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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 415 में से

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सौंदर्य लहरी ८७


परन्तु वह समाधि के लिये बहुत बड़ा विघ्न है, बड़े-बड़े योगियों को भी पथ भ्रष्ट कर देता है। जो शंकर की भी समाधि खोल सकता है, उसकी दुर्जेयता प्रत्यक्ष ही है। काम वासना का क्षय ज्ञान के उदय होने पर ही होता है, इससे पूर्व नहीं। यह ही इस आख्यायिका का अभिप्राय है। श्लोक में काम को सारे जगत का विजेता कहने से, साधकों का लक्ष्य काम वासना के प्रभाव की ओर आकर्षित करना है, जो भगीरथ प्रयत्नों से भी शमन किया जान कठिन है। परन्तु कामदेव का सारा सामर्थ्य भगवती के अति स्वल्प कृपा कटाक्ष का ही तो फल है, इसलिये मुमुक्षु साधकों को इस दुर्जय शत्रु से बचने के लिये भगवती की ही शरण में जाना चाहिये। भगवती के ध्यान मात्र से रक्षा हो सकती है।

इसलिये अगले श्लोक में भगवती का ध्यान बताया जाता है:—

[ ७ ]

क्वणत्कांचीदामा करिकलभ कुंभस्तन नता
परिक्षीणा मध्ये परिणतशरच्चन्द्र वदना ।
धनुर्बाणान् पाशं सृणिमपि दधानाकरतलैः
पुरस्तादास्तां नः पुरमथितुराहो पुरुषिका ॥

कठिन शब्दों का अर्थ:— कांची=मेखला जो स्त्रियां कटि पर पहनती हैं। दाम=बंधनी, तगड़ी, कलभ=बच्चा, सृणि=अंकुश

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