भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 415 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 172

१२६ | सौंदर्य लहरी


सं० टि० यह और अगले दो श्लोक मिल कर सारस्वत प्रयोग कहलाते हैं । अच्युतानन्द के अनुसार यहां वाग्भव रूप क्रिया शक्ति का ध्यान है, अर्थात वाग्भव कूट की देवी क्रिया शक्ति का ध्यान बताया गया है ।

यहां कुण्डलिनी शक्ति के जागृत होने पर सास्वत सिद्धि हो की ओर संकेत है । कहा है ।

सर्वे वाक्यात्मका मंत्रा वेद शास्त्राणि कृत्स्नशः ।
पुराणानि च काव्यानि भाषाश्च विविधा अपि ॥ ३,७
सप्तस्वराश्च गाथाश्च सर्वे नाद समुद्भवाः :
एषा सरस्वती देवी सर्वभूतगुहाश्रया ॥ ३, ८
य इमां वैखरीं शक्तिं योगी स्वात्मनि पश्यति ।
स वाक सिद्धिमाप्नोति सरस्वत्याः प्रसादतः ॥
३,१० (यो. शिखा.)

अर्थः— सब वाक्यात्मक मंत्र वेद शास्त्र, पुराण और काव्य, विविध भाषायें, सातों स्वर और गाथायें सब नाद् से उत्पन्न होती हैं । यह नाद् रूपा सरस्वती देवी सब प्राणियों की बुद्धिरूपी गुहा में रहती है । जो योगी इस वैखरी शक्ति को अपने भीतर देखता है उसे सरस्वती के प्रसाद से वाक् सिद्धि की प्राप्ति हो जाती है ।

कुण्डलिनी शक्ति जागकर चार रूपों में प्रकट होती है, उन रूपों के नाम ये हैं, क्रियावती, कलावती, वर्णमयी और बेधमयी · शारीरिक कंपदि, हठ योग के आसन प्रणायाम मुद्रादि, नृत्यादि