सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 176, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ें१३० | सौंदर्य लहरी
जैसे चन्द्रमा की ज्योत्स्ना से चन्द्रकान्त मणि द्रवीभूत होती है, वैसे ही पन्द्रहवें श्लोकोक्त शरद्-ज्योत्स्ना-शुभ्रा भगवती के ध्यान से आठों वाग्देवियां द्रवीभूत होने लगती हैं। और उनके मन्त्र स्वरूप अ क च ट त प य श वर्गवाली सम्पूर्ण मातृका शक्तियां चन्द्रकान्त मणियों के नांई, जो समस्त वैखरी वाणी की वर्णात्म आधार हैं द्रवीभूत होकर उस कवि में वर्णपदमंत्रविग्रहा नवरसयुक्त वैखरी शक्ति का विकास करने लगती हैं।
यह श्लोक सात्विक और राजसिक दोनों भावों को एक स्थानीय कर देता है। 'महतां काव्यानाम्' पद से ऋषि प्रणीत शास्त्रों का अभिप्राय है।
<u>मधुमती भूमिका की सिद्धि।</u>
(१८)
तनुच्छायाभिस्ते तरुण तरणि श्रीध(स)रणिभि
र्दिवं सर्वामुर्वीमरुणिमनिमग्नां स्मरति यः ।
भवन्त्यस्य त्रस्यद्वनहरिणशालीन नयनाः
सहौर्वश्या वश्याः कतिकतिन गीर्वाणगणिकाः ॥
कठिन शब्दः—तरणि=सूर्य; सरणि=किरणें; गीर्वाण गणिका=अप्सराएं, दिवं=आकाश; उर्वी=पृथिवी, छाया=कान्ति।
अर्थः—तरुण सूर्य की श्री अर्थात् कान्ति को धारण करने वाली तेरे शरीर की छाया (कान्ति) से आकाश और