सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 134, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ें५४
- सौन्दर्य लहरी
अकथ अथवा गुरु चक्र रूपी मंच पर बिन्दु रूपी पलंग बिछा हुआ है। वहां सच्चिदानन्द की प्रथम स्पन्द स्वरूपा चिदानन्द लहरी शिव के साथ विहार करती है। जिसका उल्लेख अगले श्लोक में आयगा। अकथ त्रिकोण चक्र की तीनों भुजाओं के बाहर क्रमशः १६ स्वर, क से त तक १६ व्यंजन, और थ से स तक १६ अक्षर विराजते हैं, और तीनों कोगों में ह क्ष ळ तीन अक्षर हैं। अ, क, थ से युक्त अन्य १५ अक्षरों के कारण, तीनों भुजाएं इन अक्षरों से नामांकित की जाती हैं और चक्र का नाम अकथ कहा जाता है। अकथ का अर्थ अकथनीय अथवा अनिर्वचनीय होता है। सब वर्ण चिन्तामणियों के सदृश हैं जिनसे यह घर बना है। इसके चारों ओर सहस्र अरे (radii) नीप वृक्ष हैं और उनसे उदय होने वाले संकल्प कल्प वृक्ष हैं। भगवती के पलंग का वर्णन ९२ वें श्लोक में देखें। वहां हरि, रुद्र, ब्रह्मा और महेश्वर को पलंग के चार पाये बताया गया है और सदाशिव को पलंग पर बिछाने की चद्दर से उपमा दी गई है। अथवा ॐ पलंग है और अ, उ, म् और अनुस्वार उसके चार पाये हैं। अथवा मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर और अनाहत् चक्र चार पाये हैं और विशुद्ध चक्र उस पर बिछी चादर है। और देह श्री चक्र है। श्री चक्र भगवती का निवास स्थान माना जाता है, देखें श्लोक ११। श्री चक्र में बिन्दु को पलंग का स्थान, त्रिकोण को अकथ चक्र, ४३ त्रिकोणों को नीप वृक्ष और ४ श्री कंठ और ५ शिवयुवतियों को कल्प वृक्ष समझना चाहिये।
इस श्लोकोक्त 'चिदानन्द लहरी' पद के कारण प्रथम ४१ श्लोकों के पूर्व ग्रंथ को आनंद लहरी कहते हैं। आनन्द से 'क,'