सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसौन्दर्य लहरी ९३
बिन्दु सदाशिव, शान्ति शक्ति और शान्त्यातीत शिव हैं । प्रथम चार मंच के चार पाये, बिन्दु चद्दर, और शिवाकार मंच पर विराजने वाली चिदानन्द लहरी, अथवा परम शिव पर्यंकनिलया चिदानन्द लहरी है ।
भगवती के भजन से प्राप्त चिदानन्द के आवेशों का अनुभव करने वाले साधक थोडे ही होते हैं। वे वास्तव में धन्य हैं जिन पर भगवती की ऐसी कृपा होती है भगवती का ध्यान परम शिव के साथ करना चाहिये, यह बात पूर्व श्लोकोक्त पुरमथितुराहो-पुरुषिका पद से भी प्रगट होती है । सत्य बात तो यह ही है कि सच्चिदानन्द के आनन्दावेशों की अनुभूति में स्वयं भगवती की ही कृपा की अनुभूति है, अर्थात् परम ब्रह्म के शून्य अव्यक्त सत्स्वरूप आकाश में शून्य रूपी पलंग पर चिदानन्द की लहरी विराजती है । पलंग एक त्रिकोण मंच पर बिछा हुआ है, मंच चिन्तामणियों के बने हुए घर में स्थित है, घर के चारों ओर नीप वृक्षों का उपवन है, वह उपवन एक मणियों के द्वीप पर लगाया गया है । द्वीप के चारों किनारों पर कल्पवृक्षों का घेरा है, और वह द्वीप अमृत के समुद्र में स्थित है । ऐसा भगवती के रहने का स्थान है ।
निःस्पन्द परम शिव आनन्द ब्रह्म परं पद सुधासिंधु है, और चिदानन्द लहरी स्वयं चिति शक्ति है । जिसका स्थान सहस्रार पद्म में हैं। सहस्रार ही वह मणि जटित द्वीप है, जिसके चारों ओर कल्प वृक्षों का घेरा है और मध्य में नीप वृक्षों का उपवन है, जिसमें चिन्तामणियों से घर बनाया गया है, उसमें ▽ त्रिकोणाकृति