उन्मनी १६
१५ समनी
व्यापिका १४
१३ शक्ति
महानाद १२
११ नाद
निरोधिका १०
९ अर्धेन्दु
बिन्दु ८
७ आज्ञाचक्र
५ विशुद्ध
अनाहत् ४
हृदयचक्र
मणिपूर ३
२ स्वाधिष्ठान
योनिस्थान
१ मूलाधार
कन्द
स्वयंभूलिङ्ग
कुण्डलिनी


श्री हिरालाल
देवास

The different yogic plexuses

सौंदर्य लहरी ९५


और लहरी से ल हीं लेकर हादि विद्या के तीनों कूटों को ग्रहण किया जा सकता है । कं * सुख वाचक शब्द है, कं ब्रह्म और प्राण वाचक भी है देखे छान्दोग्य (४, १०, ५) । इस श्लोक की अगले श्लोक से संगति करने से हादि विद्या को षट् चक्र वेध विद्या समझना चाहिये ।

षट् चक्र वेध अर्थात उन्नेय भूमिका ।

[ ९ ]

महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं
स्थितं स्वाधिष्ठाने हृदिमरुतमाकाशमुपरि ।
मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्वाकुलपथं
सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसि ॥

अर्थः— पृथिवी तत्व को मूलाधार में और जल को भी ( मूलाधार में ही ) मणिपूर में अग्नितत्व को जिसकी स्थिति स्वाधिष्ठान में है, हृदय में वायु तत्व को और ऊपर विशुद्ध चक्र ) में आकाश तत्व को, और मन को भी भ्रूमध्य में, इस प्रकार सकल कुल पथ ( शक्ति के मार्ग ) का वेध करके तू सहस्रार पद्म में अपने पति के साथ एकान्त में विहार करती है ।

सं० टि० यहां अन्तर्याग का वर्णन है, कुण्डलिनी शक्ति का षट चक्र वेध पूर्वक आरोहण बताया गया है ।


* नोट:—कं शिरः सुख वारिषु-विश्वः, सुखशीर्ष जलेषु कं इति मेदिनी ।

९६ सौन्दर्य लहरी

व्याख्या:— षट् चक्र निरूपण, शिव संहिता और अन्य ग्रन्थों में विना मतभेद षट् चक्रों का क्रम इस प्रकार देखने में आता है कि गुदा के पास पृथिवी तत्व का मूलाधार चक्र है, उपस्थ के निकट जल तत्व का स्वाधिष्ठान चक्र, नाभि के पास अग्नि तत्व का मणिपूर चक्र, हृदय के पास वायु तत्व का अनाहत चक्र, कंठ में आकाश तत्व का विशुद्ध चक्र और भ्रूमध्य के पास मनस्चक्र है, जिसको आज्ञा चक्र कहते हैं । परन्तु सौन्दर्य लहरी में इस क्रम में अन्तर दिखता है जिसके अनुसार उपस्थ के पास जल तत्व का मणिपूर और नाभि में आग्नेय स्वाधिष्ठान चक्र होना चाहिये । तत्वों का क्रम तो वह ही है परन्तु चक्रों के नामों के क्रम से उपस्थ के चक्र का नाम मणिपूर और नाभि चक्र का नाम स्वाधिष्ठान प्रतीत होता है । शंकर भगवत्पाद ने यद्यपि इन दो चक्रों के स्थानों का संकेत नहीं किया है, परन्तु नाम क्रम से यह ही प्रतीत होता है कि उनको, उपस्थ वाले चक्र का नाम मणिपूर और नाभि के चक्र का नाम स्वाधिष्ठान अभिमत था । परन्तु हमारी राय में ऐसा नहीं है, केवल तत्वों के वेध क्रम में अन्तर है । समयाचार के मतानुसार उपस्थ वाले चक्र का वेध करना उचित नहीं समझा गया, क्योंकि इस चक्र के वेध से काम वासना की वृद्धि होकर बज्रौली इत्यादि क्रियाओं द्वारा ऊर्द्धरेता होने की सिद्धि प्राप्त की जाती है, जो कौलाचार को अभीष्ट है, समयाचार को नहीं । इसलिये यहां समयाचार के अनुसार वेध क्रम दिया गया है । वह इस प्रकार है कि मूलाधार के वेध द्वारा पृथिवी तत्व का और साथ ही जल तत्व का भी वहां ही वेध किया जाना चाहिये । 'अपि' शब्द का 'कं'

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के साथ प्रयोग इस बात की ओर संकेत करता है, नहीं तो अपि शब्द वृथा सा दिखता है। फिर स्वाधिष्ठान को छोडकर नाभि वाले मणिपूर में अग्नि का बेध किया जाता है परन्तु अग्नि तत्व की स्थिति योनि स्थान में होने के कारण स्वाधिष्ठान में दिखाई गई है अर्थात् स्वाधिष्ठान चक्र में नीचे अग्नि ऊपर जल दोनों का संधि स्थान है क्योंकि योनि स्थान मूलाधार और स्वाधिष्ठान के मध्य भाग में स्थित है इसलिये अग्नि के प्रदीप्त होने पर मूलाधारस्थ पृथिवी और स्वाधिष्ठानस्थ जल दोनों का बेध मूलाधर के बेध के साथ हो जायगा।

हमारे इस मत को हंसोपनिषत् से पुष्टि मिलती है। वहां गुदा चक्र से वायु का उत्थान करके मणिपूर चक्र में ले जाने का विधान किया गया है, बीच में स्वाधिष्ठान चक्र का बेध न करके उसकी तीन बार प्रदक्षिणा करने की आज्ञा है।

गुदमवष्टभ्याध राद्वायुमुत्थाप्य स्वाधिष्ठानं त्रिःप्रदक्षिणी-
कृत्य मणिपूरकं च गत्वाऽनाहतमतिक्रम्य विशुद्धौप्राणान् निरुध्या-
ज्ञामनुध्यायन् ब्रह्मरंध्रं ध्यायन् त्रिमात्रोऽहमित्येवं सर्वदा ध्यायेत् ।

**अर्थः—**गुदाद्वार को रोक कर आधार चक्र से वायु को उठा कर स्वाधिष्ठान की ३ बार परिक्रमा करके मणिपूर जाकर, अनाहतचक्र का अतिक्रमण करके विशुद्धचक्र में प्राणों का निरोध करे और आज्ञाचक्र में ध्यान करता हुआ, फिर ब्रह्मरंध्र का ध्यान करता हुआ मैं तीन मात्रा से युक्त ॐ हूं ऐसा सदा ध्यान करे। अर्थात् मैं जाग्रतावस्था में वैश्वानर अकार, स्वप्नावस्था में तैजस् उकार और