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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 415 में से

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पृष्ठ 206

१५६ सौंदर्य लहरी

अर्थात् मानो ब्रह्मा विष्णु और स्वर्ग पति इन्द्र के मुकुटों की ज्योतियां उस परम पद के नीचे आरती उतारने के सदृश निम्न-स्तरों पर ही चमका करती हैं ।

अर्धनारीश्वर सदाख्य तत्त्व का ध्यान ।

अगले श्लोक में सदाशिव का ध्यान दिया गया है ।

( २३ )

त्वया हृत्वा वामं वपुरपरितृप्तेन मनसा शरीरार्द्धं शंभोरपरमपि शङ्के हृतमभूत् । यदेतत्त्वद्रूपं सकलमरुणाभं त्रिनयनं कुचाभ्यामानमं्र कुटिलशशिचूड़ालमकुटम् ॥

**अर्थ:—**हे भगवति ! शंभु का बांयां शरीर हरण करके भी तेरा मन तृप्त नहीं हुआ, मुझे शंका होती है कि दूसरे आधे शरीर का भी अपहरण कर लिया गया है । क्योंकि वह सारा शरीर अरुणवर्ण की आभा से तेरा ही दिख पड़ता है, उसमें तीन नेत्र हैं, वह कुचों के भार से कुछ झुका हुआ है और द्वितीया का चन्द्र केशों के ऊपर मुकुट पर शोभा दे रहा है ।

**सं० टि०:—**यहां अर्धनारीश्वर का ध्यान दिखाया गया है, जिसमें शक्ति तत्त्व की इतनी प्रधानता है कि शिवतत्त्व को जानना कठिन होगया है । वास्तव में शक्ति तत्त्व शिव तत्त्व से भिन्न नहीं हैं ।

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