भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 415 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 210
१६०सौंदर्य लहरी

के निकट अपने मुकुटों की शोभा बढाने के लिये हाथ जोडे खडे रहते हैं ।

सं० टि० भगवती के पूजन से सब देवों का पूजन हो जाता है ।

[ २६ ]

विरिञ्चिः पञ्चत्वं व्रजति हरिराप्नोति विरतिं
विनाशं कीनाशो भजति धनदोयाति निधनम् ।
वितन्द्री माहेन्द्री विततिरपि संमीलति दृशा
महासंहारेऽस्मिन्विहरति सतिस्त्वत्पतिरसौ ॥

कठिन शब्दः-- कीनाश=यमराज, दृशां=दृष्टि, पंचत्व=मरण ( जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तुरिया से ५ वी अवस्था ।

अर्थः-- हे सति ! इस महा प्रलय के समय ब्रह्मा पांचवी अवस्था को प्राप्त हो जाता है, अर्थात् मर जाता है । हरि विरति को प्राप्त होते हैं । कीनाश ( यमराज ) का नाश हो जाता है । धनद ( कुवेर ) का निधन ( मरण ) हो जाता है, जिसको कभी तन्द्रा नहीं आती वह हजार नेत्र वाला महेन्द्र भी अपनी फैली हुई दृष्टि वाला नेत्र बन्द कर लेता है । परन्तु सदाशिव तेरा पति तो तब भी विहार ही करता रहता है ।

सं० टि० महा प्रलय में सब देवों का लय हो जाता है, केवल परंब्रह्म रहता हैं, और शक्ति भी उसमें अव्यक्त दशा में बनी रहती है ।