भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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सौंदर्य लहरी ९७


के साथ प्रयोग इस बात की ओर संकेत करता है, नहीं तो अपि शब्द वृथा सा दिखता है। फिर स्वाधिष्ठान को छोडकर नाभि वाले मणिपूर में अग्नि का बेध किया जाता है परन्तु अग्नि तत्व की स्थिति योनि स्थान में होने के कारण स्वाधिष्ठान में दिखाई गई है अर्थात् स्वाधिष्ठान चक्र में नीचे अग्नि ऊपर जल दोनों का संधि स्थान है क्योंकि योनि स्थान मूलाधार और स्वाधिष्ठान के मध्य भाग में स्थित है इसलिये अग्नि के प्रदीप्त होने पर मूलाधारस्थ पृथिवी और स्वाधिष्ठानस्थ जल दोनों का बेध मूलाधर के बेध के साथ हो जायगा।

हमारे इस मत को हंसोपनिषत् से पुष्टि मिलती है। वहां गुदा चक्र से वायु का उत्थान करके मणिपूर चक्र में ले जाने का विधान किया गया है, बीच में स्वाधिष्ठान चक्र का बेध न करके उसकी तीन बार प्रदक्षिणा करने की आज्ञा है।

गुदमवष्टभ्याध राद्वायुमुत्थाप्य स्वाधिष्ठानं त्रिःप्रदक्षिणी-
कृत्य मणिपूरकं च गत्वाऽनाहतमतिक्रम्य विशुद्धौप्राणान् निरुध्या-
ज्ञामनुध्यायन् ब्रह्मरंध्रं ध्यायन् त्रिमात्रोऽहमित्येवं सर्वदा ध्यायेत् ।

**अर्थः—**गुदाद्वार को रोक कर आधार चक्र से वायु को उठा कर स्वाधिष्ठान की ३ बार परिक्रमा करके मणिपूर जाकर, अनाहतचक्र का अतिक्रमण करके विशुद्धचक्र में प्राणों का निरोध करे और आज्ञाचक्र में ध्यान करता हुआ, फिर ब्रह्मरंध्र का ध्यान करता हुआ मैं तीन मात्रा से युक्त ॐ हूं ऐसा सदा ध्यान करे। अर्थात् मैं जाग्रतावस्था में वैश्वानर अकार, स्वप्नावस्था में तैजस् उकार और