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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 415 में से

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सौंदर्य लहरी १६९

अर्थ:— हे सेवा करने के योग्य वरेण्ये, नित्ये ! अपने देह से निकलने वाली अणिमादि सिद्धियों रूपी किरणों से घिरा हुआ तेरा भक्त जो 'त्वां अहम्' अर्थात् तुझको अपना ही रूप मानकर सदा भावना करता है, त्रिनयन की समृद्धि को भी तृणवत् तुच्छ समझने वाले उस साधक की संवर्ताग्नि आरती उतारता है, इसमें क्या आश्चर्य है ?

सं० टि० ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति । ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही हो जाता है, वह प्रलय में भी क्षोभ नहीं पाता, मानो संवर्ताग्नि का जलना उसकी आरती उतारने के सदृश है ।

जिस योगी ने सारूप्य मुक्ति प्राप्त करली है, और भगवती में स्वभाव से रहने वाली अणिमादि सिद्धियों युक्त ब्रह्म तेज की किरणें जिसके शरीरसे फूट २ कर निकलने लगी हैं, उस योगी को अहम् ब्रह्मास्मि भाव के उदय होने की चरम दशा में तीसरा दिव्य ज्ञाननेत्र खुल जाने से जो समृद्धि प्राप्त होती है, उसको भी वह सायुज्य मुक्ति के सामने तुच्छ समझने लगता है । देखें योग दर्शन सूत्र (३,५०) 'तद्वैराग्यादपि दोष बीज क्षये कैवल्यम्'। अर्थात् सर्वज्ञता और सर्व शक्तिमत्ता से भी वैराग्य होने से सब दोषों के बीज रूपी वासना के क्षय होने पर कैवल्य पद की प्राप्ति होती है ।

'नित्ये' पद से संबोधन करने का अभिप्राय यह है कि योगी सर्वाशा परिपूरक षोडशार चक्रस्थ कामाकर्षिणी आदि १६ नित्या कलाओं को जीत कर नित्य मोक्ष पद की प्राप्ति की इच्छा रखता

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