भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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९८ सौंदर्य लहरी

सुषुप्ति में प्राज्ञ मकार हूं, इस प्रकार सदा ध्यान करता हुआ शुद्ध- स्फटिक सदृश नाद का आधार चक्र से ब्रह्मरंध्र पर्यन्त ध्यान करना चाहिये ।

बिन्दु और बीज के योग से नाद की उत्पत्ति होती है । कहा है

बिन्दुःशिवात्मको बीज शक्तिर्नादस्तयोर्मितः । समवायः समाख्यातः सर्वागमविशारदैः ॥

स्थूल रूप में बिंदु शुक्र है और बीज रज है और उर्द्धरेता होने पर दोनों का समवाय अर्थात् कुण्डलिनी का जागरण नाद कहलाता है । समयाचार की विधि भावना प्रधान होती है और भावना युक्त साधन द्वारा ही सिद्धि प्राप्त की जाती है, कौलाचार में जो उर्ध्वरेतस् की सिद्धि स्वाधिष्ठान चक्र के वेध द्वारा की जाती है, वह समयाचार वाला आज्ञाचक्र में मन का वेध करके करता है । हंसोपनिषत् के उपरोक्त क्रमानुसार स्वाधिष्ठान चक्र की ३ बार प्रदक्षिणा करके ऊपर उठ जाने के साधन में स्वाधिष्ठान चक्र के वेध का निषेध किया गया है । उसकी तीन बार प्रदक्षिणा करनी चाहिये, क्योंकि यहां शक्ति की पीठ है, जैसा कि नाम से प्रकट है ( स्व+अधि+स्थान=स्वाधिष्ठान ) । मूल बंध द्वारा आधार चक्र का वेध होकर पृथिवी और जल दोनों का एक साथ बंध होगा, क्योंकि मूलबन्ध के अभ्यास से योनिस्थान जो दोनों चक्रों के मध्य में है और अग्नि का स्थान है, दबता है । योनिस्थान पर दबाव पडने से अग्नि प्रदीप्त होकर पृथिवी और जल दोनों का वेध एक साथ कर देती है । अग्नि तत्व का वेध मणिपूर अर्थात् नाभि चक्र में होता है और वह