सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी १५९
इनकी पृथक पूजा करने की आवश्यकता नहीं है, भगवती के पूजन से सबकी पूजा हो जाती है। ब्रह्मा रजोगुण, विष्णु सत्वगुण और रुद्र तमोगुण के अधिदेव हैं और तीनों गुण प्रकृति के अंग हैं, अर्थात् माया की अपेक्षा से तीनों देवताओं का अस्तित्व है, निर्गुण ब्रह्म मायातीत है। ईश्वर तत्व भी माया शक्ति के आधीन है। परन्तु सदाशिव, जो यद्यपि माया का स्वामी है, परन्तु शक्ति का प्रभुत्व इतना है कि विवश होकर सृष्टि करने को बाध्य होता है।
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥
(गीता० ९-८)
इसलिये
[ २५ ]
त्रयाणां देवानां त्रिगुण जनितानां तव शिवे
भवेत्पूजा पूजा तव चरणयोर्या विरचिता, ।
तथा हि त्वत्पादोद्वहनमणिपीठस्य निकटे
स्थिताह्येते शश्वन्मुकुलित करोत्तंस मकुटाः ।।
अर्थः— हे शिवे ! तेरे चरणों की जो पूजा की जाती है, उससे तेरे तीनों गुणों से उत्पन्न इन तीनों देवों का भी पूजन हो जाता है। इसलिये यह उचित ही है कि ये तीनों देव तेरे चरणों को धारण करने वाले मणियों के बने आसन