भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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११० | सौन्दर्य लहरी

त्रिकोण बनाओ, तीनों के योग से अष्टार स्पष्ट बन जाता है । फिर तीसरा शक्ति और दूसरा शिव त्रिकोण बनाने से अन्तर्दशार बन जाता है, फिर चौथा शक्ति और तीसरा शिव त्रिकोण बनाने से बहिर्दशार और फिर पांचवां शक्ति और चौथा शिव त्रिकोण बनाने से चतुर्दशार बन जाता है । यह सृष्टि क्रम है जिसमें शिव के त्रिकोण नीचे को उतरते हैं और शक्ति त्रिकोण ऊपर को चढते हैं अर्थात् शिव त्रिकोणों का मुख नीचे की ओर और शक्ति त्रिकोणों का मुख ऊपर की ओर होता है । इसके विपरीत जब शिव के त्रिकोण ऊपर चढते हैं और शक्ति त्रिकोण नीचे को उतरते हैं, उसे लय क्रम समझना चाहिये । क्योंकि शिव त्रिकोण उर्ध्वमुख और शक्ति त्रिकोण अधोमुख हो जाते हैं । यह क्रम बाह्य उपासना में ग्रहण किया जाता है, परन्तु अन्तरुपासना में जब शक्ति मूलाधार से सहस्रार में चढती है तो लय क्रम होता है क्योंकि तब शिव भाव की वृद्धि होती है और जब शक्ति नीचे उतरती है तब जीव भाव की वृद्धि होती है, इसलिये यह प्रभव क्रम है ।

भगवती का सौंदर्य कल्पनातीत है

ऊपर के दो श्लोकों में भगवती का अन्तः और बाह्य ध्यान पूजन बताया गया है । आज्ञा चक्र के ऊपर अमृत की वर्षा करती हुई ज्योतिर्मयी भगवती का ध्यान करते समय देवी के सौंदर्य की कल्पना का वर्णन इस श्लोक में है । परन्तु वह वैखरी बाणी का विषय नहीं,