भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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पृष्ठ 205

सौंदर्य लहरी १५५

ज्ञान के सापेक्षिक भेद है उसको प्रज्ञान कहते हैं। वह सबका आधार स्वरूप प्रज्ञानात्मा हो ब्रह्म है। ब्रह्मात्मैक्य की उपलब्धि श्रवण मनन निदिध्यासन के द्वारा कालान्तर में होती है। परन्तु शंकर भगवत्पाद इस श्लोक में कहते हैं कि जाने बिना जाने भगवती की स्तुति करते समय जो कोई इस श्लोक की प्रथम पंक्ति के 'भवानि त्वं' इतने मात्र पद का उच्चारण कर पाता है, तो भगवती उसे सायुज्य मोक्ष दे देती है। क्योंकि 'भवानि त्वं' पद का यह भी अर्थ होता है कि मैं तू बन जाऊं। क्योंकि भगवती यह मान कर कि यह मेरा भक्त मुझ में लीन होकर मेरे सायुज्य पद की प्राप्ति के लिये प्रार्थना करता है, ऐसा समझा जाने से 'दासे मयि इत्यादि' उच्चारण होने के पूर्व ही वह सायुज्य मुक्ति प्राप्त कर लेता है।

समाधि में समनीस्तर पर पहुंच कर योगी जो इच्छा करता है उसकी वह कामना पूर्ण हो जाती है, इसलिये अहं ब्रह्मास्मि का ध्यान करने वाला ज्ञानी भी उस स्तर पर ब्रह्मात्मैक्य की अपरोक्षानुभूति प्राप्त कर सकता है, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं।

सायुज्य मोक्ष अन्य सालोक, सामीप्य और सारूप्य मोक्षों से ऊंची है अर्थात् सगुण ब्रह्म के लोकों से ब्रह्मभाव ऊंचा है और इंद्रलोक, ब्रह्मलोक, एवं विष्णुलोक उस पद के नीचे ही रह जाते हैं। जैसा कि भगवान कहते हैं

तमेवचाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्ति प्रसृता पुराणी।
और (गीता १५, ४)
ततोमांतत्वतोज्ञात्वा विशते तदनंतरम् ॥
(१८, ५५)