सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 218, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ें१६८ | सौंदर्य लहरी
शक्ति के जागते ही शंकर से मिलने की आतुरता में सहस्रार पर चढते समय नीचे के चक्रों पर प्रणाम करते हुए ब्रह्मा विष्णु और इन्द्र के मुकुटों से उसको ठोकर लगने की आशंका सूचक परिचारिकाओं की उपरोक्त उक्तियां स्वाभाविक ही हैं। मूलाधार में ब्रह्मा का स्थान है और तत् सम्बन्धी पृथ्वी तत्व का स्वामी इन्द्र है, स्वाधिष्ठान में विष्णु का स्थान है। ये दोनों चक्र अन्धकारमय माने जाते हैं देखें श्लोक ३२, ३३ की व्याख्या में 'षोडशी विज्ञान' का विषय पृष्ठ १८३। अन्धेरे में ठोकर लगने की सम्भावना रहती है। अर्थात् साधक की शक्ति उन्नेय पथ पर इस मण्डल में रुक कर ठिठकनी नहीं चाहिये । श्लोक ९ में बताये गये चक्रों के वेधक्रम और ४१ वें श्लोकोक्त समयाचार की व्याख्या भी इस सम्बन्ध में ध्यान में रखने योग्य है। कुण्डलिनी शक्ति के जागृत होने पर शिवभाव का प्रादुर्भाव होना साधकों के अनुभव की बात है। परिचारिकाओं का विभिन्न चक्रों की योगिनीओं से अभिप्राय हो सकता है।
ब्रह्म भाव
( ३० )
स्वदेहोद्भूताभिर्घृणिभिरणिमाऽऽद्याभिरभितो
निषेव्ये नित्ये त्वामहमिति सदा भावयति यः ।
किमाश्चर्यं तस्य त्रिनयनसमृद्धिं तृणयतो
महासंवर्ताग्निर्विरचयति नीराजनविधिम् ॥
कठिन शब्दः—घृणि=किरण, संवर्ताग्नि=प्रलयाग्नि, नीराजन=आरती