सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 183, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी १३७
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तडिल्लेखातन्वीं तपनशशिवैश्वानरमयीं
निषण्णां षण्णामप्युपरि कमलानां तव कलाम् ।
महापद्माटव्यां मृदितमलमायेन मनसा
महान्तः पश्यन्तो दधति परमाह्लादलहरीम्१
१ पाठान्तर= परमानन्दलहरीम्
कठिन शब्दः— अटवी=वन, महापद्माटव्यां=सहस्रार में ।
अर्थः— महापुरुष तेरी, विद्युत् रेखा जैसी पतली, सूर्य चन्द्र और अग्नि की त्रिमयी कला को, छः कमलों के भी ऊपर कमलों के महावन में, मलमाया से विशुद्ध मन द्वारा देख २ कर परम आनन्द की लहर को धारण किया करते हैं ।
सं० टि० इस श्लोक में अभ्यन्तर आज्ञा चक्र के ऊपर मूर्धांगत ज्योति दर्शन का स्वरूप दिखाया गया है । इससे पूर्व जो ध्यान बताये गये हैं, वे सब नीचे के स्तरों के ध्यान हैं। कला से चित्स्वरूपा शक्ति का अभिप्राय है । महा पद्माटवी से सहस्रार का अभिप्राय है ।
षट् चक्र का वेध कर के कुण्डलिनी शक्ति जब सहस्रार में उठती है, तब उसकी कला बिजली के सदृश चमकती हुई रेखा के सदृश दृष्टिगोचर हुआ करती है । वह सोम सूर्य और अग्नि तीनों के तेज से युक्त होती है । उसके दर्शन वे ही महापुरुष योगी कर सकते हैं जिनके मन मल माया से विशुद्ध हो चुके हैं, जिसका