भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 415 में से

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सौंदर्य लहरी — १८५

की अन्वय और शुक्ल पक्ष में उन्नेय भूमिका समझनी चाहिये । इसी प्रकार उत्तरायण और दक्षिणायन को सूर्य ( प्राण ) की उन्नेय और अन्वय भूमिकायें समझनी चाहिये ।

अगले तीन श्लोकों में वाक् सिद्धि का वर्णन है । १५ वें श्लोक में सात्विक, १६ वें राजसिक और १७ वें मिश्रित भावों युक्त कविता शक्ति के विकास का वर्णन है ।

वाक् सिद्धि


[ १५ ]

शरज्ज्योत्स्नाशुभ्रां शशियुतजटाजूटमकुटां
वरत्रासत्राणस्फटिकघुटि (णि) कापुस्तककराम् ।
सकृन्न त्वां नत्वा कथमपि सतां सन्निदधते
मधुक्षीरद्राक्षा मधुरि मधुर्गैणा भणितयः ॥

अर्थ:— शरत् पूर्णिमा की चांदनी के सदृश शुभ्रवर्णा, द्वितीया के चन्द्रमा युक्त जटाजूट रूपी मकुट धारण किये हुए, दो हाथों से भक्तों को त्रास से त्राणार्थ अभयद और वरद अभिनय किये हुए और दो हाथों में स्फटिक मणियों की माला और पुस्तक धारण किये हुए, तुझको एक बार भी नमन न करनेवाला मनुष्य किस प्रकार सत्कवियों की सी मधु, दूध और द्राक्षा की मधुरता से युक्त मधुर कविता कर सकता है, अर्थात् नहीं कर सकता ।

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