भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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सौंदर्य लहरी १६७

और शेष भगवान विराट की कुण्डलिनी वत् आधार शक्ति। नारायण को सुलाने वाली निद्रा देवी महासुप्ति स्वरूपा बीजशक्ति है। पद्म जो नाभि से निकलता है वह स्पन्दस्वरूपा रजोगुण की विमर्ष शक्ति है, और ब्रह्मदेव स्वयं शब्दब्रह्म स्वरूप प्रणव है। ब्रह्मदेव को विराट के प्राण और बुद्धि समझना चाहिये। प्रणव का प्रथम स्वरूप ध्वन्यात्मक होता है फिर शब्दों का रूप धारण कर के वेदों के रूप में व्यक्त होने लगता है। वेदों के शब्दों से फिर उनके वाच्य अर्थ स्वरूप रूपात्मिका सृष्टि का प्रसार होने लगता है। शब्द से विराट ब्रह्माण्ड का श्रोत्र, श्रोत्र से आकाश, और आकाश से स्थूल शब्दों का संबंध है। विराट् भगवान के कानों से आकाश की उत्पत्ति कही गई है, कानों का मैल शब्दब्रह्म रूपी ब्रह्मदेव को खाने के लिये उद्यत नाद का आवरण है, जो निद्रा के कारण जम गया है, और जिससे मधु और कैटभ दो राक्षसों की उत्पत्ति बताई जाती है। आलस्य प्रमादादि की मादकता को मधु कह सकते हैं, और ज्ञान के ऊपर आवरण डालने वाले भ्रांति विक्षेपादि को कैटभ कह सकते हैं। कैटभ का अर्थ कीटवत् आभा वाला किया जा सकता है। कान के मैल को भी कीट कह सकते हैं, कीट का अर्थ कीड़ा भी होता है। अर्थात् कैटभ वह प्रकाश है जो मलावृत्त होने के कारण भ्रांति उत्पन्न करता है, अथवा उसका प्रकाश कीटाणु सदृश है। ये दोनों ज्ञान के महानशत्रु हैं। भगवान जागकर अर्थात् अध्यात्म जागृति होने पर दोनों का नाश होता है। दुर्गा सप्तशति में इस समय ब्रह्मदेव से की गई भगवती की प्रार्थना पढने योग्य है, जो विषयान्तर भय से यहां नहीं दी जाती।