भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 184, कुल 415 में से

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पृष्ठ 184

१३८ | सौंदर्य लहरी

दर्शन परम आह्लादकारी होता है। ब्रह्मविद्योपनिषद् में उक्त कला का वर्णन नीचे उद्धृत श्लोकों में किया गया है।

सूर्यमण्डल मध्येऽथ ह्यकारः शंख मध्यगः ।
उकारश्चन्द्रसंकाशस्तस्य मध्ये व्यवस्थितः ॥ ७ ॥
मकारस्त्वग्निसंकाशो विधूमो विद्युतोपमः ।
तिस्रो मात्रास्तथोज्ञेया सोमसूर्याग्निरूपिणः ॥ ८ ॥
शिखातु दीपसंकाशा तस्मिन्नुपरि वर्तते ।
अर्ध मात्रा तथा ज्ञेया प्रणवस्योपरि स्थिता ॥ ९ ॥
पद्मसूत्रनिभा सूक्ष्मा शिखा सा दृश्यते परा ॥

अर्थः— 'शंख के मध्य भाग में, (ध्वनि के सदृश) प्रणव की प्रथम मात्रा अकार सूर्य मण्डल के मध्य है, उकार दूसरी मात्रा चन्द्रमा के सदृश उसके मध्य में स्थित है, तीसरी मात्रा मकार अग्नि सदृश जिसमें धूआं न हो, विद्युत् वत् चमकती हुई उसके मध्य में है। इस प्रकार तीनों मात्राओं को सोमसूर्याग्निमयी जानना चाहिये। उसके ऊपर दीप शिखा के सदृश लौ है, उसको प्रणव के ऊपर आधी मात्रा समझना चाहिये। वह कमल सूत्र जैसी सूक्ष्म शिखा योगियों को दृष्टिगोचर होती है? उक्त प्रणव कला जो शक्ति की ही कला है, सहस्रार में दिखती है। शुद्ध अन्तःकरण वाले योगी ही उसे देख सकते हैं, और उसका दर्शन परम आह्लाद का देने वाला होता है। इसके दर्शन के पश्चात् ज्ञान की भूमिका का उदय होता है। सिद्धियों की भूमिका भी नीचे ही रह जाती है, क्योंकि प्रत्येक चक्र की सिद्धियां भिन्न २ हैं।

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