सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११२ | सौंदर्य लहरी
हिमाचल की कन्या का वर्ण भी हिमवत् स्वच्छ होना चाहिये । हिम में शीतलता रहती है और प्रकाश भी । चन्द्रमा में भी शीतल प्रकाश होने के कारण उसे अमृत बरसाने वाला कहा जाता है । इसी प्रकार भगवती का स्वरूप सुधामयी ज्योति के सदृश है । अमृत को प्रकाशमान् समझना चाहिये ।
यथैव बिम्बं मृदयोपलिप्तं तेजोमयं भ्राजते तत्सुधातं ।
तद्वात्मतत्वं प्रसमीक्ष्यदेही एकः कृतार्थो भवते वीत शोकः ॥
(श्वे. २, १४)
अर्थः— मिट्टी से लिपे हुए, तेजोमय अमृत सदृश चमकते हुए शीतल बिंबवत् आत्म तत्व को देखकर देहाभिमानी जीव ब्रह्म से एकता प्राप्त करके कृतार्थ और वीत शोक हो जाता है ।
ब्रह्मा सृष्टि के कर्ता हैं, इसलिये सर्व प्रथम कवि हैं, चारों मुखों से वेदों का गान करते हैं, इसलिये सब कवियों में श्रेष्ठ हैं । वे भी भगवती के सौन्दर्य की उपमा नहीं ढूंढ सके, अन्य कवि इसलिये कुछ-२ कल्पना किया करते हैं। यदि अप्सराओं की उपमा दी जाय तो वे भी तो भगवती के रूप को उत्सुकता से देखकर ध्यान मग्न होकर समाधिस्थ हो जाती हैं । भाव यह भी है कि भगवती के सौन्दर्य की कल्पना करने से समाधि लग सकती है ।