सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२४ सौंदर्य लहरी
२२. सोषुम्णी, सोषुम्णी परा, २३. प्राण सूत्र, प्राण सूत्र परा, २४. स्यन्द, स्यन्द परा, २५. मातृका, मातृका परा, २६. स्वरोद्भव, स्वरोद्भव परा, २७. वर्णज, वर्णज परा, २८. वर्गज, वर्गजा परा, २९. शब्दज, शब्दज परा, ३०. वर्णज्ञात, वर्णज्ञता परा, ३१. संयोगज, संयोगज परा, ३२. मंत्र विग्रह, मंत्र विग्रह परा ।
पाचों तत्वों का संबंध मूलाधार से विशुद्ध चक्र तक क्रमशः ५ चक्रों से है और मन का सम्बन्ध भ्रूमध्य में आज्ञा चक्र से, इसलिये इन किरणों का भी सम्बन्ध छःओं चक्रों से है। छः चक्रों से वर्ष की छः ऋतुओं की समानता की जाती है। अर्थात बसन्त की मूलाधार से समानता है। क्योंकि इस ऋतु में पृथ्वी का वेध होकर पुष्प खिलते हैं और सुगन्ध का विकास होता है, ग्रीष्म ऋतु की स्वाधीष्ठान चक्र से समानता की जाती है, इस ऋतु में जल का वेध होकर सब जल सूखने लगता है। वर्षा की मणिपूर से समानता है, क्योंकि इस ऋतु में अग्नि का वेध होकर विद्युत और पर्जन्य का विकास होता है। शरद् ऋतु की अनाहत चक्र से समानता की जाती है क्योंकि इसमें वायु का वेध होकर वातावरण शान्त निर्मल हो जाता है। हेमन्त ऋतु की विशुद्ध चक्र से समानता है, क्योंकि इस ऋतु में आकाश के वेध सूचक शीत की प्रधानता होती है, और शिशिर ऋतु की आज्ञा चक्र से समानता की जाती है क्योंकि इसमें चित्त की प्रसन्नता बढती है। इस प्रकार उक्त ३६० किरणों को वर्ष की ३६० तिथियों से समानता यह बात सिद्ध करती है कि पिंड का संवत्सर पुरुष आधार है। कृष्ण और शुक्ल पक्षों को भी शक्ति शिवात्म समझना चाहिये। कृष्णपक्ष में चन्द्रमा