भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 415 में से

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सौंदर्य लहरी १३१

सारी पृथिवी को अपनी अरुणिमा (लाल रंग) में निमग्न करती हुई तेरा जो स्मरण करता है, उसके वश में, घबराई हुई बन की हरिणियों जैसे चंचल नयनों वाली ऊर्वशी सहित कितनी स्वर्ग की अप्सरायें वश में हो जाती हैं।

सं० टि०:—यहां ज्ञानी की दिव्य दृष्टि का जो सब जगत् को ब्रह्ममय देखने लगती है, वर्णन है। यह मधुमती भूमिका कहलाती है, जिसमें देवाङ्गनाएं साधक को पथभ्रष्ट करने का यत्न करती हैं।

अप्सराओं से दिव्यशक्तियों का भी अभिप्राय है। उपरोक्त ध्यान करने वाले योगियों को दिव्यशक्तियों का साक्षात् होता है, जिनका वर्णन योगदर्शन के विभूतिपाद के ५१ वें सूत्र में मिलता है, उनको वहां स्थानीय देवता कहा गया है। यह अनुभव योगियों को ऋतंभरा प्रज्ञा के उदय होने पर मधुमती भूमिका में होता है। यह शुद्धसत्वगुण प्रधान भूमिका है। इसमें शक्ति का प्रकाश सर्वत्र दृष्टिगोचर होने लगता है। अर्थात् ऐसे योगियों को भूमि और आकाश सर्वत्र भगवती की अरुण कान्ति की छाया से बसा हुआ दिखने लगता है। उक्त सूत्र पर व्यासजी अपने भाष्य में लिखते हैं कि उन स्थानीय देवताओं के प्रलोभनों से योगी को सतर्क रहना चाहिये, और संग दोष से बचने के लिये उसको इस प्रकार सोचना चाहिये कि घोर संसार के अंगारों में जलते हुए और जन्म मरण के अन्धकार में पडे हुवे मैंने इस क्लेश तिमिर को दूर करने वाले योग प्रदीप का प्रकाश बडी कठिनता से प्राप्त किया है। तृष्णा की कारणभूत विषयभोगों की आंधी इस योगरूपी दीपक को न कभी बुझा दे।

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