सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 157, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौन्दर्य लहरी १११
कवियों की कल्पना के बाहर का विषय है; इस भाव को प्रकट करने के लिये भगवत्पाद कहते हैं कि:—
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त्वदीयं सौन्दर्यं तुहिनगिरिकन्ये तुलयितुं कवीन्द्राः कल्पन्ते कथमपि विरिञ्चि प्रभृतयः । यदालोकौत्सुक्यादमरललना यान्ति मनसा तपोभिर्दुष्प्रापामपि गिरिशसायुज्यपदवीम् ॥
अर्थ:— हे हिमगिरि सुते ! तेरे सौन्दर्य की तुलना करने को ब्रह्मा प्रभृति कवीन्द्र भी कुछ कुछ कल्पना किया करते हैं । तेरे सौन्दर्य को देखकर स्वर्ग की अप्सराएं ध्यानस्थ हो जाती हैं और अनेक तपश्चर्या से भी कठिनता से प्राप्त होने वाली शिवसायुज्य पदवी को सहज प्राप्त कर लेती हैं ।
सं० टि०:— यहां आनन्द लहरी के सौन्दर्य के चिन्तन से शिव-सायुज्य पदवी की प्राप्ति कही गई है ! साधक को अपने अधिकारा-नुसार बहिर्याग और अन्तर्याग द्वारा भगवती को प्रसन्न करना चाहिये । बहिर्याग का फल अन्तर्याग है और अन्तर्याग द्वारा शिव-सायुज्य मुक्ति की प्राप्ति होती है । क्योंकि सहस्रार में शिव शक्ति का ऐक्य होने पर परंपद की उपलब्धि कही गई है ।